उसी दिन 3 मई 1919 को श्री दूसरी
पादशाही जी महाराज को भक्त ख़ानचन्द जी के साथ टेरी से रवाना कर दिया। दोनों टेरी
से चलकर बहादुरखेल में दीवान भगवानदास के पास आए और अर्शाद नामा दीवान भगवानदास को
दिखाया। इसके पश्चात कक्कियां गए और एक सप्ताह यहां पर रहकर कुलाची की ओर पधारे।
15 जून 1919 को श्री परमहंस दयाल जी
जो आहार मात्र थोड़ा-सा भोजन लेते थे, वह भी छोड़ दिया। केवल पानी का आधार ही रह
गया।
9 जुलाई 1919 ई. को सायं समय दीवान
भगवानदास जी श्री दर्शन के लिए टेरी पहुँचे और श्री परमहंस दयाल जी ने उनसे
धीरे-धीरे एक दो वचन किए। 10 जुलाई 1919 को बृहस्पतिवार तदनुसार 27 आषाढ़ शुदी
द्वादशी सम्वत् 1976 वि. को प्रातःकाल छः बजे श्री परमहंस दयाल जी अपनी मौज अनुसार
सुरत-शब्द-योग द्वारा सुरति को शब्द में लीन करते हुए निजधाम पधारे जहाँ से आप
जनकल्याण हेतु मृत्युलोक के भाग्य जगाने को लिए आए थे। आप जो कुछ करना चाहते कर
सकते थे, परन्तु आपकी श्रीमौज ही ऐसी थी जिसके सम्मुख सब शक्तियां क्षीण हो गई। शास्त्रीय मर्यादानुसार
आपको टेरी में भक्त अमीरचन्द के मकान में ही श्री समाधि दी गई। हृदय-विदारक दुःखद
समाचार टेरी के कुछ भक्तों व अन्य स्थानों पर रहने वाले प्रेमियों को पहुँचाया
गया। समस्त प्रेमी विरह-सागर में डूब गए। परन्तु हो ही क्या सकता था? कईं गंगा, यमुनाएं आँखों से बह निकलीं। भक्तों के हृदय
की दशा कौन जाने कैसी थी। भक्तों के हृदय की दशा कौन जाने कैसी थी। उस प्रभु की
मौज में कौन हस्तक्षेप कर सकता था। जैसे-तैसे दुःखी हृदय लेकर तन-बदन की सुधि भूले
हुए प्रेमी टेरी पहुँचे। श्री स्वामी स्वरूप आनन्द जी ( श्री दूसरी पादशाही जी
महाराज) भी प्रेमियों सहित व्यास पूजा के शुभ पर्व के मनाने के लिए टेरी आ रहे थे। आते ही इस दुःखद समाचार को सुनकर
अत्यन्त शोकातुर हुए। पुनः स्थान-स्थान से अन्य सेवको को बुलवाया तथा श्री गुरुदेव
श्री श्री 108 श्री परमहंस दयाल जी की पुण्य स्मृति में भंडारा करवाया।