Sunday, January 24, 2016

श्री परमहंस अमृत कथा

उसी दिन 3 मई 1919 को श्री दूसरी पादशाही जी महाराज को भक्त ख़ानचन्द जी के साथ टेरी से रवाना कर दिया। दोनों टेरी से चलकर बहादुरखेल में दीवान भगवानदास के पास आए और अर्शाद नामा दीवान भगवानदास को दिखाया। इसके पश्चात कक्कियां गए और एक सप्ताह यहां पर रहकर कुलाची की ओर पधारे।
15 जून 1919 को श्री परमहंस दयाल जी जो आहार मात्र थोड़ा-सा भोजन लेते थे, वह भी छोड़ दिया। केवल पानी का आधार ही रह गया।
9 जुलाई 1919 ई. को सायं समय दीवान भगवानदास जी श्री दर्शन के लिए टेरी पहुँचे और श्री परमहंस दयाल जी ने उनसे धीरे-धीरे एक दो वचन किए। 10 जुलाई 1919 को बृहस्पतिवार तदनुसार 27 आषाढ़ शुदी द्वादशी सम्वत् 1976 वि. को प्रातःकाल छः बजे श्री परमहंस दयाल जी अपनी मौज अनुसार सुरत-शब्द-योग द्वारा सुरति को शब्द में लीन करते हुए निजधाम पधारे जहाँ से आप जनकल्याण हेतु मृत्युलोक के भाग्य जगाने को लिए आए थे। आप जो कुछ करना चाहते कर सकते थे, परन्तु आपकी श्रीमौज ही ऐसी थी जिसके सम्मुख सब  शक्तियां क्षीण हो गई। शास्त्रीय मर्यादानुसार आपको टेरी में भक्त अमीरचन्द के मकान में ही श्री समाधि दी गई। हृदय-विदारक दुःखद समाचार टेरी के कुछ भक्तों व अन्य स्थानों पर रहने वाले प्रेमियों को पहुँचाया गया। समस्त प्रेमी विरह-सागर में डूब गए। परन्तु हो ही क्या सकता था? कईं गंगा, यमुनाएं आँखों से बह निकलीं। भक्तों के हृदय की दशा कौन जाने कैसी थी। भक्तों के हृदय की दशा कौन जाने कैसी थी। उस प्रभु की मौज में कौन हस्तक्षेप कर सकता था। जैसे-तैसे दुःखी हृदय लेकर तन-बदन की सुधि भूले हुए प्रेमी टेरी पहुँचे। श्री स्वामी स्वरूप आनन्द जी ( श्री दूसरी पादशाही जी महाराज) भी प्रेमियों सहित व्यास पूजा के शुभ पर्व के मनाने के लिए टेरी  आ रहे थे। आते ही इस दुःखद समाचार को सुनकर अत्यन्त शोकातुर हुए। पुनः स्थान-स्थान से अन्य सेवको को बुलवाया तथा श्री गुरुदेव श्री श्री 108 श्री परमहंस दयाल जी की पुण्य स्मृति में भंडारा करवाया।

