Tuesday, January 12, 2016

12.01.2016

      आपने सन्त महापुरुषों के स्वाभाविक लक्षणों को श्रीरामचरितमानस की इस चौपाई के अनुसार सत्य सिद्ध कर दिया-
चौपाई
साधु चरित सुभ चरित कपासू।
निरस बिसद गुनमय फल जासू ।।
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा ।
बंदनीय जेहिं जग जस पावा ।।
(बालकाण्ड)
सन्तों के चरित्र कपास के समान कल्याणकारी हैं। ये चरित्र देखने में तो हैं रसरहित, परन्तु उनका फल बड़ा गुणयुक्त है। कपास में रस तो कुछ नहीं परन्तु
उसका फल गुणयुक्त है। कपास गर्मी, शीत, वर्षा सहनकर उत्पन्न होती है। केवल दूसरों के भले की खातिर। वह कपड़ा बनकर दूसरों के तन को ढकती है। अर्थात आप दुःख सहनकर दूसरों को सुख पहुँचाती है। इसीप्रकार सन्त महापुरुष भी संसार में पहले कठिन साधना करके फिर संसार में अनेक कष्ट सहन करके जीवों के अवगुणों को न देखते हुए उनका सुधार करते हैं। इसीसे वे वन्दना के योग्य हैं।
        टेरी से आप 13 अक्टूबर 1915 को आगरा पधारे। आगरा से जयपुर गये। यहां भी आपने सत्संग के लिए आश्रम तैयार करवाया। राजस्थान का मुख्य केन्द्र जयपुर को ही बनाया। आपने सत्संग-वृष्टि से जन जन के अन्दर एक जागृति ला दी। सत्य-पथ दर्शाकर भूली भटकी मानवता को सन्मार्ग प लगाया। पुनः आपको टेरी निवासी लेने के लिए आए। तब आप कोहाट से होते हुए टेरी पधारे।

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