Sunday, October 30, 2016

30.10.2016

सन् 1953--1954--1955 के वर्ष में तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की मौजों ने श्री आनन्दपुर में अनूठा ही रंग भर दिया, जैसे यह समय श्री आनन्दपुर को पावन तीर्थधाम बनाने तथा श्री आनन्दपुर दरबार के कण-कण का साज सँवारने व जन-जन तक इस पुष्प की सुगन्धि फैलाने की लहरें साथ लाया हो। अमर सत्यता की प्रतीक अनूठी एवं अनुपम रचनाओं का उद्घाटन श्री आनन्दपुर में हुआ। प्रत्येक रचना एवं मौज में एक दिव्य जागृति तथा ज्योति आलोकित हो उठी।

आनन्द सन्देश
सर्वांगीण दिव्य ज्योति से अनुप्राणित होकर श्री आनन्दपुर दरबार से प्रेम, भक्ति तथा आत्मज्ञान की जो किरणें फूटीं, वे प्रेमियों गुरुमुखों के ह्मदय में जगमगा उठीं। इस दिव्य ज्योति का प्रकाश घट-घट में पहुँचाने के लिए प्रेमियों, गुरुमुखों तथा सत्संगियों ने श्री चरणों में विनय की कि प्रभो! जो-जो भी श्री सद्-प्रवचन आप जनकल्याण हेतु पर्व पर या समय-समय पर श्री मुख से फ़रमाते हैं, वे अमर वचन ऐसी दिव्य ज्योति हैं जो दिल को छूकर मन के सभी शत्रुओं को दूर भगाकर ह्मदय को शुद्ध कर देते हैं। इस ज्योति को घट-घट में जगाने के लिए ऐसा उपाय किया जाये जिससे कोई भी प्राणी इस अमृत-रस के पीने से वंचित न रह जाये। प्रेमियों और जिज्ञासुओं की प्यास तो इससे कहीं अधिक बढ़ी हुई है। वे त्योहार पर कई संसारी झंझटों से श्री दर्शन पर नहीं आ सकते तो श्री अमृत-प्रवचन सुनने के लिए लालायित रहते हैं। कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां छ: मास अथवा एक वर्ष से पहले सत्संग उपदेश के लिए किसी प्रचारक महात्मा का जाना नहीं हो सकता। ऐसा कोई साधन हो जिससे घर बैठे उन्हें श्री अमृत वचन तथा अन्य भक्ति के मुक्ताकण मिल सकें।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इस बढ़ती हुई मांग को स्वीकार किया। प्रेम, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य तथा त्याग के आचरण रूपी जीवन का निर्माण करने हेतु इन्हीं भावनाओं तथा विचारों से युक्त एक मासिक-पत्रिका के प्रकाशन का प्रबन्ध करवाया, जिसके पढ़ने तथा श्रवण करने से ह्मदय में ज्ञान का प्रकाश होने लगता है। यह प्रकाश या रोशनी श्री दर्शन करने व श्री अमृत तुल्य वचनों को सुनने के लिए उत्साह भर देती है। जब सन्त महापुरुषों की संगति मिल जाती है तो काम-क्रोध-अहंकारादिक शत्रु इस रोशनी को पाकर स्वयं भाग जाते हैं।
इस मासिक-पत्रिका का शुभ नाम श्री मुख से "आनन्द सन्देश' फ़रमाया। 1 फ़रवरी 1953 को इस मासिक-पत्रिका के निकालने की आज्ञा प्रदान की। 13 अप्रैल 1953 वैशाखी के शुभ पर्व पर मासिक-पत्रिका "आनन्द सन्देश' प्रकाशित होने की खुशख़बरी सर्व संगत को सुनाई गई। सब संगत ने इस हर्ष में जयकारों से हाल को गुँजा दिया। आनन्द-सन्देश को उर्दू, हिन्दी व सिन्धी तीन भाषाओं में छपवाने का प्रबन्ध किया गया। इसका प्रथम संस्करण मई 1953 में छपकर तैयार हो गया और जन-जन को आत्म-ज्ञान की गंगा में स्नान कराने के लिए वह घर-घर पहुँच गया। नाम अनुरूप गुणों को लेकर वर्तमान समय तक यह उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होकर सर्वसाधारण को कृतार्थ कर रहा है।

