Tuesday, August 23, 2016

19.08.2016

इसके पश्चात आप सब सेवकों को साथ लेकर उस स्थान का निरीक्षण करने आये। आपने फ़रमाया- "अभी तो यह स्थान कुछ समय के लिए काम आयेगा, लेकिन जो वास्तविक स्थान हमें ज़रूरत है उसको अभी खोजना है।" महापुरुषों से क्या बात छिपी होती है। वे त्रिकालदर्शी होते हैं। अपने सेवकों की सेवा बनाने के लिए वे रचना रच देते हैं। वे सेवकों को सेवा का अवसर प्रदान कर लोक-उपकार का कार्य करते हैं। इससे सेवकों की गढ़त भी होती रहती है और साथ साथ उनके मन की अवस्थाओं की जाँच भी होती रहती है। इसे ख़रीदने का आज्ञा प्रदान की ताकि यहां परमार्थ-कार्य आरम्भ हो जाये।
      5 सितम्बर 1952 को उरुली कांचन (दयाल धाम) का यह स्थान ख़रीद लिया गया। यहां पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी समय-समय पर पधार कर सत्संग-उपदेश की पावन धारा बहाने लगे तथा साथ ही श्री दर्शन से जन-जन को कृतार्थ करने लगे। इसके साथ-साथ सेवा का कार्य भी आरम्भ करवा दिया। बड़े-बड़े कमरे निवास के लिए, भजनशाला, सत्संग हॉल, ब़गीचा व चारदिवारी बनवाई। वहां पर जो बावली खुदवाई, उसका पानी डॉक्टरों ने परीक्षण कर पूरे इलाके भर के पानी से प्रथम स्तर का बताया। आपने जहां भी श्री मौज अनुसार पानी निकलवाया, वहां ही स्वादिष्ट मधुर जल निकला। जहां भी श्री मौज के अनुसार आपने कार्य करवाये, वहां से यदि अमृत का स्त्रोत भी बह जाता तो असम्भव नहीं था। यहां पर बम्बई, पूना, कल्याण व हैदराबाद से संगते आकर श्री दर्शन, सेवा तथा सत्संग का लाभ उठाने लगीं।
इसके साथ-साथ आपकी उस वास्तविक स्थान की खोज के लिए भी मौज बनी हुई थी। उसका कार्य भी सेवकों से आरम्भ करवाया। आपने सेवकों को इस क्षेत्र के आसपास का स्थान ढूँढने की आज्ञा दी। उन्होंने उरुली से 10 मील की दूरी पर 'येवत' नामक शहर में कुछ ज़मीन खरीद कर वहां मकान, बावली और चारदिवारी पत्थरों की बनवाई। इसके बाद इसी उरुली स्थान से एक मील दूरी कच्ची सड़क पर कोरे गाँव (पूर्ण धाम) की कुछ ज़मीन खरीदी गई। इतनी ज़मीन खरीद लेने पर भी आपकी मौज जिस स्थान को पवित्र करने की थी वह पूरी न हुई। आपने फ़रमाया- वह स्थान ओर है जहां हमारा प्रयोजन सिद्ध होगा। हमने सत्संग का बड़ा आश्रम बनाना है। फिर सेवकों को स्पष्ट रूप से फ़रमाया- ''आप कोरे गांव (जो कि छोटा स्थान खरीदा है) से लगभग एक मील दूर, नदी से आध फ़र्लांग इस ओर ज़मीन देखो, वह उपयुक्त स्थान रहेगा।"

Wednesday, August 17, 2016

13.08.2016

नया गांव (श्री प्रयागधाम)
परमार्थ-लाभ कराने हेतु आपको मानव-हृदय आर्त्त स्वर से पुकार रहे थे। प्रेमियों की विह्वल पुकार ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को विवशतापूर्वक खींचा। आप जहां भी कृपा फ़रमाते, वह धरती तथा मिट्टी पवित्र बन जाती। मानव, दानव-वृत्तियों को त्यागकर देव-वृत्तियों को धारण कर लेते। माया व मन अपना सा मुँह लेकर रह जाते। उस धरती के कण-कण में हर्ष समा जाता। आपको बम्बई, पूना, शोलापुर, कोल्हापुर, कल्याण, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) के प्रेमी विनय कर रहे थे। वे इतनी दूर श्री आनन्दपुर में सुगमता से श्री दर्शन न कर सकते थे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की मौज भी यही थी कि भारत के कोने-कोने में इस नाम की ज्योति की किरणें पहुँचे अतएव भक्तों के आग्रह करने पर आपकी मौज यह हुई कि महाराष्ट्र में भी कोई आश्रम बनाना चाहिए जहां आकर संगतें श्री दर्शन व सत्संग का लाभ उठा सकें।
      आपने अपनी हार्दिक उमंग तथा दिव्य-दृष्टि से ज़िला पूना को सत्संग के लिए उचित क्षेत्र चुना और श्री मौज उठी कि इसके आस-पास की भूमि खरीदी जाए। यहीं पर ही आश्रम बनाया जाए, क्योंकि यहां का जलवायु स्वास्थयप्रद है। आपने अपने सेवकों महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी, महात्मा दर्शन प्रेमानन्द जी व महात्मा सद्गुरुसेवा नन्द जी को आज्ञा दी कि शोलापुर रोड़ पर किसी अच्छे स्थान को ढूँढ़ो। आपस में परामर्श करो फिर हम वहां जायेंगे। स्वयं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी पूना शहर में किसी स्थान पर विराजमान थे। सेवकजन श्री आज्ञा मानकर शोलापुर रोड़ की तरफ गए। रास्ते में ज़मीनें देखने लगे, क्योंकि बहुत दूर तो जाना नहीं था। पूना से 18 मील की दूरी पर उरुली कांचन बसा हुआ है, इसलिए वहीं ज़मीन देखने लगे। वहां पर इन सेवकों को एक भक्त सख़ावतमल मिल गया जो उपदेशी भी था और वहां के लोगों से परिचित भी। भक्त सखावत मल की सहायता से उरुली शहर से एक मील की दूरी पर पूना की ओर सड़क के समीप इन्हें एक भूमि जँच गई, वहां चार-पांच कमरे भी बने हुए थे। उस भूमि के मालिक से मिलकर ज़मीन के विषय में सब कार्यवाही कर श्री चरणों में पहुँचकर सब वृतान्त निवेदित किया।

