Monday, January 4, 2016

श्री सद् गुरु देवाय नमः

श्री परमहंस अमृत कथा

श्री परमहंस दयाल जी फ़रमाते हैं कि ऐ जिज्ञासु ! प्रकृति की प्रत्येक जड़ वस्तु तुझे शिक्षा प्रदान करती है। तू उनसे शिक्षा लेकर अपने जीवन को तदनुरूप आचरण में ढाल। हमने भी इन जड़ वस्तुओं से शिक्षा ग्रहणकर जीवन को उनकी शिक्षानुसार बनाया तभी अपने ध्येय को प्राप्त कर सके हैं और सदा सन्त महापुरुष इसी मार्ग पर ही चलते आए हैं और चलेंगे। परमार्थ, परोपकार, समदृष्टि, न्यायोचित व्यवहार, सच्चाई तो उनके मुख्य नियम व सिद्धान्त हैं जिनपर वे चलकर सन्त महापुरुषों की पदवी प्राप्त करते हैं। अतः आचरण ही जीवन है। आचरण ही ध्येय प्राप्ति का एकमात्र साधन है। इसी मार्ग को अपनाकर मंज़िल पर पहुँच जाओ ।
        टेरी तथा सीमाप्रापन्त को कृतार्थ कर आप आगरा में गए और कई वर्ष कृष्णद्वारा आगरा में रहे। आप आगरा से कई बार परमार्थ-भक्ति का सन्देश देने के लिए अन्य स्थानों पर भी जाते थे। इसप्रकार आप एक बार आगरा से गोपाल नगर पधारे। वहां नगर के सभी स्त्री-पुरुष सत्संग में आए। इस शोभा का वर्णन लेखनी द्वारा नहीं हो सकता। वहां तो साक्षात बैकुण्ठ का दृश्य था। अमृत वचन सुनकर सबके हृदय की तपन दूर हो गई। उस नगर का सेठ जिसका नाम करोड़ीमल था, सत्संग में आया हुआ था। जैसा उसका नाम था, उतना ही उसके पास धन था। घर में एक वृद्ध माता भी थी, जो सत्संग में न जा सकती थी। सेठ जी ने श्री चरणों में प्रार्थना की कि श्री महाराज जी ! हमारे घर को भी अपने चरणओं से पवित्र कीजिए। आपने उसकी श्रद्धा व नम्रता को देखकर यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। जब आपने सेठ के घर कृपा की तो सेठ जी ने अपनी माता जी के कमरे में आपका सिंहासन बनाया। जब उसपर आप विराज़मान हुए तो ऐसे शोभा दे रहे थे कि उसके सामने इन्द्रासन भी लजा रहा था। आपने वहाँ वचन फ़रमाये-

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