Monday, October 24, 2016

24.10.2016

श्री आनन्दपुर का कार्य विस्तृत होने के कारण आप "नया गांव' कोअधिक उन्नति न दे सके। इसीलिए आप द्वारा बनाई हुई रूपरेखा को श्री श्री 108      श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री चौथी पादशाही जी ने पूरा करने का प्रयत्न किया और आज भी महान् विभूति के रूप में श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी इस कार्य की पूर्ति कर रहे हैं।
पहले कहा जा चुका है कि समय-समय पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पादशाही जी) श्री सन्त नगर, नया गांव, रोशनपुर तथा अन्य स्थानों को कृतार्थ करते थे, परन्तु मुख्य केन्द्र श्री आनन्दपुर ही था। जब प्रत्येक स्थान पर कुछ दिन के लिए सत्संग-नाम-उपदेश की पावन धारा बहाने जाते तो पुन: श्री आनन्दपुर ही लौट आते। श्री सन्तनगर अथवा नया गांव या अन्य किसी स्थान को पवित्र करने के लिए जाना होता तो विशेष पर्व श्री आनन्दपुर में ही मनाने के पश्चात् जाते। केवल दशहरा पर्व ही नया गांव में मनाया जाता। यहां श्री सन्त नगर अथवा नया गांव की लीला व श्री प्रवचनों को उस स्थान के आदि से अन्त तक एक ही बार दिया गया है, क्योंकि प्रत्येक वर्ष में दो बार सन्त नगर और दो बार नया गांव (उरुली कांचन) में विराजमान होते। बार-बार लिखने के स्थान पर एक ही बार पूर्ण विवरण दिया गया है।
एक बार श्री वचन हुए कि ""आप सब गुरुमुखों का नाता हमारे साथ जन्म-जन्मान्तरों से चला आता है। आप सभी गुरुमुख त्रेता में भी थे और द्वापर में भी। तभी तो उस पुरानी शक्ति को लेकर आप गुरु-सेवा के मग पर दृढ़ पग से चल रहे हो।'' दो-चार नये जिज्ञासु भी मध्य में बैठे थे। उनके दिल में विचार आया कि काम तो सेवक स्वयं करते हैं तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कैसे शक्ति प्रदान करते हैं। मन में विचार उठा ही था कि श्री अन्तर्यामी भगवान ने सब सेवकों को (उनके सहित) जिस स्थान का पहले वर्णन हो चुका है कि उरुली कांचन जहां अपना आश्रम स्थापित किया था वहां से दस मील की दूरी पर "येवत' नामक स्थान ख़रीदा था; यह स्थान एक पहाड़ी के आकार का था, अपनी मौज से इस पहाड़ी के पत्थर जहां तहां से उठाकर अपनी ज़मीन के चारों ओर चारदीवारी बनाने का आदेश देकर भेज दिया। ये सब सेवक सुबह बस  पर सवार होकर वहां जाते। दिन भर सेवा करते और रात्रि को बस पर पुन: उरुली कांचन आ जाते। यह उनका नित्यप्रति का नियम था।
इन सेवकों ने "येवत' पहुँचकर जब सेवा का कार्य आरम्भ किया तो पूरे दिन में 2-3 पत्थर ही दीवार तक लगा पाए। ये पत्थर इतने भारी और लम्बे- चौड़े थे कि हिलने का नाम ही न लेते थे। गुरुमुखों को ऐसा काम करने का अभ्यास भी न था, परन्तु वे हिम्मत न हारते हुए श्री आज्ञानुसार सेवा में जुटे रहे।  दूसरे दिन में गुरुमुखों ने 4-5 पत्थर जोड़े। इस प्रकार आठ-दस दिन के पश्चात् वे दिनभर में 10-12 पत्थर दीवार में जोड़ने लगे।
एक दिन सायंकाल के समय श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कार में विराजमान होकर येवत पधारे और एक पत्थर पर विराजमान हो गए तथा श्री वचन     किये---""क्या बात है? काम बहुत ढीला है। क्या कारण है कि अभी तक बस ज़रा-सा काम हुआ है।'' सेवकों ने विनय की---""प्रभो! पत्थर बहुत भारी हैं। बड़ी कठिनाई से दिन भर में 10-12 पत्थर ही जोड़े जाते हैं।'' श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया----""वाह! ये पत्थर तो बेचारे कई जन्मों से आस लगाए प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब गुरुमुखों के हाथ लगें और हमारा कल्याण हो। ये तो आप ही आप जाते हैं। केवल संकेत करने की आवश्यकता है।'' जब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इतने वचन फ़रमाए तो पड़े हुए वज़नदार पत्थर गुरुमुखों के हाथ लगते ही तेज़ी से दीवार की ओर बढ़ने लगे। उन जिज्ञासुओं ने यह अद्भुत लीला देखी कि जिन पत्थरों को सभी प्रेमी मिलकर बड़ी कठिनाई से हिला पाते थे, वही पत्थर दो चार प्रेमी मिलकर आसानी से ले जाने लगे। फलस्वरूप दो घण्टे में 70 पत्थर दीवार में जोड़ दिए गये, फिर भी थकावट का नाम न था। वे जिज्ञासु इस अलौकिक शक्ति को देखकर उस दिन से और भी अधिक श्रद्धा व विश्वास से सेवा करने लगे। उन्होंने कुछ गुरुमुखों से भी अपने मन की शंका का वर्णन किया तथा बताया कि शायद श्री सद्गुरुदेव जी ने हमारे लिए ही यह लीला रची होगी। वास्तव में वे पत्थर यही बाट जोह रहे थे कि कब प्रभु आएं और उन्हें श्री दर्शन देकर हिलने की सामथ्र्य प्रदान करें।
यह था उनके वचनों और कृपा-दृष्टि का प्रताप। उनकी अनुपम लीलाओं का कहां तक वर्णन किया जा सकता है! जितना करो उतना ही कम है।