Thursday, January 21, 2016

महानिर्वाण


अब आप अधिकतक मौन रहने लगे। कभी श्री मौज में कुछ श्री वचन फ़रमा देते। एक दिन आपने वचन फ़रमाते हुए भविष्य-वाणी की- अब हमने जाना है। पुराने वस्त्र तो त्यागने ज़रूरी हैं। सेवक इन वचनों के रहस्य को न समझ सके। जिस किसी ने कुछ समझा भी तो मुँह से कहते कुछ न बनता था। श्री परमहंस दयाल जी के श्री चरणों में कैसे विनय करें कि वे अपने श्री दर्शनों से कृर्तार्थ करते रहें। अपनी निजी मौज अनुसार आपने निजधाम पधारने से 2 मास सात दिन पूर्व 3 मई सन् 1919 को भक्त ख़ानचन्द जी (महात्मा योगात्मानंद जी) तथा भक्त अमीरचन्द जी को बुलाया। उसी दिन टेरी में उत्तराधिकारी (जानशीन) के विषय में श्री आज्ञा-पत्र भक्त अमीरचन्द जी से लिखवा कर निज कर-कमलों से भक्त खानचन्द जी को देकर फ़रमाया कि इसे सम्भाल कर रखें, समय पर काम आयेगा। इस श्री आज्ञा-पत्र में इस प्रकार अर्शाद थे-
अज़ीज़म ख़ान चन्द जी,
                                साहिब सलमहू।
बाद दावयियात मज़ीद हयात के वाज़े हो कि आप सब सत्संगी साहिबान कदीम व जदीद पर इज़हार कर दें कि श्री महाराज जी का अर्शाद है कि दो तरह के जानशीन होते हैं- एक जिस्मानी और एक रूहानी। जिस्मानी जानशीन तो बाबा विशुद्धानन्द जी अरसा यकनीम साल (डेढ़ साल) से हो चुके हैं और यह सब पर ज़ाहिर है।
और रूहानी जानशीन श्री बाबा स्वरूप आनन्द जी हैं। उनसे जो कोई सत्संग करेगा या रूहानी उपदेश लेगा उसको बरकत मिलेगी। यह हमारी दुआ है। और बाई योगानन्द जी व भक्त अमीरचन्द जी को भी चाहिए कि सब पर इज़हार कर दें कि रूहानी जानशीन श्री बाबा स्वरूप आनन्द जी हैं। मुकर्रर आंके श्री महाराज जी की यह भी आज्ञा है कि बाबा स्वरूप आनन्द जी के दस हज़ार से ज्यादा उपदेशी होंगे, जो उनसे सत्संग करेगा या उपदेश लेगा उसको बरकत मिलेगी ।

श्री परमहंस अद्वैत मत- अमर ज्योति

अर्थात योगभ्रष्ट पुरुष बहुत समय तक पुण्यवानों के लोकों में वास करके फिर शुद्ध आचरण वाले सज्जन पुरुषों के घर में जन्म लेता है। वहां पर वह पूर्व जन्म में साधन किये हुए एकत्रित समत्व बुद्धिरूप योग के संस्कारों को पुनः प्राप्त करता है और इस प्रकार पूर्ण सिद्धि के लिए आगे साधना करता है और साधना की पूर्णता पर परमगति को प्राप्त होता है।
आप (श्री परमहंस दयाल जी) परमार्थ पथ पर दिन रात अग्रसर रहे। आपका स्थूल शरीर अब कुछ सुकोमल हो गया था फिर भी आप सन् 1915 से 191 ई. तक कभी आगरा, जयपुर और कभी टेरी में सत्संग उपदेश की पावन धारा बहाते रहे। सन् 1919 में आप टेरी में विराजमान थे। 13 जनवरी 1919 को आपने श्री मुख से अर्शाद फ़रमाया- "संसार में चार प्राकर की सेवा की जाती है- 1. दरम 2. जिस्म 3. कद़म 4 सुखन। दरम अर्थात धन की सेवा, जिस्म- तन से सेवा, क़दम-चल फिर कर सेवा भेंट लेकर लंगरादि में लगा  देना, सुखन- सत्संग प्रचार। सेवकों ने इन चार प्राकर की सेवाओं को प्राणपन से निभाया है। जो व्यक्ति जिस सेवा के योग्य थे उन्होंने उसीप्रकार अपना कर्तव्य समझ कर सेवा की है और जीवन का सच्चा लाभ प्राप्त किया है। जिससे हम उनपर बहुत प्रसन्न हैं।"

