Friday, January 8, 2016

10.01.2016 अमृत कथा


तीसरे दिन चौधरी प्रेमचन्द सड़क पर चलते चलते गिर पड़ा और शरीर छोड़ गया। तब सब सत्संगी आपस में कहने लगे कि वह (चौधरी प्रेमचन्द) तो कहता था कि मैंने अपना घर देखा है और श्री परमहंस दयाल जी ने मुझे अपना घर दिखाया है परन्तु वह तो अकाल मृत्यु ही मर गया ।

रात को उस सत्संग के मुखिया लाला निर्मल दास जी को स्वप्न आया। क्या देखता है कि श्री परमहंस दयाल जी हज़ारों प्रेमियों के मध्य में चमकते हुए सिंहासन पर सचखण्ड में विराजमान हैं और दोनों ओर से एक एक सेवक चँवर झुला रहे हैं। उसने दरवाज़े से चौधरी प्रेमचन्द को अन्दर आते हुए देखा। जब पास आया तो श्री परमहंस दयाल जी ने मुसकराते हुए फ़रमाया -प्रेमचन्द जी आ गये। उसने श्री चरणों में सिर झुकाकर विनय की- हाँ श्री प्रभु जी। श्री परमहंस दयाल जी ने एक चँवर झुलाने वाले को आज्ञा दी- यह चँवर झुलाने की सेवा प्रेमचन्द को दे दो और तुम किसी दूसरी सेवा में लग जाओ। श्री आज्ञा पाकर उस सेवक ने चँवर चौधरी साहिब को दे दी और स्वयं दूसरी सेवा में लग गया ।

        मुखिया निर्मलदास जब नींद से उठा तो स्वप्न वाली घटना को याद कर बहुत प्रसन्न हुआ और दूसरे दिन सत्संग में जाकर हर्ष में कहने लगा- मैं अपनी आँखों से देख आया हूँ कि श्री परमहंस दयाल जी स्वयं परब्रह्म हैं और कलिकाल के जीवों के उद्धार के लिए ही धुरधाम से आए हैं। यह सुनकर सब प्रेमियों के संशय निवृत हो गए और वे श्रद्धा व प्रेम के साथ श्री परमहंस दयाल जी के गुणानुवाद गाने लगे। तब सब संगत ने श्री चरणों में प्रार्थना की कि हमें भी सच्चे नाम की दीक्षा दी जाए। श्री परमहंस दयाल जी ने उनका अगाध प्रेम देखकर उन्हें नाम-धन से कृतार्थ किया। वे लोग कृत्यकृत्य हो गये ।

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