Saturday, October 22, 2016

16.10.2016




सन् 1963 में यहां श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने मौज के अनुसार अंगूरों के लिए गड्ढे खुदवाए। वे गड्ढे इतने पथरीले थे कि जिनसे यह आशा ही न की जा सकती थी कि पौधे यहां फल दे सकेंगे। बाहर खेतों से मिट्टी व खाद मंगवा कर इन गड्ढों में डलवाई गई। फिर अक्टूबर 1963 में ही एक दो पौधे निज कर-कमलों से लगा कर "अंगूर उद्यान' का उद्घाटन किया। इस अंगूर आरोपण के समय आपने गुरु-सेवा की विशेषता दर्शायी। कुछ विद्यार्थी भी उस समय सन् 1963 में श्री आनन्दपुर से "नया गांव' में श्री दर्शन की इच्छा से गये हुए थे। वहां पर आपकी मौज अंगूरों का कार्य करने की थी। वे विद्यार्थी सेवा की ओर कुछ कम ख़्याल देते थे। आपने फ़रमाया कि ""गुरु-सेवा जोकि अत्यन्त मौज में तरंगित हो, वे हीरे, लाल व जवाहरात हैं, जिन्हें किसी भी मूल्य पर नहीं ख़रीदा जा सकता। हाथ में आया हुआ समय खोकर पछताना पड़ता है। सेवा करने के लिए आए हो, सेवा करो। यह विद्या पुन: वापस जाकर पढ़ लेना। सन्त महापुरुषों की शरण में जाकर उस सच्ची विद्या को लगन से प्राप्त कर लेना ही उचित है। अतएव इस समय में सेवा रूपी हीरे जवाहर एकत्र कर लो।'' उस समय मिट्टी से ट्रक भरने की सेवा चल रही थी। बाकी सेवक 20 ट्रक मिट्टी प्रतिदिन भरा करते थे। उस दिन चार विद्यार्थियों के मिलने पर श्री आज्ञा हुई कि तीस ट्रक मिट्टी भर कर छुट्टी करनी है।
श्री आज्ञा पाते ही सभी सेवक प्राणपन से जुट गये। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी "नया गाँव' टपरा (जिसे आजकल छतरी कहते हैं) में विराजमान थे। प्रेमी पूर्ण उत्साह से सेवा कर रहे थे। दोपहर को श्री सद्गुरुदेव महाराज जी प्रसाद देकर विश्राम गृह लौट गये। सेवक रात्रि के आठ बजे तक सेवा में जुटे रहे, परन्तु ट्रक अभी 23 ही भर पाए थे। सेवकों के दिल में यह विचार था कि तीस ट्रक पूरे करने ही हैं। श्री दर्शन खुलने का समय हो गया, परन्तु कोई भी अपने काम से तिल भर न हिला।
कुछ अन्य सेवा पर काम करनेवाले सेवक अपनी सेवा समाप्त कर श्री दर्शन के लिए तैयार होकर घर में बैठे थे। महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी भी "नया गांव' में मौजूद थे। उन्होंने पहले तो ट्रक भरने वाले प्रेमियों को कहा कि अब छुट्टी करो, श्री दर्शन का समय हो गया है। परन्तु सबने यही उत्तर दिया कि रात का चाहे एक बज जाये हम तो श्री वचन पूरे करके ही छुट्टी करेंगे। महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी सबके कमरों में गए (जो प्रेमी श्री दर्शन के लिए तैयार बैठे थे उन के पास) और कहा कि देखो! कैसी अमूल्य दात लुटाई जा रही है और आप आराम से घर में बैठे हो, चलो सेवा करो। सब अन्य प्रेमी भी वहां उपस्थित हो गये।
