कुछ
दिन वहाँ अमृत वर्षा करने के बाद फिर श्री परमहंस दयाल जी आगरा में पधारे। जहाँ भी
सत्संग प्रचार अथवा जीव कल्याण हेतु आश्रम स्थापित करते उसका शुभ नाम कृष्ण द्वारा
रखा जाता। फिर आगरा से टेरी पधारे। पुनः आपने अधिक समय टेरी में व्यतीत किया। टेरी
में शीत की अधिकता थी परन्तु आप केवल एक मलमल का चोला पहनते थे। सर्दी के कारण 11
फ़रवरी 1915 को आपके श्री सुकोमल तन के दाहिने भाग पर पक्षाघात (फ़ालिज) के चिन्ह
प्रतीत हुए।बन्नू, कोहाट तथा अन्य स्थानों से डॉक्टर बुलाये गये, परन्तु डॉक्टरों
की कुछ समझ में नहीं आया ।
आप
स्वयं परब्रह्म, सृष्टिकर्ता एवं कर्णधार थे। आपने जबकि बाल्यकाल से ही योग साधना
से देहाध्यास पर विजय प्राप्त कर ली थी तब आपको भला सर्दी क्या कष्ट दे सकती थी।
यह तो आपकी निजी मौज थी, न मालूम किस परमार्थ कार्य की सिद्धि हेतु अथवा किस दैवी
विपत्ति का निवारण करने के लिए स्वयं अपने तन पर कष्ट सहन कर रहे थे। एक दिन आपने
वचन फ़रमाये कि - लोगों ने यह समझ रखा है कि हम बीमार हैं किन्तु वे भला क्या
जानें इस रहस्य को। ये गुप्त भेद हैं, वे इन्हें नहीं जान सकते।
वास्तव में सन्त महापुरुषों के हृदय समुन्द्र से भी गहरे, आकाश से असीम उच्च
तथा धरती सब सहिष्णु होते हैं। वे गुप्त रूप से मायावी जीवों का कष्ट अपने पर लेकर
उन्हें भक्ति का सुखद मार्ग बतलाते हैं। इन रहस्यों को जीव बुद्धि समझ सकने में
असमर्थ है। आपके आगमन से पहले सीमाप्रान्त में अधिकांशतः लोग भक्ति मार्ग से भटक
चुके थे। अतएव मोह-ममता एवं तृष्णा की ज्वाला में रात-दिन झुलस रहे थे। आपने
निरन्तर सदुपदेशों की पावन धारा बहाकर संलप्त हृदयों को शीतलता प्रदान की।
इसप्रकार प्रत्येक कष्ट को सहन करते हुए आपने सीमाप्रान्त की दशा को सर्वथा पलट
दिया।
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