Thursday, January 21, 2016

श्री परमहंस अद्वैत मत- अमर ज्योति

अर्थात योगभ्रष्ट पुरुष बहुत समय तक पुण्यवानों के लोकों में वास करके फिर शुद्ध आचरण वाले सज्जन पुरुषों के घर में जन्म लेता है। वहां पर वह पूर्व जन्म में साधन किये हुए एकत्रित समत्व बुद्धिरूप योग के संस्कारों को पुनः प्राप्त करता है और इस प्रकार पूर्ण सिद्धि के लिए आगे साधना करता है और साधना की पूर्णता पर परमगति को प्राप्त होता है।
आप (श्री परमहंस दयाल जी) परमार्थ पथ पर दिन रात अग्रसर रहे। आपका स्थूल शरीर अब कुछ सुकोमल हो गया था फिर भी आप सन् 1915 से 191 ई. तक कभी आगरा, जयपुर और कभी टेरी में सत्संग उपदेश की पावन धारा बहाते रहे। सन् 1919 में आप टेरी में विराजमान थे। 13 जनवरी 1919 को आपने श्री मुख से अर्शाद फ़रमाया- "संसार में चार प्राकर की सेवा की जाती है- 1. दरम 2. जिस्म 3. कद़म 4 सुखन। दरम अर्थात धन की सेवा, जिस्म- तन से सेवा, क़दम-चल फिर कर सेवा भेंट लेकर लंगरादि में लगा  देना, सुखन- सत्संग प्रचार। सेवकों ने इन चार प्राकर की सेवाओं को प्राणपन से निभाया है। जो व्यक्ति जिस सेवा के योग्य थे उन्होंने उसीप्रकार अपना कर्तव्य समझ कर सेवा की है और जीवन का सच्चा लाभ प्राप्त किया है। जिससे हम उनपर बहुत प्रसन्न हैं।"

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