चाँदनी रात थी, चाँद भी इस सेवा में संलग्न हो गया कि कहीं अन्धकार हो जाने पर सेवा में बाधा न आए। एक ओर से ट्रक, दूसरी ओर से ट्राली, तीसरी ओर से डम्पर, इसप्रकार के हार्नों ने आकाश को एक नये जयघोषों से गुँजित कर दिया। ऐसा लगता था मानो गगनमंडल में सितारे तथा देवतागण भी इस सेवा में उपस्थित होकर लाभ उठा रहे हैं। ऐसी भीड़ हो गई कि एक मिट्टी की डलिया को हाथ लगाने को भी विनय करनी पड़ी। कुछ समय में सात ट्रक भी भर गए और सब काम पूरा हो गया। सभी जयकारों से नभ को गुँजाते हुए श्री दर्शन के लिए चल दिये।
कितनी विचित्र लीला है कि जिस प्रभु की मिलन की लगन में हज़ारों वर्ष की तपस्या भी फलीभूत होनी कठिन होती है, वही भक्तवत्सल कुल मालिक प्रेमियों की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब प्रेमी आएँ और श्री दर्शन खुलें। प्रेमी, गुरुमुख श्री दर्शन  के लिए सीधा ही श्री दर्शनहॉल में पहँुचे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी भोजन लंगर से मंगवा कर प्रतीक्षा कर रहे थे। पहुँचते ही पहले नर लीला के रूप में फ़रमाया कि इतनी देर क्यों लगा दी। फिर सबको अपने सम्मुख खाना खिलाया। इसके बाद श्री दर्शन, सत्संग व प्रवचन हुए। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया---""हिम्मते मर्दां, मददे ख़ुदा। जब इन्सान हौंसला बांधकर काम करता है तो कुदरत उसकी मदद करती है। फिर आप तो ठहरे गुरुमुख, आप यदि सेवा में पूर्ण रुचि से जुट जाओ तो दैवी शक्तियां स्वयं तुम्हारी मदद करने के लिए आएँगी।''
इस प्रकार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने मिट्टी तथा खाद डलवाकर ज़मीन में अंगूर लगवाये। उन्होंने जो कुछ किया सब हम जीवों की ख़ातिर किया। आप उन विद्यार्थियों को फ़रमाया करते----(निज कर-कमलों में नाशपातियों के गुच्छे बनाकर उन्हें दिखाते) ""इस तरह अंगूरों के गुच्छे नीचे की ओर लटकेंगे। अब आप सेवा कर रहे हो फिर जब यहां आओगे तो तुम्हारी सेवा फल लायेगी। ये गुच्छे भी इसी तरह लटकेंगे। यहां इतने अंगूर होंगे कि संभाले भी न जा सकेंगे। फिर तुम खूब अंगूर खाओगे।'' अर्थात् श्री सद्गुरुदेव महाराज जी दर्शा रहे थे कि किए हुए कर्मों का फल मिलता है। यदि सेवा करोगे तो अच्छा फल मिलेगा।