Saturday, August 13, 2016

11.08.2016

श्री सद्गुरुदेव महाराज जी सर्वदा कुछ दिन बाहर लगाकर अपने मुख्य केन्द्र श्री आनन्दपुर में ही कृपा फ़रमाते थे। इधर श्री आनन्दपुर में भी सेवा का कार्य बड़े ज़ोर से चल रहा था। आप कुछ दिन बाहर लगाकर पुनः प्रेमियों को कृतार्थ करने के लिए यहां पधारे। अब यहां पक्के मकान तैयार हो रहे थे। भूमि उपजाउ बनाई जा रही थी।
एक पटवारी ज़मीन का निरीक्षण करने आया। उसने सरकारी नियमानुसार यह लिखना था कि कितनी भूमि बंजर है और कितनी उपजाऊ है। उस समय जिस भूमि का कार्य आरम्भ था, दो-चार दिनों के पश्चात् उसने उपजाउ के योग्य बन जाना था। उसके विषय में पटवारी ने बंजर भूमि के नाम लिख दी। सेवकों ने भी श्री चरणों में विनय की कि प्रभो! पटवारी तो इसे बंजर के नाम लिख रहा है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया कि उसे कहो कि इस ज़मीन को उपजाऊ लिखे। सेवकों ने पटवारी को बहुत समझाया कि दो-चार दिनों में यह उपजाऊ बन जायेगी, अतः यहां उपजाऊ शब्द लिखो। पटवारी ने उत्तर दिया कि यह ज़मीन तो पांच वर्ष में भी उपजाऊ बननी कठिन है। दो-चार दिनों का झूठ लिखा जा सकता है न कि इतना बड़ा झूठ! उसे क्या मालूम था कि यहां तो प्रकृति के स्वामी एक संकेत से जो कुछ करवाना चाहें करवा सकते हैं। उनके सामने यह साधारण सी बात है।
      पटवारी यहां से चल दिया। जब दफ़्तर में जाकर फाइलों में नोट करने लगा तो वही 'भूमि' उपजाऊ शब्द में लिखी गई। उसने फाईल बन्द की और घर की राह ली। पांच दिन पश्चात जब सने फाईल खोली तो अपनी कलम से 'उपजाऊ' शब्द लिखा पाया। वह हैरान था कि यह कैसे लिखा गया। पुनः वह श्री आनन्दपुर में उसी दिन आ गया। उस ज़मीन में बीज बोया देखकर उसके आशचर्य की सीमा न रही। उसने मन में समझ लिया कि यह महापुरुष मानवी शक्ति से परे हैं। उसने सेवकों के सम्मुख दर्शन करने की इच्छा प्रकट की। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने विनय स्वीकार कर उसे श्री दर्शन से कृतार्थ किया। उसने अपनी भूल पर श्री चरणों में क्षमा के लिए याचना की। आपने फ़रमाया कि यहां तो कुदरत की सभी शक्तियां स्वयं काम कर रहीं हैं। आप तो किसी न किसी साधन से पथ-भटकी रूहों को मार्ग पर लगाना चाहते थे। उस पटवारी को इस साधन से श्री दर्शन का अवसर मिला और उसने नाम उपदेश लेकर अपने जीवन का रुख़ सत्य-पथ की ओर मोड़ा।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी प्रत्येक दिन नये कार्यक्रम, नई रचना, नई उमंगों व प्रेमियों में नया साहस भरकर नई युक्ति से भक्ति का अमृत पिलाते। कभी प्रेमियों को सैर के लिए तासबावली ले जाते, वहां अनुपम लीलाएँ करते तथा साथ में सेवा कार्य भी करवाते तो कभी चक दयालपुर में ले जाते और कभी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री वचन तथा मौज के अनुसार श्री आनन्दपुर में नव-निर्माण की रूप रेखाओं को साकार रूप देने के लिए सेवा की धुन लगाते। प्रेमी तो प्रेम की डोरी में खिंचे चले आते। उनके लिए तो आपकी मौज तथा श्री आज्ञा पर चलकर प्रसन्नता प्राप्त करना ही जीवन था। आपकी मौज श्री आनन्दपुर में जिज्ञासुओं तथा दर्शार्थ संगतों के लिए 'श्री आनन्द भवन शिमला' बनाने की हुई। इसके साथ-साथ पानी की कमी को पूरा करने के लिए बोरिंग तथा अन्य कार्यों को पूरा करने की योजना बनाई। इधर महाराष्ट्र की धरती आपके श्री मृदुल चरण-स्पर्श कराकर पुण्यवती बनने के लिए पुकार रही थी। जिस ओर से प्रेम की आतुर पुकार आपको बुलाती आप उधर ही प्रेम के आगार बनकर उस करुण गुहार को सुनते।

Thursday, August 11, 2016

10.08.2016

एक दिन की बात है गर्मी तथा थकावट के कारण सब महात्मा व भक्तजन विश्राम के लिए बैठ गए। नौकर काम पर लगे हुए थे। एक घनी कंटीली झाड़ी को छोड़कर वे आगे बढ़ गए। आपने वहां कृपा करी। सभी सेवक उठ खड़े हुए।  आपने जहां-तहां निहारा कि कितना क्षेत्र साफ हो गया है। उस झाड़ी की तरफ संकेत कर आपने फ़रमाया –“ यह झाड़ी क्यों छोड़ दी गई है?” सेवकों ने विनय की- प्रभो! नौकरों से यह उखाड़ी नहीं जा रही थी, इसलिए उन्होंने छोड़ दी है। श्री वचन हुए कि जब तक स्वयं कांटों में हाथ नहीं डालोगे, तो औरों से क्या सेवा करवाओगे!
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी स्वयं सेवा के आदर्श थे। वे सेवकों को भी वही आदर्श बनाना चाहते थे। श्रीवचनों को सुनते ही सबके सब ऐसे सेवा में जुट गए कि किसी को भी न दोपहर की गर्मी, न दिनभर के विश्राम की सुधि रही। उन महात्मा जनों का कथन है कि हमने उस दिन से कुर्ते पहनने छोड़ दिये, बुनियान व धोती पहने सारा दिन श्रीसेवा में संलग्न रहते। हमें जो अपूर्व आनन्द उस समय मिला शायद ही ज़िन्दगी में कभी मिला होगा।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने दर्शाया कि अपना आचरण ही उपदेशों से कहीं अधिक प्रभावशाली होता है। परिणामस्वरूप कुछ दिनों में यह वन साफ़ हो गया और यहां आश्रम की स्थापना की गई, जहां पर समयानुसार आप एकान्तवास के कृपा फ़रमाते। कभी-कभी संगतों को भी श्री दर्शन का यहां सुअवसर दिया जाता। एक बार यहां कुछ प्रेमियों के सम्मुख आपने श्री प्रवचन फ़रमाए-
       “भक्ति और योग में कितना अन्तर है? भक्ति के सम्मुख ज्ञान-योग-साधन कुछ नहीं, क्योंकि इन सबकी पहुँच केवल बुद्धि तक है। बुद्धि से आगे का मार्ग वास्तविक प्रेम का मार्ग है जो सबसे ऊँचा है, क्योंकि बुद्धि से परे का स्थान आत्मा है। वहां तक प्रेम की पहुँच है बुद्धि की नहीं। विज्ञान ने जितनी भी वस्तुऐं बनाई हैं, सब बुद्धि की साहयता से बनाईं हैं। परन्तु इससे आगे की मंज़िल तक विज्ञान द्वारा कोई नहीं पहुँच सका। गुरुमुख व प्रेमी की सब कार्यवाही दिमाग़ व बुद्धि से परे  की होती है अर्थात वास्तविक प्रेम के मार्ग पर आरूढ़ होती है। वह सदा अपने इष्ट के प्रेम में मग्न रहता है। प्रेम-भक्ति व निष्काम सेवा के बराबर कोई साधन नहीं। जब प्रेमी का लगाव अपने इष्टदेव सद्गुरु के शब्द से जुड़ गया तो योग और वैराग्य में कौन सी कमी रह गई। शब्द से सुरति जुड़ने का नाम ही योग है। संसार से उपरामता ही वैराग्य है। सच्चा प्रेमी बिना किसी अन्य साधन के प्रेम द्वारा ही मंज़िल तक पहुँच जाता है, क्योंकि प्रेमी का ध्यान अपने इष्टदेव की प्रसन्नता के अतिरिक्त कहीं भी नहीं जाता। बस! श्री आज्ञा, प्रेम और सेवा ही गुरु-भक्ति के सर्वोत्तम साधन हैं। यही सुगमता से मंज़िल तक पहुँचाते हैं। अतः प्रेमी गुरुमुख अपने लक्ष्य की ओर ध्यान रखते हुए उस मंज़िल को प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे रहें, इसी में ही जीव का लाभ निहीत है।”