Wednesday, January 20, 2016

श्री परमहंस अमृत कथा - 20.01.2016


भक्त साहिबचन्द जी ने भक्ति, प्रेम व  ज्ञान के रहस्यों का उद् घाटन कर कई भजनों की रचना भी की। भक्त साहिबचन्द जी की सेवा, प्रेम एवं त्याग के विषय में अन्य भक्तों के सम्मुख श्री परमहंस दयाल जी स्वयं निज मुख से कई बार सराहना किया करते थे। इसप्रकार श्री चरणों की सेवा करते हुए उन्होंने पांचभौतिक शरीर त्याग दिया ।
इसीप्रकार भक्त धनीराम जी भी श्री परमहंस दयाल जी के अत्यधिक श्रद्धालु भक्त थे। यह दरसमंद के निवासी थे। ये भाव और प्रकृति से बहुत भोले थे। श्री परमहंस दयाल जी इन्हें भोला भक्त कहते थे। इनकी धर्मपत्नी भी बिल्कुल इनके स्वभाव जैसी ही थी। इनका सदा का यह नियम था कि जब कभी भी श्री दर्शन के लिए आते, जहां श्री परमहंस दयाल जी विराजमान हों उस आश्रम या मकान के दरवाज़े से लेकर श्री परमहंस दयाल जी के पलंग तक पति व पत्नी दोनों साष्टांग दण्डवत् करते पहुँचते और श्री चरणों में शीश झुकाते हुए परिक्रमा करते। श्री चरणों में यथाशक्ति बहुत से पदार्थ भेंट के लिए लाते। इसके अतिरिक्त मूलियाँ भी लाते थे जोकि वहाँ की विशेष उपज थी और तोल में एक मूली दस सेर से भी अधिक भारी होती थी। श्री परमहंस दयाल जी इन मूलियों को उपहार के रूप में दूर दूर तक भेजते थे ।
जब लाला धनीराम जी परलोक सिधार गये तो किसी सेवक ने श्री परमहंस दयाल जी के चरणों में विनय की- प्रभु! भक्त साहिबचन्द जी व भक्त धनीराम जी को शरीर छोड़ने के बाद क्या गति मिली है? श्री अमृत वचन हुए कि भक्त साहिबचन्द जी तो परमधाम सिधार गए हैं और भक्त धनीराम जी को अभी जन्म लेकर रूहानी कमाई और करनी पड़ेगी क्योंकि इस जन्म में अभी उसकी कमाई अधूरी रह गई है; वह अगले जन्म में पूरी करेगा। जैसा कि गीता में भी कहा गया है-
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्र्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते ।।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ।।
(श्रीमद्भगवद्गीता)6/41,43

Tuesday, January 19, 2016

श्री परमहंस अमृत कथा - 19.01.2016

श्री परमहंस दयाल जी महाराज 

गातांक से आगे.....

आपने कहा- भक्त जी! यह इसके हार्दिक विशुद्ध प्रेम का परिणाम है। घर-गृहस्थी के कार्य व्यवहार करता हुआ भी यह हमारे ध्यान में विभोर रहता है। जब दिल दर्पण बन गया तो उसमें प्रतिबिंब नज़र आयेगा ही। हमने आपसे कहा था कि प्रत्यक्षं किं प्रमाणं । वही प्रमाण आज आपने स्वयं देख लिया। अतः दिल को प्रेमाभक्ति में रंग लो, पुनः संसार में रहने का आनन्द लो, यही जीवन का सार है और यही जीवन का लक्ष्य है।

भक्तजी ने श्री चरणों में दण्डवत कर प्रेम-भक्ति की भिक्षा मांगी। श्री परमहंस दयाल जी ने मुसकराते हुए आशिष दी।
आपके दो अनन्य, परम श्रद्धालु भक्त साहिबचन्द जी तथा भक्त धनीराम जी थे। इन दोनों की प्रगाढ़ निष्ठा, अनन्य अनुराग और अचल श्रद्धा से आप अत्यन्त प्रसन्न थे। उन्हीं दिनों भक्त साहिबचन्द जी ने श्री आरती एवं स्तोत्र आपीक कृपा से रचकर श्री चरणों में समर्पित किये, जिनको आपने बड़े प्रेम व ध्यान से पढ़ा। उसने श्री आरती के प्रथम पद में लिखा था कि-