Sunday, October 16, 2016

16.10.2016

यहां एक बार आपने निज मौज से फ़रमाया----""यह एक छोटा श्री आनन्दपुर है। यह लगभग श्री आनन्दपुर की तरह ही बनेगा। उदाहरणतया श्री मन्दिर, तालाब, पार्क, बाग़-बगीचे, सत्संग हाल, संगतों के निवास की जगह तथा स्नान के लिए टैंक व लंगर आदि यहां होंगे।'' बिजली व मोटरें भी आपने लगवार्इं जिससे कि बग़ीचोंे व खेतों की सिंचाई की जा सके। आपने उरुली कांचन के स्थान को छोड़कर "नया गांव' को सत्संग का केन्द्र बनाया। यहां पर श्रीदर्शन के लिए संगतें आने लगीं। जब प्रथम बार नया गाँव में संगतें आर्इं तो आपने श्री प्रवचन फ़रमाए----
""अनुकूल भोजन के सेवन करने से ही शरीर स्वस्थ रह सकता है। भोजन सेहत के लिए खाया जाता है। प्रतिकूल भोजन शरीर को हानि पहुँचाता है। कोई भी वस्तु जो शरीर के अनुकूल नहीं, केवल जिह्वा के स्वाद के लिए खा ली गई हो, उससे हानि ही हानि है, लाभ कुछ नहीं होता।
इसी तरह कर्म भी जो मनुष्य करता है मनुष्य को सोचना चाहिये कि अमुक कर्म जो मैं कर रहा हूँ मेरे अनुकूल है या प्रतिकूल। यदि कर्म अनुकूल नहीं हैं तो वे भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। जैसे प्रतिकूल भोजन  मनुष्य को हानि पहुँचा सकता है, इसीतरह से प्रतिकूल कर्म भी मनुष्य को हानि पहुँचाते हैं। यही कारण है कि यह जीव हर समय दुःखी और अशान्त रहता है। बुरे कर्म करने से यह जीव चौरासी लाख योनियां खरीद बैठता है। चौरासी लाख योनियां अपने किये कर्मों का फल है। अत: मनुष्य को पहले से ही सोच समझकर कर्म करने चाहियें। ऐसे कर्म नहीं करने चाहियें जिनका परिणाम दुःख, परेशानी, कलपना और अशान्ति है। फ़कीरों का कौल है----
।। शेअर ।।
अज़    मुकाफ़ाते---अमल    ग़ाफ़िल    मशौ ।
गन्दुम   अज़   गन्दुम   बिरौयद   जौ   ज़ि   जौ ।।
सन्तों का कथन है कि ऐ मनुष्य! कर्मों के परिणाम से गाफ़िल न हो। क्योंकि जैसे गेहूँ बोने से गेहूँ की फसल मिलती है और जौ के बोने से जौ की फसल पैदा होती है, इसी तरह से जिस प्रकार के कर्म भी किए जायेंगे, उसीके अनुसार ही प्रकृति की ओर से फल मिलेगा। अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल दुःखदायी होगा। इसलिए सन्त महापुरुष पहले से ही जीव को समझाते व चेतावनी देते हैं कि ऐ मनुष्य! अब भी समय है कि तू सोच-समझकर कर्म कर ताकि बाद में तुझे पश्चात्ताप न करना पड़े।
अब प्रश्न यह है कि कौन-से कर्म अच्छे हैं जिनके करने से मन में शान्ति पैदा होती है और कौन-से कर्म मनुष्य को दुःखदायी बनाते हैं जिनके करने से चौरासी लाख योनियां भोगनी पड़ती हैं। सन्त महापुरुषों ने मनमति के अनुसार मोह-माया, अहन्ता, ईष्र्या, तृष्णा व वासनाओं के ख़्यालों के निमित्त किए गए कर्म बुरे कर्म कहे हैं। इनके करने से मनुष्य के मन में मानसिक रोग (आधि, व्याधि, उपाधि) बढ़ जाते हैं और मनुष्य के विचारों में अशान्ति व क्लेश पैदा करते हैं। कलह-कलपना बढ़ जाती है। मनुष्य हर समय चिन्ता की अग्नि में जलता रहता है। इसलिए ऐसे कर्मों के न करने का सन्त महापुरुष उपदेश देते हैं।
सन्त सद्गुरु की सेवा, सद्गुरु-शब्द की कमाई, सत्संग, सबके प्रति हित की भावना---ये अच्छे कर्म हैं। इन कर्मों के करने से मन में शान्ति व आनन्द की प्राप्ति होती है। इसलिए ऐ जीव! तुम ऐसे कर्म करो जिससे तुम्हारा यह जीवन सुख से व्यतीत हो और मृत्यु के बाद भी तुम्हारी रूह को नरक योनियां न भोगनी पड़ें। परन्तु मनुष्य अपनी समझ से अच्छे कर्म करने का मार्ग ढूँढ़ नहीं सकता। इसलिए समय के सन्त-सद्गुरु की संगति में ही इस जीव को भक्ति व ज्ञान का मार्ग मिल सकता है जिसपर आचरण करने से ही मनुष्य सुख व शान्ति प्राप्त कर सकता है।''