Wednesday, August 10, 2016

09.08.2016

इस प्रकार समय-समय पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री वचनों द्वारा गुरुमुखों को चेतावनी देते रहते थे ताकि गुरुमुखों के विचारों में दृढ़ता बढ़ती जाए। सब गुरुमुखों-प्रेमियों को अपनी-अपनी सेवा पर लगाकर आप स्वयं सबकी देख-रेख करते और कुछ महात्माजन भी इसके लिए नियुक्त किए जोकि समयानुसार सब सुव्यवस्था और आवश्यकताओं की पूर्ति करते।
       एकबार आपकी मौज ऐसी उठी कि एक स्थान ऐसा भी होना चाहिए जहां पर कभी-कभी जाकर विश्राम किया जाए। महापुरुषों के लिए आराम कहां! वे तो केवल धरती, मानव तथा प्रकृति की प्रत्येक रचना में बनी हुई वस्तुओं की करुण पुकार सुनते हैं। घने बन, कंटीली झाड़ियां तथा एकान्त प्रकृति की गोद में खेलते हुए भूमि-खंड आपको श्री चरण-स्पर्श करने के लिए विवश करते थे, क्योंकि आपका कार्य कांटों में फूल खिलाना, प्रेम अमृत से सिंचित कर भाग्य जागान था। इसलिए आपने समयानुसार अपने परमार्थ की पूर्ति के लिए हर स्थान को पवित्र किया और जीवनपर्यन्त इसको करते रहे।
कुदरत के आंचल में, खड़ा हूँ मैं भी दामन पसारे।
सुन लो पुकार ऐ मांझी! बे-सहारों के सहारे ।।
हम भी ठूँठ काँटों के, बने जन्मों से प्रभु प्यारे ।
करो कृपा की इक दृष्टि , लगा दो हमको भी किनारे।।
       आप अपनी मौज के अनुसार मार्च 1950 ई. में मुरादाबाद और काशीपुर के मध्य में स्थित रोशनपुर में पधारे। यहां पर महात्मा परम योगानन्द जी, महात्मा सत विचारानन्द जी तथा भक्त दरयाई लाल जी को बुलवाया। रोशनपुर स्टेशन से दो मील की दूरी पर ग्राम लालपुर बहिराई में आप सेवकों सहित पधारे। यहां पर एक घना वन था जहां हाथ को हाथ न सूझता था, लेकिन महापुरुषों के भजनभ्यास के लिए एकान्त, शान्त, सुन्दर वातावरण था। एक स्थान पर यहां श्री सद्गुरुदेव महाराज जी पलंग पर विराजमान हुए। उसी स्थान ने मानो श्री चरणों का स्पर्श पाकर श्री चरणों में स्वीकृत होने के लिए विनय की। दीनबन्धु श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इस विनय को स्वीकार किया। उस स्थान को अपनी श्री मौज अनुसार उचित जानकर उसे खरीदने के लिए आज्ञा फ़रमाई और लौट आए।
       पुनः श्री व्यासपूजा के शुभ पर्व के पश्चात् अगस्त सन् 1950 में इस स्थान के भाग्य जगाने के लिए पधारे। श्री स्वामी जी श्री दर्शन पूर्ण आनन्द जी महाराज, महात्मा सत विचारानन्द जी, महात्मा सद्गुरु सेवा नन्द जी, महात्मा योग प्रकाशानन्द जी, महात्मा सन्तोषानन्द जी, महात्मा नित प्रेमानन्द जी, महात्मा दर्शन अलखानन्द जी, महात्मा भक्ति ध्यानानन्द जी, महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी, महात्मा शब्द विवेकानन्द जी, महात्मा पूर्ण श्रद्धानन्द जी, महात्मा अपारानन्द जी, भक्त पहलूमल जी (महात्मा परमात्मा नन्द जी), भक्त बलराम जी (महात्मा योग सत्यानन्द जी) तथा कुछ अन्य महात्मा व भक्त श्री आज्ञानुसार सेवा के लिए साथ गए। वहाँ पहुँच कर आपने घने वन को साफ़ करवाना आरम्भ कर दिया। ये सब श्री आज्ञा को शिरोधार्य कर सेवा में जुट गए। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी स्थान-स्थान से कांटों की सफ़ाई करवाकर यह दर्शा रहे थे कि इसी प्रकार भक्तिमार्ग में भी कांटे हैं। जो इन कांटों से नहीं डरता, वही भक्ति रूपी पुष्ट को प्राप्त कर लेता है। जैसे कांटों में उलझने पर पीड़ा अनुभव होती है, कभी रक्त भी बहने लगता है, इसीप्रकार भक्ति मार्ग में कष्टों से गुरुमुख को नहीं डरना चाहिए। इन कष्टों को सहन करके ही भक्ति की मंज़िल को प्राप्त किया जा सकता है। इस स्थान को साफ़ करने के लिए इन गुरुमुखों के साथ कुछ मज़दूर भी लगे हुए थे।

