श्री परमहंस दयाल जी महाराज
गातांक से आगे.....
आपने कहा- भक्त जी! यह इसके हार्दिक विशुद्ध प्रेम का परिणाम है। घर-गृहस्थी के कार्य व्यवहार करता हुआ भी यह हमारे ध्यान में विभोर रहता है। जब दिल दर्पण बन गया तो उसमें प्रतिबिंब नज़र आयेगा ही। हमने आपसे कहा था कि प्रत्यक्षं किं प्रमाणं । वही प्रमाण आज आपने स्वयं देख लिया। अतः दिल को प्रेमाभक्ति में रंग लो, पुनः संसार में रहने का आनन्द लो, यही जीवन का सार है और यही जीवन का लक्ष्य है।
भक्तजी ने श्री चरणों में दण्डवत कर प्रेम-भक्ति की भिक्षा मांगी। श्री परमहंस दयाल जी ने मुसकराते हुए आशिष दी।
आपके दो अनन्य, परम श्रद्धालु भक्त साहिबचन्द जी तथा भक्त धनीराम जी थे। इन दोनों की प्रगाढ़ निष्ठा, अनन्य अनुराग और अचल श्रद्धा से आप अत्यन्त प्रसन्न थे। उन्हीं दिनों भक्त साहिबचन्द जी ने श्री आरती एवं स्तोत्र आपीक कृपा से रचकर श्री चरणों में समर्पित किये, जिनको आपने बड़े प्रेम व ध्यान से पढ़ा। उसने श्री आरती के प्रथम पद में लिखा था कि-
परमारथ हित अवतार जगत में, गुरु जी ने है लीन्हा ।
हम जैसे मूरखन को, गृह दर्शन दीन्हा ।।
श्री परमहंस दयाल जी ने फ़रमाया- आप पूर्ण सन्त महापुरुषों की शरण प्राप्त कर चुके हो। इसलिए आप मूर्ख नहीं अपितु भाग्यशाली हो। अतः आप यहां मूर्खन के स्थान पर भागियन लिखो व ऐसे पढ़ो कि-
"हम जैसे भागियन को गृह दर्शन दीन्हा ।"
उसने श्री आज्ञानुसार आरती में परिवर्तन कर दिया । निज सम्प्रदाय के गूढ़ रहस्यों तथा भक्ति-परमार्थ के रहस्य का प्रतिपादन इन रचनाओं में पाकर आप अत्यन्त प्रसन्न हुए और फ़रमाया - " यह श्री आरती व स्तोत्र सदा के लिए इस सम्प्रदाय के लिए मान्य होंगे। श्री वचनानुसार यही श्री आरती आज तक प्रत्येक घर, प्रत्येक ग्राम, प्रत्येक नगर एवं सम्प्रदाय के प्रत्येक आश्रम में अथवा जहां जहां भी इस सम्प्रदाय के अनुयायी हैं प्रातः व सायं पूजा के लिए गाई गाई जाती है।
आरती का अर्थ ही यही है-ल आ+रती, आ=सब ओर से, रती= प्रेम अर्थात् प्रेम से ओतप्रोत होकर इष्टदेव की स्तुति करना। इस श्री आरती तथा स्तोत्र में आध्यात्मिकता के गूढ़ रहस्य समाहित हैं जिन्हें अर्थों सहित यहां दिया जा रहा है ताकि सब प्रेमियों को समझने में सुविधा हो।
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