Tuesday, October 11, 2016

05.10.2016

सन् 1958 की बात है कि श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पादशाही जी) नया गाँव (श्री प्रयागधाम) में विराजमान थे, यहां बावली की खुदाई का सेवा कार्य चल रहा था। सब प्रेमी दिलोजान से सेवा में लगे हुए थे। समीप ही एक टपरा में जहां आजकल छतरीनुमा गोल कमरा बना हुआ है, श्री सद्गुरुदेव महाराज जी विराजमान थे। समय दोपहर का 1 बजे का था, गर्मी का मौसम था। इसी समय कुछ विदेश में रहनेवाले प्रेमी-भक्त श्री दर्शनों के लिए आये। श्री चरणों में उपस्थित हो श्रद्धा सहित दण्डवत्-प्रणाम किया। श्री गुरुदेव ने आशीर्वाद देकर उन्हें अमृत तुल्य वचनों से कृतार्थ किया।
आपके पावन दर्शन कर एवं अमृतमय प्रवचन सुनकर वे सब प्रेमी आनन्द-विभोर हो उठे एवं अपने अपने देश को श्री चरणों से कृतार्थ करने के लिए करबद्ध हो विनय करने लगे कि स्वामी जी! भारतवर्ष पर तो आपकी अत्यन्त कृपा है। प्रान्त-प्रान्त और नगर-नगर में कृपाकर आप प्रेमी जिज्ञासुओं को श्री दर्शन व अमृत प्रवचनों द्वारा सत्य पथ दर्शाकर नाम-भक्ति के सच्चे धन से निहाल कर रहे हैं एवं जगह-जगह आत्मिक सुख व शान्ति प्राप्त करने के लिए सत्संग केन्द्र बना दिये हैं। क्या हम पर भी कभी ऐसी कृपा होगी? विदेश में जहां चारों ओर माया ही माया का बोलबाला है, भक्ति-नाम, आत्मिक सुख व शान्ति का नाम भी नहीं और हम जैसे जीव इस माया की झूठी चमक दमक को देखकर भूल जाते हैं। क्या वहां भी कभी आपकी कृपादृष्टि होगी? हमारे भी कभी भाग्य खुलेंगे? क्या हमारे भी गृह आप अपने चरण-कमलों से पवित्र करेंगे? प्रभो! इन देशों में भी कृपा कर अपने पावन दर्शन एवं अमृतमय प्रवचनों से इन भूले-भटके जीवों को सद्मार्ग दर्शाकर सच्चा सुख व परम शान्ति प्रदान कीजिये।
भक्तजनों की भावपूर्ण प्रार्थना सुनकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने उन्हें धैर्य देते हुए फ़रमाया कि ""हम आपकी श्रद्धा-भावना से अति प्रसन्न हैं। घबराओ नहीं। आप देख ही रहे हैं कि इस अवस्था में तो हम वहां जा नहीं सकते (क्योंकि उस समय आपकी पवित्र सेहत बहुत ही सुकोमल थी) मगर हम वायदा करते हैं कि समय आने पर स्वस्थ होकर हम आप सबके पास अवश्य आयेंगे। यह पारमार्थिक कार्य तो धुर-दरगाह से हमारे ज़िम्मे है। हमने श्री आनन्दपुर की महिमा और श्री परमहंस अद्वैत मत का सन्देश सृष्टि भर में जन-जन तक पहुँचाना है।'' आपकी ऐसी भविष्यवाणी तथा ऐसे सुमधुर वचन सुन कर प्रेमी भक्तजन गद्गद हो अपने भाग्य सराहने लगे एवं खुशी में सद्गुरु-महिमा का गुणानुवाद करने लगे।
आज हम इन्हीं श्री वचनों को साकार रूप में देख रहे हैं। श्री पंचम रूप में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी अथक परिश्रम करके श्री परमहंस अद्वैत मत का अमर-सन्देश देश-विदेश के कोने-कोने में जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। जगह जगह पर प्रेमी जिज्ञासु आत्माओं के लिए श्री परमहंस अद्वैत मत के सत्संग केन्द्र बन गए हैं, जहां पहुँचकर अनगिनत जीव भक्ति, नाम और सत्संग से लाभान्वित होकर सच्चे सुख, शान्ति और आनन्द को प्राप्तकर जीवन सफल बना रहे हैं।

Wednesday, October 5, 2016

श्री प्रयागधाम आश्रम..........