Tuesday, August 9, 2016

08.08.2016

इसप्रकार सन् 1947 के पश्चात् दिन प्रतिदिन शरणागतों की संख्या बढ़ती गई और आप सेवा का भण्डार बढ़ाते गये। आए हुए शरणागतों को आप समय-समय पर पावन प्रवचनों से कृतार्थ करते थे। आपने एक बार श्री वचन फ़रमाये-
“ मनुष्य को संसार में बड़े विचार से रहकर अपने कर्तव्य को हर तरह से ख़्याल में रखते हुए अपने जीवन का सफ़र तय करना है। समय अपना काम करता है, वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। अब इसी समय के अन्दर जिसने कुछ कर लिया,वह उतना ही लाभ प्राप्त करेगा। जिसने इस लक्ष्य को समझकर कुछ काम संवार लिया तो अच्छा है, नहीं तो गफलत और मन के धोखे में रहकर वह हानि उठायेगा। वास्तव में तो उसे लाभ प्राप्त करना था, परन्तु मन व माया के धोखे में आकर लाभ की अपेक्षा हानि प्राप्त की- मन व माया की लपेट में आकर वह चौरासी लाख यौनियों के चक्र में पड़ गया। जैसे रोशनी व अन्धेरा दो पहलू हैं, इसी तरह कुदरत की रचना में प्रत्येक वस्तु के दो पहलू हैं। सुख-दुःख, दिन-रात, सत्य-असत्य, बुरा-भला, आत्मा-शरीर, माया व भक्ति – सब के दो दो पहलू हैं।
       गुरुमुख पुरुष माया में बर्तते हुए भी भक्ति को ग्रहण करते हैं। जैसे व्यवहार में माया की प्राप्ति के लिए बहुत से कष्ट, बाधाएँ और परीक्षाऐं सामने आती हैं, इसीतरह परमार्थ व भक्ति के रास्ते में कईं बाधाओं का सामना करना पड़ता है। गुरुमुख इसी राह पर चलते हुए अपने आपको मन व माया के चक्कर से बचाकर भक्ति में सफलता प्राप्त करता है। जब जीव माया के पंजे में फँस जाता है तो उसे आनन्द का धाम भूल जाता है। लेकिन गुरुमुख पुरुष अपने सद्गुरु की शरण लेकर स्वयं को माया की लपेट से मुक्त कर लेता है जबकि मायावी जीव काम-क्रोधाति दुश्मनों के पंजे में आकर दुःखी रहते हैं।
       यदि गफ़लत में समय बीते और रूह को मुक्त न कर सके तो कितनी हानि है। केवल यह नहीं कि ज़िन्दगी के दिन पूरे करने हैं और खाना-पीना, पहनना और समय गफ़लत में गँवा देना है। जिसने मालिक की प्रसन्नता प्राप्त नहीं की उसने माया के चक्र में समय व्यर्थ गँवा दिया और कुछ लाभ प्राप्त न किया। कुदरत की तरफ से ऐसा अच्छा संयोग मिलने पर भी यदि ग़फलत के कारण माया का दबाव पड़ गया- माया ने ताकत पकड़ ली तो परिणाम ख़राब होगा। डालना तो माया पर दबाव है-यदि माया ने दबाव डाल दिया तो अत्यधिक हानि उठानी पड़ेगी।
       सत्पुरुष तो यही चाहते हैं कि वह कौन सा सौभाग्यशाली समय होगा जब जीव इस माया के घेरे से आज़ाद होगा। आया तो था माया से स्वतंत्र होने के लिए तथा मालिक की भक्ति के लिए, परन्तु बन गया माया का गुलाम। मालिक के दरबार में ऐसा नियम नहीं है कि किए हुए कर्मों का फल न मिले। कोई इन किये हुए कर्मों के फल से ग़ाफिल न रहे। वह तो कुदरत अवश्य देगी। सन्त महापुरुष इसी बात पर ज़ोर देते हैं चाहे कोई माने या न माने। माया एक तिलकन बाज़ी है। एक बार पांव फिसला तो बहुत गहरे गड्ढे में जा गिरेगा जिससे निकलना बहुत कठिन है। इस रास्ते में माया से पीछा छुड़ाना है। माया को पीठ देकर भक्ति प्राप्त करने का प्रयत्न करना है। इन सब पर नज़र रखते हुए सद्गुरु के वचनों पर आचरण कर जीवन का कल्याण करना है।
उदाहरणतया एक यात्री जब जंगल में चोरों-डाकुओं से घिर जाता है तो उस समय उसे परिवार, धन-दौलत कुछ भी याद नहीं आता, केवल वह अपनी जान बचाता है। इसी प्रकार सुरति मोह-लोभ-अहंकार आदि शत्रुओं से घिरी हुई है। यह सुरति शरीर, मन, इन्द्रियों के बन्धन में करोड़ों गुना अधिक आई हुई है, लेकिन जीव को पता नहीं चलता। इसे सद्गुरु के शब्द की कमाई के द्वारा आज़ाद करना है। सन्त महापुरुष जो कि त्रिकालदर्शी, परम चेतन शक्ति हैं, वे ही सब कुछ जानते हैं। जीव इस जन्म में आज़ाद हो गया तो अच्छा, नहीं तो बहुत भारी बन्धन में पड़ जायेगा जिससे निकला मुश्किल होगा।
       यह कोई रेलगाड़ी की यात्रा नहीं है  कि एक रेल से निकल जाने पर दूसरी गाड़ी पकड़ लेंगे और सफ़र तय हो जायेगा। रूहानी मार्ग में तो जन्म-जन्म का अन्तर पड़ जायेगा। यह एक ऐसा नाज़ुक रास्ता है जिसे केवल सन्त महापुरुष ही जानते हैं कि जीव काल और माया के चक्र से कैसे छुटकारा पा सकता है।
       यदि सद्गुरु की आज्ञा, मौज व वचनों पर विश्वास करके अमल करोगे, तो सब बन्धनों से आज़ाद हो जाओगे। सन्त महापुरुष जो कुछ भी करते हैं, जीव की भलाई के लिए करते हैं। वे केवल जीवों के कल्याण की ख़ातिर ही ऐसी रचना रच देते हैं ताकि प्रेमी-गुरुमुख सद्गुरु दरबार की सेवा आज्ञा व श्री मौज अनुसार करके भक्ति के हीरे-जवाहरात प्राप्त कर मालामाल हो सकें। गुरुमुखों का कर्तव्य है कि श्री वचनों पर आचरण करते हुए जीवन का कल्याण करें।’

Monday, August 8, 2016

06.08.2016

गुरुमुख प्रेमीजन सेवा करते। आप सेवा के स्थान पर जाकर उनको श्री दर्शन से कृतार्थ करते। आप श्री मुख से फ़रमाते थे कि प्रत्येक गुरुमुख को इन चार नियमों को प्रतिदिन पूरा कर लेना चाहिये- 1. श्री दर्शन 2. सत्संग 3. भजन 4. सेवा। आपने इन नियमों का परिपक्वता से परिपालन करवाया। सेवा में गुरुमुख प्रातः से संध्या तक जुटे रहते। श्री दर्शन तो करुणाकर आप ही उन्हें सेवा पर विराजमान होकर देते रहते। सत्संग का अर्थ ही यही है कि ‘सन्तों का संग’। यहां तो संतो के सिरमौर श्री इष्टदेव कुल मालिक स्वयं विराजमान थे और उनकी पवित्र संगति का सौभाग्य तो गुरुमुखों को मिल ही रहा था, फिर भी समय समय पर श्री दर्शनों का विशेष लाभ मिल जाता। उसी समय पावन सत्संग भी होता तथा कभी-कभी श्री मौज अनुसार स्वयं भी प्रवचन फ़रमाते थे। संध्या समय मूल मंत्र का जाप आप स्वयं करवाते थे। इन चार नियमों को बिना किसी कठिनाई के गुरुमुख पूरा कर लेते। शारीरिक निर्वाह की उन्हें चिन्ता ही क्या थी जबकि कुल मालिक स्वयं उनके प्राणधन थे। समय पर लंगर (भोजन) तैयार हो जाता। भोजन सेवा के स्थान पर पहुँचाने को सेवक तैयार होते, परन्तु गुरुमुखों को उस आनन्दमय अमृत को पीकर भूख-प्यास की चिन्ता ही न रहती थी। स्वयं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी निज कर-कमलों से श्री प्रसाद देते तो प्रेमीजन सेवा से थोड़ा अवकाश कर लेते।
कुछ जिज्ञासुओं ने श्री चरणों में सर्वस्व समर्पित कर शरणागत होने के लिए विनय की। आपने फ़रमाया- “भक्ति के नियमों पर चलते हुए लंगर का दाल-फुलका तथा साधारण पहरावा जिसे स्वीकार हो, उसके लिए यह सच्चा दरबार हमेशा खुला है जब भी चाहें आ सकते हैं। यहां आवश्यकता पूर्ति तो की जाती है परन्तु मन की इच्छाओं की पूर्ति नहीं की जाती।’’ उन प्रेमियों ने बार-बार विनय की कि प्रभु! हमें आपकी प्रसन्नता के अतिरिक्त किसी इच्छा पूर्ति की चाह नहीं है। यहां की दाल-रोटी बढ़िया पकवानों से कहीं उत्तम है, यहां की दाल की तुलना में स्वर्ग के स्वादिष्ट भोजन भी तुच्छ हैं।
       भक्ति के अभिलाषी प्रेमियों को तो एक दिव्य आनन्द की लहर में ग़ोते लगाने की धुन सवार थी। इतनी श्रद्धा और ऐसे अटल विश्वास को देखकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने शरणागति के लिए आज्ञा दी। 1947 के पश्चात जैसे जैसे दरबार की महिमा फैलती गई, जो भी प्रेमी गुरुमुख अत्यन्त श्रद्घा-विश्वास सहित विनय करता उसे श्री आज्ञानुसार शरणागति मिल जाती। इस प्रकार से काफ़ी संख्या में गुरुमुख प्रेमियों ने शरणागति प्राप्त की तथा गुरु भक्ति के पथ पर चलकर मानव-जन्म को कृतार्थ करने लगे।