परमारथ हित अवतार जगत में, गुरु जी ने है लीन्हा ।
हम जैसे मूरखन को, गृह दर्शन दीन्हा ।।

श्री परमहंस दयाल जी ने फ़रमाया- आप पूर्ण सन्त महापुरुषों की शरण प्राप्त कर चुके हो। इसलिए आप मूर्ख नहीं अपितु भाग्यशाली हो। अतः आप यहां मूर्खन के स्थान पर भागियन लिखो व ऐसे पढ़ो कि-

"हम जैसे भागियन को गृह दर्शन दीन्हा ।"

उसने श्री आज्ञानुसार आरती में परिवर्तन कर दिया । निज सम्प्रदाय के गूढ़ रहस्यों तथा भक्ति-परमार्थ के रहस्य का प्रतिपादन इन रचनाओं में पाकर आप अत्यन्त प्रसन्न हुए और फ़रमाया - " यह श्री आरती व स्तोत्र सदा के लिए इस सम्प्रदाय के लिए मान्य होंगे। श्री वचनानुसार यही श्री आरती आज तक प्रत्येक घर, प्रत्येक ग्राम, प्रत्येक नगर एवं सम्प्रदाय के प्रत्येक आश्रम में अथवा जहां जहां भी इस सम्प्रदाय के अनुयायी हैं प्रातः व सायं पूजा के लिए गाई गाई जाती है।

आरती का अर्थ ही यही है-ल आ+रती, आ=सब ओर से, रती= प्रेम अर्थात् प्रेम से ओतप्रोत होकर इष्टदेव की स्तुति करना। इस श्री आरती तथा स्तोत्र में आध्यात्मिकता के गूढ़ रहस्य समाहित हैं जिन्हें अर्थों सहित यहां दिया जा रहा है ताकि सब प्रेमियों को समझने में सुविधा हो।

Monday, January 18, 2016

श्री परमहंस दयाल जी महाराज

श्री परमहंस अद्वैत मत अमर ज्योति

गातांक से आगे.....

 संस्कारी जीव ही सत्पुरुषों की शरण ग्रहण कर इस तथ्य को समझ व जान सकते हैं। यह तो दिल का सौदा है, जितना कोई देगा उतना ही लेगा। अच्छा तो भक्त जी! इस प्रेम का प्रत्यक्ष प्रमाण फिर कभी आपको देखने का सौभाग्य प्राप्त हो जायेगा। 
ऐसा फ़रमाकर आपने सत्संग की समाप्ति की और सभी प्रेमी श्री परमहंस दयाल जी के गुणानुवाद गाते हुए कृत्यकृत्य हो गये ।
कुछ समय पश्चात भक्त अमीर चन्द जी भक्त नन्दलाल जी के घर में किसी कार्यवश गये।भक्त जी से बातचीत करने में संलग्न थे कि भक्त जी उठे और कहने लगे- भक्त जी! देखो, अभी मुझे आपसे बात करने की फुर्सत नहीं क्योंकि श्री परमहंस दयाल जी ने भक्त भगवानदास जी के घर जाते हुए मार्ग में ही इधर आने का विचार कर लिया है; अतः मुझे अभी उनके आगमन की तैयारी करनी है।
 भक्त अमीरचन्द जी ने कहा- नन्दलाल! फ़कीरों की दुनिया निराली होती है, तुम्हें कोई सन्देश तो भेजा नहीं कि आने की राह देखो। बैठो-दो मिनट में काम की बात निपटा लें।
 भक्त नन्दलाल जी ने कहा- वाह भई! खूब कही; वे तो आधे रास्ते तक पहुँच चुके हैं और इधर आने का इरादा है, सो मुझे अब इस काम-धन्धे की बात की ज़रूरत नहीं।

देखो भक्त जी! अब तो वे गली में भी पदार्पण कर चुके। अभी अभी उनके श्री दर्शन आपको भी हो जायेंगे और मुझे भी । भक्त जी तो हैरान हो गए कि आज का प्रोग्राम तो भक्त भगवानदास जी के घर था और श्री परमहंस दयाल जी उसीसमय में इधर कैसे आ रहे हैं। लगता है भक्त जी बौरा गए हैं। देखता हूँ वे इधर आ भी रहे हैं या नहीं?