श्री प्रयागधाम आश्रम..........
उरुली कांचन (दयाल धाम) का स्थान संगतों के लिए छोटा था, क्योंकि आपके आगमन का समाचार शीघ्रातिशीघ्र महाराष्ट्र तथा आन्ध्र प्रदेश के सब श्रद्धालुओं तक फैल गया। प्रेमी जिज्ञासु अधिकाधिक संख्या में श्री दर्शनों के लिए आने लगे। आपकी मौज इस स्थान पर (नया गांव में) जल्दी विराजमान होने की थी। अतएव आप श्री आनन्दपुर से काफ़ी संख्या में सेवक साथ ले आते और सेवा कराते। इस बार भी जब श्री आनन्दपुर से उरुली कांचन पधारे तो 50--60 महात्मा व भक्त बस में साथ ले आये।
एक दिन आपने सब भक्तों व महात्माजनों को फ़रमाया---""चलो आज तुम्हें एक नई जगह पर ले चलें जहां किसी का आना जाना नहीं है, जो एक स्वतंत्र जगह है। आप सब लोग अपने-अपने सेवा के औज़ार लेकर हमारे साथ चलो। आज हम आपको उस स्थान पर ले चलेंगे जहां सत्संग का (महाराष्ट्र का) मुख्य केन्द्र बनाना है। वहां आज सेवा का प्रारम्भ कर आश्रम का उद्घाटन करना है।'' सब सेवक बड़ी उमंग के साथ सेवा के लिए तत्पर होकर हर्ष से कार के साथ-साथ चल दिये। मार्ग में गांव वाले उचक-उचक कर देखते कि इस निर्जन स्थान की ओर यह दल कहां से आ गया। जिन गांव वालों ने इस सड़क पर कभी साइकिल चलती न देखी, वे देख रहे थे कि कार बड़ी मस्ती से पत्थरों व ऊबड़-खाबड़ रास्ते को पार करती हुई आगे बढ़ रही है। साथ में महात्मा व भक्तजन हैं।
कार के मार्ग में बड़े-बड़े पत्थर बार-बार मार्ग रोक लेते। महात्मा व भक्तजन मिलकर उन पत्थरों को उलट-पलट कर एक ओर कर देते तथा कार को मार्ग मिल जाता। ऐसा लगता था मानो ये पत्थर भी गुरुमुखों की तथा श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की बाट जोह रहे थे कि कब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी हमें दर्शन दें और गुरुमुखों के हाथों हमारा भी उद्धार हो। गांव वाले यह देखकर चकित हो रहे थे कि कैसे भक्तजन पत्थरों को एक तरफ़ सरका कर मार्ग बनाते जा रहे हैं। इतने भारी पत्थर जिन्हें बिना किसी यन्त्र के हिलाना भी कठिन था, भक्तजन एक साथ मिलकर उन्हें उलट पलटकर एक ओर करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। इसी प्रकार सच्चे प्रेमी सेवक श्री इष्टदेव मालिक श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी के साथ "नया गांव' में एक पथरीली धरती पर पहुँचे।   
यहां पहुँचकर आपने कार को रुकवा लिया। यह धरती काले-काले पत्थरों से भरी हुई थी। आप कार से नीचे उतरे और कुर्सी पर विराजमान हो गये। आसपास सेवकों को बैठाकर श्री वचन फ़रमाये----""यह सामने एकत्रित पत्थरों के समूह के आकार की एक पहाड़ी है। इन पत्थरों को जो कि बीच में पड़े हुए हैं, पहाड़ी के मध्य में दीवार के आकार में जोड़ने हैं। ध्यान रहे कि कोई भी पत्थर नीचे न जाने पाये। नीचे किसी को नहीं गिराना। ऊपर चढ़ाने का प्रयत्न करना है।'' पुन: सेवकों को दो भागों में बाँटकर प्रसाद दिया और सेवा करने का आदेश दिया।
जब आसपास के लोगों ने यह सुना व देखा कि इन महात्मा लोगों ने  यह ज़मीन ख़रीदी है जो पथरीली है यानी बेकार है, जिस ज़मीन को हमारे दादा-परदादा ने भी कभी आँख उठाकर न देखा था, वही इन्होंने ली है, तो वे परस्पर कहने लगे कि महात्मा लोग इस ज़मीन को कैसे आबाद करेंगे। थोड़ा ज़ोर लगा लें आख़िर तो ये भी छोड़ ही जायेंगे। उनको यह विदित न था कि उसके निर्माता स्वयं यहां विराजमान हैं। उनका संकेत ही सब कुछ कर सकता है। सेवकों में जो शक्ति भरी है वह क्या-क्या कर दिखायेगी। उन्हें क्या मालूम कि यह सन्त जंगल में मंगल कर देनेवाले हैं। बस कुछ ही दिनों में वह पहाड़ी के आकार में पत्थरों से ढकी हुई धरती दीवार के रूप में समतल खड़ी हो गई। एक वर्ष में जबकि श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी केवल दो-तीन बार एक-एक मास के लिए यहां पधारते थे, यहां मकान बन गए, बावली खोदी गई, पत्थरों की चारदीवारी (सीमा) भी बन गई। अब वे गाँव के लोग जान गये कि यदि एक वर्ष में इतना कुछ हो गया तो इससे आगे न जाने क्या क्या हो जायेगा।

