Friday, January 8, 2016

08.01.2016


सेठ जी ने यह स्वप्न वाली बात सब लोगों पर प्रकट कर दी और सब लोग सुनकर कृतकृत्य हो गये तथा अपने भाग्यों की सराहना करने लगे और श्री परमहंस दयाल जी की जय जयकार करने लगे ।
कुछ दिनों बाद श्री परमहंस दयाल जी ने रामनगर में कृपा की वहाँ पर एक प्रेमी जिसका नाम चौधरी प्रेमचन्द था, श्री चरणों में आकर प्रार्थना की- श्री महाराज जी, मैं बहुत समय से शुभ कर्म कर रहा हूँ। दिन में चार घंटे तो पूजा-पाठ करता हूँ और चारों धाम घूम कर आया हूँ फिर भी मुझे शान्ति प्राप्त नहीं हुई। यह सुनकर श्री परमहंस दयाल जी ने मुसकरा कर फ़रमाया कि इस मन की चंचलता समय के सन्त सद्गुरु के उपदेश की कमाई तथा सद्गुरु की कृपा से दूर हो सकती है, दूसरा कोई उपाय इस मन को एकाग्र करने का नहीं। जबतक मन एकाग्र नहीं होता, तबतक पूर्ण शान्ति अनुभव नहीं हो सकती। यह तो तुम स्वयं सोच सकते हो कि दुनिया की कोई भी वस्तु किसी के सुपुर्द हुए बिना उत्तम नहीं बन सकती तो यह जन्म जन्मान्तरों का अपवित्र मन बिना सन्त सद्गुरु की शरण में जाने के कैसे निर्मल हो सकता है? तुम जो ग्रन्थों का स्वाध्याय करते हो, इनकी समझ-बूझ और इन वचनों पर चलना भी तब हो सकेगा जब समय के पूर्ण सद्गुरु की शरण मिलेगी। वे ही वेद के भेद को जानने वाले होते हैं। क्या इस समय को रोगी को हज़ार वर्ण पहले वाले वैद्य से औषध मिल सकती है? यह सुनकर वह श्री चरणों में गिर पड़ा। जैसे ही श्री चरणों की धूलि उसके मस्तक पर लगी तो उसकी बुद्धि में प्रकाश होने लगा और सुरति मनोहर छवि की ओर आकर्षित हो गई। श्री परम हंस दयाल जी ने उसपर कृपादृष्टि की और उसकी विनय करने पर उसे शब्द का भेद बताया ।

No comments:

Post a Comment