Saturday, August 6, 2016

05.08.2016

इधर 1947 में स्वतन्त्रता संग्राम के कारण देश-विभाजन हुआ। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तृतीय पादशाही जी) ने तो इसके विषय में 1940 में ही कई बार श्री वचन फ़रमाए थे। उनमें से एक दो विशेष वचनों का उल्लेख पीछे किया जा चुका है। इन वचनों से आप सांकेतिक रूप से प्रेमियों को पहली ही चेतावनी दे चुके थे। सन् 1947 में जब देश विभाजन हुआ, उस समय कई लोग बे-घर हो गए। अशान्त वातावरण के उत्पन्न होने के कारण सबके हृदय करुण-क्रन्दन कर उठे। ऐसे समय में उनके अशान्त-त्रस्त हृदयों को किसी शान्तिदायक आश्रय की आवश्यकता थी। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने पहले से ही इस आनन्दमयी, सुखदायक श्री आनन्दपुर की नगरी को, आकुल-व्याकुल हृदयों को शान्ति, सुख आनन्द प्रदान करने के लिए रचा था। इसीलिए प्रेमी गुरुमुखों ने तो श्री सद्गुरुदेव जी का नाम स्मरण कर वहां से जान बचाई तथा इधर भारत में आते ही श्री चरणों में पहुँचकर शान्ति तथा आनन्द प्राप्त किया।
       आपने इस श्री आनन्दपुर की रचना के साथ-साथ वहां से 20 मील की दूरी पर अशोकनगर में यात्रियों के आने-जाने की सुविधा के लिए थोड़ी सी ज़मीन खरीद कर आश्रम स्थापित करवाया, जिसका प्रबन्ध श्री स्वामी बेअन्त आनन्द जी महाराज (श्री चौथी पादशाही जी) के हाथ सौंप दिया था। प्रचारक महात्माओं के सत्संग से हज़ारों की संख्या में अन्य जिज्ञासुओं ने भी इस भक्ति-मार्ग को सहर्ष स्वीकार किया और अपनी वेदना, व्यथा व अशान्ति-युक्त हृदयों को नामोपदेश से सिंचित कर सुख की सांस ली।
       इस घनघोर दुःखद समय में आपने उन जिज्ञासुओं को अशोकनगर तथा श्री आनन्दपुर में आश्रय देकर उनका दुःख निवारण किया। अब क्योंकि जिज्ञासुओं एवं प्रेमियों की संख्या बढ़ गई इसके लिए आपने श्री आनन्दपुर की रचना को विशाल रूप दिया। 1947 तक झोंपडों (टप्परों) तथा बावलियों से ज़रूरत की पूर्ति होती रही। अब आवश्यकताएं बढ़ गईं और उनकी पूर्ति के लिए यथासम्भव साधन किये जाने लगे। सेवा को विशाल रूप दिया गया।
यहां पर झोंपड़ों (टप्परों) के स्थान पर ईंटों के मकान बन गए। जहां –तहां खेतों में पड़े हुए पत्थरों को एकत्र करवाना आरम्भ कर दिया। स्थान-स्थान पर उद्यानों के लिए स्थान साफ़ करवाने आरम्भ करवा दिए। इस प्रकार गुरुमुखों को सेवा का सवर्णावसर मिला। आपने अमुल्य सेवा रूपी निधी गुरुमुखों को प्रदान की। अब इस उपकार पर यदि गहराई से दृष्टि डालें तो क्या हम उस स्तर तक बुद्धि को पहुँचा सकते हैं कि कितना कितना परोपकार किया श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने हम पर? इधर हमारी दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपना अमुल्य समय देते हैं, इधर हमारी रूहानी प्यास को बुझाने के लिए तत्पर रहते हैं। क्या ऐसा कार्य किसी युग में हुआ कि स्वयं इष्टदेव कुल मालिक हमारे भोजन, निवास आदि विषयों पर स्वयं साकार रूप में ध्यान दें और साथ ही परलोक सुधारने का दायित्व भी अपने ऊपर लें? ऐसा अन्यन्त्र उदाहरण मिलना कठिन है