Sunday, October 2, 2016

20.08.2016

सेवकों ने श्री आज्ञा पाकर उस ओर कदम बढ़ाया, उस भूमि पर पहुँच गये जहाँ श्री मौज थी। किन्तु वहां की ज़मीन इन्हें पसन्द न आई, क्योंकि वह तो पथरीली ज़मीन थी। जहां दृष्टि डालो पत्थर ही पत्थर दिखाई देते थे। हरियाली के लिए नाम मात्र को भी कोई पेड़ या पौधा नहीं था। उन्होंने थोड़ी से ज़मीन खोदकर देखी तो नीचे सब पत्थर ही पत्थर थे। उन्होंने परस्पर परामर्श किया कि यह ज़मीन तो बहुत ही पथरीली तथा ऊबड़-खाबड़ पत्थरों से भरी हुई है शायद हम भूल से यहां आ पहुँचे हैं। उन्होंने इससे आगे कदम बढ़ाये, नदी के समीप उससे थोड़ी अच्छी ज़मीन देखकर उसे खरीदने का विचार किया। श्री चरणों में लौटकर भूमि का सब ब्योरा कह सुनाया।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी भविष्यद्-द्रष्टा, घट घट के ज्ञाता ही यह जानते थे कि कहां क्या करना है। फ़रमाया कि चलो हम साथ चलकर देखते हैं। रास्ता बैलगाड़ियों के जाने योग्य भी न था, फिर भी कार में विराजमान होकर अनेक जम्प व कष्टों को सहते हुए उस भूमि पर आ पहुँचे, जिसे सेवकों ने बेकार और पथरीली समझ कर उपयोगी न समझा था। आपने कार रुकवाली और फ़रमाया- "यही भूमि हमारे काम की है। यही सत्संग का वास्तविक स्थान है। इसी को हमने महाराष्ट्र का मुख्य केन्द्र बनाना है। इसके लिए ही तो हमने इतने स्थान खरीदे हैं। यही वास्तविक स्थान है।" सभी सेवक चकित थे कि इसी स्थान को ही तो हमने बहुत सख्त व बिगड़ा हुआ जानकर छोड़ दिया था। इन बड़े-बड़े पत्थरों पर मकान कैसे बनेंगे। वे इसी सोच में ही थे कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया कि "बिगड़े हुओं को सुधारना ही सन्त महापुरुषों का ध्येय है।" तुम सरकारी कानून अनुसार इस भूमि को खरीद लो। आपने इस पथरीली भूमि के भाग्य स्वयं आकर जगाये। इस धरती ने आपके इस अत्यन्त उपकार के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद दिया तथा अपने भाग्यों पर इठलाने लगी कि अब तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी मुझे कभी-कभी अवश्य श्री चरण-स्पर्श प्रदान कर कृतार्थ करते रहेंगे। सेवकों ने आज्ञा प्राप्त कर 24 जून 1957 को इस स्थान को ख़रीद लिया, जिसका शुभ नाम उस समय 'नया गांव' था जो कि वर्तमान समय में श्री प्रयागधाम के नाम से विख्यात है। आप स्वयं उरुली कांचन लौट आये ।