Thursday, January 21, 2016

महानिर्वाण


अब आप अधिकतक मौन रहने लगे। कभी श्री मौज में कुछ श्री वचन फ़रमा देते। एक दिन आपने वचन फ़रमाते हुए भविष्य-वाणी की- अब हमने जाना है। पुराने वस्त्र तो त्यागने ज़रूरी हैं। सेवक इन वचनों के रहस्य को न समझ सके। जिस किसी ने कुछ समझा भी तो मुँह से कहते कुछ न बनता था। श्री परमहंस दयाल जी के श्री चरणों में कैसे विनय करें कि वे अपने श्री दर्शनों से कृर्तार्थ करते रहें। अपनी निजी मौज अनुसार आपने निजधाम पधारने से 2 मास सात दिन पूर्व 3 मई सन् 1919 को भक्त ख़ानचन्द जी (महात्मा योगात्मानंद जी) तथा भक्त अमीरचन्द जी को बुलाया। उसी दिन टेरी में उत्तराधिकारी (जानशीन) के विषय में श्री आज्ञा-पत्र भक्त अमीरचन्द जी से लिखवा कर निज कर-कमलों से भक्त खानचन्द जी को देकर फ़रमाया कि इसे सम्भाल कर रखें, समय पर काम आयेगा। इस श्री आज्ञा-पत्र में इस प्रकार अर्शाद थे-
अज़ीज़म ख़ान चन्द जी,
                                साहिब सलमहू।
बाद दावयियात मज़ीद हयात के वाज़े हो कि आप सब सत्संगी साहिबान कदीम व जदीद पर इज़हार कर दें कि श्री महाराज जी का अर्शाद है कि दो तरह के जानशीन होते हैं- एक जिस्मानी और एक रूहानी। जिस्मानी जानशीन तो बाबा विशुद्धानन्द जी अरसा यकनीम साल (डेढ़ साल) से हो चुके हैं और यह सब पर ज़ाहिर है।
और रूहानी जानशीन श्री बाबा स्वरूप आनन्द जी हैं। उनसे जो कोई सत्संग करेगा या रूहानी उपदेश लेगा उसको बरकत मिलेगी। यह हमारी दुआ है। और बाई योगानन्द जी व भक्त अमीरचन्द जी को भी चाहिए कि सब पर इज़हार कर दें कि रूहानी जानशीन श्री बाबा स्वरूप आनन्द जी हैं। मुकर्रर आंके श्री महाराज जी की यह भी आज्ञा है कि बाबा स्वरूप आनन्द जी के दस हज़ार से ज्यादा उपदेशी होंगे, जो उनसे सत्संग करेगा या उपदेश लेगा उसको बरकत मिलेगी ।

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