Friday, August 5, 2016

04.08.2016

इस प्रकार 1946 से 1963 तक आपने कितनी बार ही यहां पर इस टाहली के समीप प्रवचन फ़रमाए, कितना यहां पर प्रेम लुटाया, इसका अनुमान लगाना कठिन है। जड़-चेतन सभी को आपने अतुल्य प्रेम प्रदान किया। आपमें यही विलक्षणता थी कि आपके समक्ष आते ही श्री दर्शन की माधुरी छटा से प्रेमी आत्म विभोर हो जाता। आपके श्री दर्शन में क्या जादू था कि-
प्रेम-मंत्र जड़ चेतन सब में, करुणामय ने भर डाला।
जो हुआ आपकी शरणागत, उसे मालामाल था कर डाला ।।
जिस ओर निहारा एक नज़र, वहां प्रेम-पयोधि छलकत है।
क्या प्रेम की अतुल बड़ाई है, दीदार में तेरे झलकत है ।।
जौलाई सन् 1963 में आपने श्री सन्त नगर के अन्तिम भाग्य जगाए। सेवा, सत्संग, श्री दर्शन का सौभाग्य प्रदान करते हुए आपने यह वचन फ़रमाए-
साधारणतया लोग भगवान को पाने की अभिलाषा रखते हैं। हर किसी के मुख से यही आवाज़ निकलती है कि ईश्वर मिल जाये, भगवान के दर्शन हो जायें। परन्तु ईश्वर, भगवान अथवा मालिक क्या चीज़ है, यह बात बहुत कम लोग जानते हैं। वह मालिक केवल प्रेम-स्वरूप है। उसका वास्तविक स्वरूप प्रेम, प्यार, प्रीति और मुहब्बत है। यह सारी सृष्टि उस कुल मालिक की रचना है और इस रचना का आधार फ़कत मालिक का प्रेम ही है। विचारपूर्वक देखने से पता चलता है कि मालिक ने अपनी सृष्टि की रचना में प्रेम को ही आधार बना रखा है। प्रेम के तागे में ही सब दुनिया माला के मनकों की तरह पिरोई हुई है और इसी प्रेम की डोरी के द्वारा ही जीव अपने मालिक के चरणों में पहुँच सकता है।
       परन्तु इसके साथ दुनिया में माया और काल की रचना फैली हुई है। साधारण दुनियावी जीव माया की इस रचना में लुभा जाते हैं और माया में लिप्त हो जाने के कारण मालिक का सच्चा प्रेम उनके दिलों से लुप्त हो जाता है। जीव के अन्दर सार-तत्त्व तो मालिक का शुद्ध एवं सच्चा प्रेम है, परन्तु माया की रचना देख-देखकर जीव भूल जाता है क्योंकि माया की रचना ही ऐसी है, जैसा कि सत्पुरुषों ने कहा है-
ए जियरा तैं अमर लोक को, पर् यो काल बस आई हो।
मनै सरूपी देव निरंजन, तोहि राख्यो भरमाई हो ।।
पाँच पचीस तीन को पिंजरा, ता में तो को राखै हो।
तो को बिसरि गई सुधि घर की, महिमा आपन भावै हो ।।
निरंकार निरगुन ह्वै माया, तो को नाच नचावै हो ।
चरम दृष्टि को कलफी दीन्हो, चौरासी भरमावै हो ।।
सतगुरु पीव जीव के रच्छक, ता सो करो मिलाना हो ।
जा के मिले परम सुख उपजै, पावो पद निर्बाना हो ।।
जुगन जुगन हम आय जुनाई, कोई कोई हंस हमारा हो ।
कहै कबीर तहाँ पहुँचाऊँ, सत्त पुरुष दरबारा हो।।
                     परम सन्त श्री कबीर साहिब जी
महापुरुष समझाते हैं कि ऐ जीव! तू वास्तव में अमर लोक का वासी है, किन्तू काल के वश में आ गया है। मन रूपी देवता ने तुझे भ्रम में डालकर अपने अधीन कर रखा है। पाँच विषय- रस (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द), पच्चीस प्रकृतियां और तीन गुण रूपी पिंजरे में मन ने कैद कर रखा है, इसलिए तू अपने वास्तविक ठिकाने की सुधि भूला बैठा है। सूक्ष्म माया तुझे धोखे में फंसा कर नाच नचा रही है। उसने तेरी आँखों पर नफ़सानियत की पट्टी बांध दी है और इस प्रकार चौरासी लाख योनियों में भटका रही है। अब इस धोखे से छुटकारा क्योंकर होगा? इसकी युक्ति भी बतलाते हैं कि सतगुरु कुल मालिक का स्वरूप हैं जोकि जीव की रक्षा करने वाले हैं, तू उनसे मेल-मिलाप कर। उनके मिलने से परम सुख की प्राप्ति होगी और तू अपने असली ठिकाने निर्वाण पद को पा लेगा। श्री क़बीर साहिब फ़रमाते हैं कि सत्पुरुष तो युग-युग में जीवों को चिताने और जगाने के लिए आते हैं, किन्तु कोई विरला भाग्यशाली जीव ही उन सत्पुरुषों के वचन मानने वाला होता है। वही अपने आप को महापुरुषों की चरण-शरण में अर्पण करता है। ऐसे जीव को महापुरुष वहां पहुँचाते हैं, जहां मालिक का धाम है। महापुरुष जिस अनामी धाम से स्वयं आते हैं, उनके चरणों में जो प्रेम-प्रतीति करता है; वे उसे प्रेम की पवित्र डोरी में खींचकर वहीं ले जाते हैं।
सत्पुरुषों का संसार में अवतरण ही इसीलिए होता है कि वे अमरवाणी द्वारा जीव को वास्तविक ठिकाने का भेद बतलाते हैं। गफ़लत और मौह के अन्धकार से निकालकर प्रेम-भक्ति का सच्चा प्रकाश प्रदान करते हैं। सच्चा प्रेम प्राप्त करने का साधन ही केवल यही है कि महापुरुषों की बाणी, उनके वचन और उनकी आज्ञा-मौज अनुसार जीवन को बनाये। सौभाग्यशाली हैं वे जीव जिन्हें सत्पुरुषों की शरण-संगति प्राप्त होती है। वे उनके बताए हुए मार्ग पर चलकर लोक-परलोक संवार लेते हैं।

Thursday, August 4, 2016

03.08.2016

1962 में जब यहां (सन्त नगर में) भी अँगूर लगाने की मौज उठी तो इस मौज ने सन् 1963 में साकार रूप धारण किया। सेवकजन दिन रात एक करके इस मौज को पूरा करने में संलग्न थे। अँगूरों के लिए गड़ढे खोदे जा रहे थे। एक दिन मौजवश श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सेवकों से प्रवचन फ़रमाए-
''सेवक का दर्जा सर्वोत्तम है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के दर्शन करने, सत्संग व आज्ञानुसार सेवा करने में बहुत लाभ है, परन्तु शर्त यह है कि जीव को कुसंग व माया धोखा न देवें। सेवक के दर्जे को प्राप्त करने के लिए, सच्चे सेवक के पद के लिए सब तरसते हैं अर्थात चाह करते हैं। यदि सैकड़ों वर्ष भी तप किया जावे तो भी सेवक का दर्जा मिलना कठिन है। परमार्थ व गुरु दरबार की सेवा का बहुत महत्व है। सेवक श्रद्धा के साथ सेवा करे, आज्ञानुसार चले और अपनी सुरति की धारा इष्टदेव के चरणों में लगाए रखे, यही सेवक का कर्तव्य है।''
बेतार का तार (Wireless) एक वैज्ञानिक अविष्कार है। इसमें जहां भी सन्देश पहुँचाना हो, किसी विशेष व्यक्ति के नाम पर एक समय में एक को ही वह पहुँच सकता है। इसके लिए विद्युत धारा तथा वायु-तरंग की ज़रूरत पड़ती है। आपमें तो वह आध्यात्मिक 'बेतार का तार' की शक्ति समाहित थी कि बिना किन्हीं उपकरणों के सैकड़ों लाखों मील दूर बैठे हुए, बिना किसी के सन्देश पहुँचाये हुए प्रेमी दिलों को बरबस खींचती थी। जिसने भी एक बार गुरु-भक्ति की अभिलाषा की, श्री आनन्दपुर के सम्राट, त्रिभुवन मोहन का नाम सुन लिया, बस! वह खिंचा चला आया। जिसने भी एक बार आपके श्री दर्शन किये, पुनः दर्शन पाने के लिए सदा व्याकुल बना रहा। जब तक उसने श्री आनन्दपुर के सम्राट को हृदय-सम्राट न बना लिया, उसे चैन कहां! उसने अपने नयनों की तृषा श्री दर्शन से बुझानी चाही, परन्तु अत्यधिक बढ़ती ही गई। इस प्रेम की सच्ची लटक से सांसारिक विषय-वासनाओं, मोह-आसक्ति आदि बन्धन से मुक्त होकर वह त्याग, वैराग्य और सेवा की मूर्ति बन गया। अब उसे जीने का ढंग आ गया। वह दुनिया में रहता हुआ भी निर्लिप्त हो गया। वह अपने वास्तविक ध्येय को पा गया।