भक्त अमीरचन्द जी सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे तो भक्त नन्दलाल ने कहा- ठहरिए भक्त जी! अब तो वे नीचे ड्योढ़ी में पहुँच चुके हैं, मैं भी आपके साथ चलता हूँ।
जब वे दोनों नीचे उतरे तो देखते ही भक्त अमीरचन्द हैरान रह गया कि श्री परमहंस दयाल जी ड्योढ़ी में खड़े थे। दण्डवत वन्दना कर स्वागत सत्कार से उन्हें ऊपर ले आए। भक्त अमीरचन्द ने श्री चरणों में विनय की- प्रभो! क्या आपने भक्त नन्दलाल पर कृपाकर इसके दिव्य नेत्र खोल दिये हैं, जो घर बैठे ही जान गया कि श्री परमहंस दयाल जी इधर आ रहे हैं, मार्ग में हैं, अब यहाँ तक पहुँच गए हैं।

प्रसंग ज़ारी है......................

Sunday, January 17, 2016

17.01.2016

एकबार आप टेरी में भक्त भगवानदास जी के घर ठहरे हुए थे। एक दिन राजयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग आदि विषयों पर सत्संग वार्ता करते करते प्रेमयोग को उच्चतम योग बतलाकर हर्षातिरेक हो आनन्दमग्न हो गए। नयन मूँद लिए और अश्रुओं की धार बहाने लगे। प्रेमीजन इस दृश्य को देखकर कि महापुरुषों की लीला अगम है, मौन हो निहारते रहे; परन्तु नन्दलाल भक्त जी तो मानो इस दिव्य रूप को निहारने में आनन्द मग्न हो समाधिस्थ हो गए। कुछ समय पश्चात आपने नेत्र खोले और अपनी पूर्ववत् अवस्था में प्रवचन आरम्भ किये। सभी भक्तजनों का ध्यान बार बार उस भक्त जी की ओर खिंचता चला जा रहा था कि वे अभी तक समाधि अवस्था में बैठे हुए हैं। आपने सबकी ओर निहारते हुए फ़रमाया- भई! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? यह सब हार्दिक विशुद्ध प्रेम का परिणाम है।
        भक्त अमीरचन्द ने उठकर विनय की- दाता दयाल जी! हमने इस प्रेमी को कभी भजन-ध्यान करते हुए नहीं देखा तो इसे समाधि अवस्था कैसे प्राप्त हो गई?
आपने फ़रमाया- प्रेम का नियम ही यही है जो दिल की तारों को झन-झनाकर आनन्द के राग गाने लगता है, उसी राग में स्वयं को विलीन कर देता है और परमपद को पा लेता है जहाँ पर योगी, तापस, सिद्ध-साधक हज़ारों जन्मों तक भी नहीं पहुँच सकते। सबने पढ़ा सुना तो है परन्तु अनुभव के बिना उस गति को कौन जान सकता है। उद्धव ज्ञानियों के सिरमौर, नीतिनिपुण और श्री कृष्ण जी के सखा थे। उन्हें कब मंजूर था कि उद्धव ज्ञान की गाँठ में बँधे रहकर कई जन्म और लें और लक्ष्य को पाने में इतना समय लगायें। उन्होंने उद्धव को ब्रज में गोपियों को ज्ञान प्रदान करने के लिए भेजा परन्तु रहस्य यही था कि वे प्रेम-भक्ति के स्वरूप को निहार सकें। सो वे ब्रज में गये, उनको जैसेही परा-अपरा भक्ति के भेद समझाने लगे तो गोपियों ने एक ही वाक्य में सब सार बतला दिया-
कान्ह भये प्रानमय प्रान भये कान्हमय।
हिय में न जानि परै कान्ह है कि प्रान है।।