भक्त
साहिबचन्द जी ने भक्ति, प्रेम व ज्ञान के
रहस्यों का उद् घाटन कर कई भजनों की रचना भी की। भक्त साहिबचन्द जी की सेवा, प्रेम
एवं त्याग के विषय में अन्य भक्तों के सम्मुख श्री परमहंस दयाल जी स्वयं निज मुख
से कई बार सराहना किया करते थे। इसप्रकार श्री चरणों की सेवा करते हुए उन्होंने
पांचभौतिक शरीर त्याग दिया ।
इसीप्रकार
भक्त धनीराम जी भी श्री परमहंस दयाल जी के अत्यधिक श्रद्धालु भक्त थे। यह दरसमंद
के निवासी थे। ये भाव और प्रकृति से बहुत भोले थे। श्री परमहंस दयाल जी इन्हें
भोला भक्त कहते थे। इनकी धर्मपत्नी भी बिल्कुल इनके स्वभाव जैसी ही थी। इनका सदा
का यह नियम था कि जब कभी भी श्री दर्शन के लिए आते, जहां श्री परमहंस दयाल जी
विराजमान हों उस आश्रम या मकान के दरवाज़े से लेकर श्री परमहंस दयाल जी के पलंग तक
पति व पत्नी दोनों साष्टांग दण्डवत् करते पहुँचते और श्री चरणों में शीश झुकाते
हुए परिक्रमा करते। श्री चरणों में यथाशक्ति बहुत से पदार्थ भेंट के लिए लाते।
इसके अतिरिक्त मूलियाँ भी लाते थे जोकि वहाँ की विशेष उपज थी और तोल में एक मूली
दस सेर से भी अधिक भारी होती थी। श्री परमहंस दयाल जी इन मूलियों को उपहार के रूप
में दूर दूर तक भेजते थे ।
जब लाला
धनीराम जी परलोक सिधार गये तो किसी सेवक ने श्री परमहंस दयाल जी के चरणों में विनय
की- प्रभु! भक्त साहिबचन्द जी व भक्त धनीराम जी को शरीर छोड़ने के
बाद क्या गति मिली है? श्री अमृत वचन हुए कि भक्त साहिबचन्द जी तो परमधाम सिधार
गए हैं और भक्त धनीराम जी को अभी जन्म लेकर रूहानी कमाई और करनी पड़ेगी क्योंकि इस
जन्म में अभी उसकी कमाई अधूरी रह गई है; वह अगले
जन्म में पूरी करेगा। जैसा कि गीता में भी कहा गया है-
प्राप्य
पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्र्वतीः समाः।
शुचीनां
श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते ।।
तत्र तं
बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो
भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ।।
(श्रीमद्भगवद्गीता)6/41,43
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