Monday, January 18, 2016

श्री परमहंस दयाल जी महाराज

श्री परमहंस अद्वैत मत अमर ज्योति

गातांक से आगे.....

 संस्कारी जीव ही सत्पुरुषों की शरण ग्रहण कर इस तथ्य को समझ व जान सकते हैं। यह तो दिल का सौदा है, जितना कोई देगा उतना ही लेगा। अच्छा तो भक्त जी! इस प्रेम का प्रत्यक्ष प्रमाण फिर कभी आपको देखने का सौभाग्य प्राप्त हो जायेगा। 
ऐसा फ़रमाकर आपने सत्संग की समाप्ति की और सभी प्रेमी श्री परमहंस दयाल जी के गुणानुवाद गाते हुए कृत्यकृत्य हो गये ।
कुछ समय पश्चात भक्त अमीर चन्द जी भक्त नन्दलाल जी के घर में किसी कार्यवश गये।भक्त जी से बातचीत करने में संलग्न थे कि भक्त जी उठे और कहने लगे- भक्त जी! देखो, अभी मुझे आपसे बात करने की फुर्सत नहीं क्योंकि श्री परमहंस दयाल जी ने भक्त भगवानदास जी के घर जाते हुए मार्ग में ही इधर आने का विचार कर लिया है; अतः मुझे अभी उनके आगमन की तैयारी करनी है।
 भक्त अमीरचन्द जी ने कहा- नन्दलाल! फ़कीरों की दुनिया निराली होती है, तुम्हें कोई सन्देश तो भेजा नहीं कि आने की राह देखो। बैठो-दो मिनट में काम की बात निपटा लें।
 भक्त नन्दलाल जी ने कहा- वाह भई! खूब कही; वे तो आधे रास्ते तक पहुँच चुके हैं और इधर आने का इरादा है, सो मुझे अब इस काम-धन्धे की बात की ज़रूरत नहीं।

देखो भक्त जी! अब तो वे गली में भी पदार्पण कर चुके। अभी अभी उनके श्री दर्शन आपको भी हो जायेंगे और मुझे भी । भक्त जी तो हैरान हो गए कि आज का प्रोग्राम तो भक्त भगवानदास जी के घर था और श्री परमहंस दयाल जी उसीसमय में इधर कैसे आ रहे हैं। लगता है भक्त जी बौरा गए हैं। देखता हूँ वे इधर आ भी रहे हैं या नहीं?

भक्त अमीरचन्द जी सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे तो भक्त नन्दलाल ने कहा- ठहरिए भक्त जी! अब तो वे नीचे ड्योढ़ी में पहुँच चुके हैं, मैं भी आपके साथ चलता हूँ।
जब वे दोनों नीचे उतरे तो देखते ही भक्त अमीरचन्द हैरान रह गया कि श्री परमहंस दयाल जी ड्योढ़ी में खड़े थे। दण्डवत वन्दना कर स्वागत सत्कार से उन्हें ऊपर ले आए। भक्त अमीरचन्द ने श्री चरणों में विनय की- प्रभो! क्या आपने भक्त नन्दलाल पर कृपाकर इसके दिव्य नेत्र खोल दिये हैं, जो घर बैठे ही जान गया कि श्री परमहंस दयाल जी इधर आ रहे हैं, मार्ग में हैं, अब यहाँ तक पहुँच गए हैं।

प्रसंग ज़ारी है......................

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