Wednesday, August 3, 2016

02.08.2016

''प्रत्येक मनुष्य में कोई  न कोई लगन रहती है। प्रत्येक प्राणी की यह इच्छा होती है कि मैं सबसे बड़ा बनूँ, मुझे सबसे बड़ा दर्जा मिले, मेरी सबसे अधिक इज़्जत हो और मैं सुखी रहूँ। लगभग इस किस्म की इच्छाएँ हर मनुष्य में हुआ करती हैं।
      अब सोचना यह है कि सबसे ऊँचा व बड़ा पद कौन सा है! सबसे उत्तम व श्रेष्ठ वस्तु कौनसी है जिसके मिलने से यह जीव सुख का अनुभव कर सकता है, क्योंकि प्रत्येक जीव अपने इस निशाने को ध्यान में रखता है और दृढ़-संकल्प से उस चीज़ को प्राप्त भी कर लेता है। यदि मनुष्य की इच्छा हो कि मैं धनवान बनूँ, विद्या ग्रहण करूँ, डॉक्टर बनूँ या कोई और गुण ग्रहण करूँ, परन्तु यदि इच्छा के साथ दृढ़-संकल्प नहीं है तो सफलता प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात् विचारों में दृढ़ता होने से ही सफलता प्राप्त हो सकती है।
      सिकन्दर बादशाह का संकल्प समस्त विश्व को विजय करने का था। अब विचार किया जाये कि सिकन्दर  में और आम मनुष्यों के शरीर में देखने में कोई अन्तर नहीं था। अन्तर था तो केवल विचारों का, दृढ़-संकल्प का। अपने विचारों की प्रबलता से और दृढ़-संकल्प से ही वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सका था।
      अब प्रश्न यह है कि कौन-से काम की सफलता में सुख है और कौन-से काम की सफलता में दुःख, चिन्ता और कल्पना है? कौन-से काम मनुष्य को शान्ति पहुँचा सकते हैं और कौन-से काम जीव को दुःखदायी बना सकते हैं?कौन-से काम के लिए दृढ़-संकल्प करके मनुष्य को उसे प्राप्त करना चाहिए? यदि एक चोर चोरी करता है तो दृढ़ संकल्प से ही अपने काम में सफलता प्राप्त करता है। यदि दूसरे आदमी ने ईश्वर-प्राप्ति की कोशिश की तो वह अपने दढ़ संकल्प से अपने मनोरथ में सफल हो गया। अब सोचना इस बात को है कि अपने दढ़ संकल्प से, अपनी विचार शक्ति से किस काम को किया जाये जिससे मनुष्य को सुख का अनुभव हो। क्योंकि मालिक की प्राप्ति और चोरी दोनों कामों में सफलता तो दृढ़ संकल्प से मिल गई, परन्तु परिणाम दोनों का भिन्न-भिन्न है। भक्त और चोर में कितना अन्तर है? भक्त का नाम तो सब पसन्त करते हैं, परन्तु कोई भी अपने को चोर कहलवाना पसन्द नहीं करता। जितना अन्तर अर्जुन व दुर्योधन में है, उतना ही मालिक की प्राप्ति और सांसारिक वस्तुओं में है। मालिक की प्राप्ति से मनुष्य जन्म-मरण से छुटकारा पा सकता है और माया के पदार्थों एवं सांसारिक इच्छाओं से दुःख कलपना और अशान्ति खरीद सकता है। परिणाम दोनों का अलग-अलग है। यह तो कोई नहीं चाहता कि मैं दुःखी रहूँ। सब कोई सुखी होना चाहता है, मगर सुख है मालिक के नाम में, मालिक की भक्ति में, इस सुख के लिए ही दृढ़-संकल्प होना चाहिए।
।। दोहा ।।
धनवन्ते सब ही दुखी, निर्धन हैं दुख रूप ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ भेद अनूप ।।
(सन्त सहजो बाई जी)
महाभारत के युद्ध से पहले भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी से अर्जुन ने भगवान को मांगा और दुर्योधन ने भगवान से युद्ध का सामान मांगा, परन्तु महाभारत के युद्ध में विजय अर्जुन की हुई। मांगने को अर्जुन भी युद्ध का सामान मांग सकता था, परन्तु जिसको भगवान की प्राप्ति हो जाए उसे किस बात की कमी रहेगी। भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी ने युद्ध में समय-समय पर अर्जुन की रक्षा की। इसी प्रकार से मनुष्य को भी चाहिये कि वह अपने दृढ़-संकल्प को ईश्वर प्राप्ति में लगाए, तभी वह सुखरूप बन सकता है। इसलिए अपने दृढ़-संकल्प को मालिक के भजन-ध्यान की ओर लगाकर मनुष्य जन्म के ध्येय को प्राप्त करो।

Tuesday, August 2, 2016

01.08.2016

आम लोग इस लाभ-हानि को नहीं समझ सकते। इसको समझने वाले बहुत कम लोग होते हैं। इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि परमार्थ और भक्ति को समझने वाले होते तो बहुत कम हैं, परन्तु उनकी कदर व कीमत सांसारिक लोगों की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। जैसे लोहे की अपेक्षा सोना कम मिलता है, परन्तु कीमत सोने की अधिक है। जिन मनष्यों के शुभ संस्कार व क्रियमाण कर्म प्रबल होते हैं उनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। वे अपना भी सुधार कर लेते हैं और दूसरे भी उनके जीवन से लाभ उठाते हैं, जिनमें श्री पलटूदास जी, श्री चरनदास जी, श्री दादू दयाल जी, श्री रज्जब साहिब जी व सन्त सहजोबाई जी आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। इसी श्रेणी के और भी कई महात्मा और भक्त हुए हैं। इन लोगों ने भक्ति व परमार्थ के गूढ़ रहस्य को समझकर स्वयं को उस पथ पर दृढ़ किया। अब उनके इतिहास से अनेकों जीव लाभ उठा रहे हैं। यह ठीक है कि उनकी संख्या कम है, परन्तु उनकी महानता बहुत अधिक होती है। उनके नाम व काम की सब सराहना करते हैं, क्योंकि उन लोगों ने भक्ति व परमार्थ के गूढ़ तत्त्व को समझा और उसपर आचरण किया।
      समय के पूर्ण सन्त सद्गुरु ही जीव को भक्ति व परमार्थ के सार तत्त्व को समझाते हैं और उसपर अमल करने का आदेश देते हैं। गुरुमुख पुरुष ही भक्ति के गूढ़ ज्ञान को समझते हैं और उसपर अमल करते हुए अपने मनुष्य जन्म को सफल बनाते हैं। जिनको ऐसा स्वर्ण अवसर मिल जाये, वे भाग्यशाली हैं। इस मार्ग पर चलते समय माया व मन से ज़बरदस्त सामना करना पड़ता है। काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार आदि भी मन के साथी हैं। ये जीव को अपनी तरफ़ खींचते हैं। माया भी जीव को अपने झिलमिल रूप में फंसाती है, परन्तु गुरुमुख पुरुष माया के धोखे में नहीं आते ।
      ।। दोहा ।।
तीर तुपक से जो लड़ै, सो तो सूर न होय ।
माया तजि भक्ति करै, सूर कहावै सोय ।।
                              परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
उन मनुष्यों का जीवन धन्य है जिन्होंने मन-माया को जीतकर परमार्थ और भक्ति के मार्ग पर दृढ़ता से आगे की ओर कदम बढ़ाया है। यही मनुष्य जन्म का लाभ है जिसे गुरुमुख ही प्राप्त कर सकते हैं। समय के पूर्ण सद्गुरु का संसार में अवतार धारण करने का अभिप्राय भी यही होता है कि यह जीव जो काम-क्रोध-मोह-लोभ-अहंकार, मन व माया की गुलामी में जकड़ा हुआ है, इनसे छुटकारा प्राप्त करे। इसका नाम ही वास्तव में मुक्ति है। इसका दूसरा नाम गुरुमुखता है और इसी का नाम ही परमार्थ व भक्ति है। अपनी सुरति को विषय-विकारों से स्वतन्त्र कराना ही सबसे बड़ा परमार्थ है। इसलिए सन्त-महापुरुष फ़रमाते हैं कि ऐ जीव! पहले अपना परमार्थ सिद्ध करो। स्वयं को काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार के बन्धन से स्वतन्त्र कराओ। अपनी सुरति को विषय-विकारों से छुड़ाओ। तृष्णा, ईर्ष्या ने जो तुम्हें घेर रखा है, इनसे अपना पीछा छुड़ाओ। यही सबसे बड़ा परमार्थ है। परमार्थ और भक्ति पथ पर चलने वाले जिज्ञासू को मन और माया की उलझनों से बचने के लिए सन्त सद्गुरु की सहायता की बहुत अवश्यकता है। सन्त सहजोबाई जी ने गुरु की आवश्यकता के विषय में कथन किया है-
।। दोहा ।।
बार बार नाते मिलै, लख चौरासी माहिं।
सहजो सतगुरु न मिलैं, पकड़ निकासैं बाहिं ।।
सहजो कारज जगत के, गुरु बिन पूरे नाहिं ।
हरि तो गुरु बिन क्यों मिलैं, समझ देख मन माहिं ।।
सांसारिक सम्बन्ध तो पुशु योनियों में भी मिल सकते हैं, किन्तु सद्गुरु की प्राप्ति मनुष्य-जन्म में ही हो सकती है, जो इस जीव को मोह-माया के बन्धन से स्वतन्त्र कराकर जीव की आत्मा को परमात्मा से मिलने का मार्ग बताते हैं। इसीका नाम ही भक्ति है और इसे ही परमार्थ कहते हैं।
      इस प्रकार आपने श्री अमृत प्रवचनों द्वारा जन-जन को लाभान्वित किया। आई हुई संगतें श्री अमृत प्रवचन सुनने के लिए सदा उत्सुक रहती थीं। आप भी उनकी आत्मि प्यास बुझाने के लिए समयानुसार श्री अमृत प्रवचन फ़रमाते ही रहते थे। एक बार पुनः आपने यहां कृपा की और पर्व के दिन ये प्रवचन फ़रमाए-

Monday, August 1, 2016

31.07.2016

जिस स्थान पर सन्त-महापुरुष चरण-स्पर्श करते हैं, वहां की रज भी पूजनीय बन जाती है। जहां स्वयं मालिक अपनी मौज के अनुसार पावन लीलाएं करते हैं, वे स्थान स्मारक (यादगार) के रूप में सदा उनकी याद बनाए रखने के लिए प्रतीक (चिन्ह) होते हैं। यहां पर श्री दर्शन खुलने वाले कमरे के पीछे की ओर दो-तीन टाहलियों के (शीशम के) वृक्ष थे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पादशाही जी) कई बार श्री मुख से फ़रमाते थे कि जिनका सम्पर्क जिस रूप में है, सबका सद्गुरु से नाता जन्म-जन्मों से चला आता है। हम सबको पहचानते हैं, परन्तु हमें कोई नहीं पहचान सकता। इस प्रकार इन दो-तीन टाहली वृक्षों में से एक टाहली वृक्ष के नीचे सांय समय जाप करवाते तथा दोपहर समय श्री दर्शन का सौभाग्य देकर व अनुपम लीलाएँ कर दिलों को बरबस खींचते थे। प्रेमी, गुरुमुखों को श्री दर्शन करके जन्म-जन्मान्तरों के मलिन मन को धोने का सुअवसर मिल जाता और आप सेवा में होने वाली शारीरिक थकावट को अपनी अनुपम लीला दिखाकर दूर कर देते। इस प्रकार सन् 1946 से 1963 तक आप (श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी) समय-समय पर श्री सन्त नगर में कृपा करते रहे तथा इस टाहली के नीचे अनेकों बार श्री मुख से प्रवचन फ़रमाए, जिन में से केवल दो तीन सत्संग उपदेश ही यहां दिए जा रहे हैं।
      एक बार जबकि श्री सन्तनगर ख़रीदा ही था उसके कुछ समय उपरान्त यहां पर संगतें श्री दर्शन के लिए आईं। आपने प्रथम बार टाहली के नीचे विराजमान होकर श्री वचन फ़रमाए-
      "भक्ति और परमार्थ एक ऐसी वस्तु है जिसको सर्वसाधारण लोग नहीं समझ सकते। भक्ति और परमार्थ सार वस्तु है। इस सार वस्तु की परख बहुत कम मनुष्यों को है। संसार में सब लोग माया के पदार्थों, इन्द्रियों के सुखों में फँसे हुए हैं। इसलिए सुरति पर माया के पर्दे चढ़े हुए हैं और यह जीव बिल्कुल माया का रूप बन गया है। स्त्री से सम्बन्ध, बच्चों का मोह, धन एकत्र करने का विचार इस तरफ़ तो सब खुशी व रुचि से काम करते हैं और वे यह समझते हैं कि हम ठीक मार्ग पर चल रहे हैं। परन्तु वे परमार्थ की दृष्टि से वास्तविकता से दूर पड़े होते हैं। क्या परिवार के साथ सम्बन्ध व धन एकत्र करने का नाम परमार्थ है? परमार्थ की समझ व परख अथवा सार वस्तु की प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य को नहीं होती और न ही प्रत्येक मनुष्य भक्ति और परमार्थ के वास्तविक रहस्य को समझ सकता है। एक मनुष्य संसार में बहुत बुद्धिमान है, यदि उसकी सुरति धन, स्त्री-पुत्र व मान-बडाई की तरफ़ लगी हुई है तो वह परमार्थ के अभिप्राय को समझने से बिल्कुल कोरा है। मृत्यु के पश्चात ऐसे बुद्धिमान द्वारा एकत्र की हुई ये वस्तुएँ क्या उसकी सहायता कर सकती हैं या आजतक इन चीज़ों ने किसी की सहायता की है? यदि नहीं तो इनपर किसी प्रकार की आशा रखना भारी भूल है।