इस
जीव का सच्चा साथी सद् गुरु और उनका शब्द है। इसके अतिरिक्त संसार की कोई भी वस्तु
जीव का साथ नहीं दे सकती। नाम अर्थात् शब्द की कमाई से ही जीव वास्तविक आनन्द को
प्राप्त कर सकता है। नाम से जन्म
जन्मान्तरों का कलुषित मन साफ हो जाता है।
।।
दोहा ।।
आदि
नाम पारस अहै, मन है मैला लोह ।
परसत
ही कंचन भया, छूटा बंधन मोह ।।
(परमसंत
श्री कबीर साहिब जी)
वास्तविक
पूँजी नाम है। यह नाम पारसमणि है, मन लोहे के समान है। जैसे पारसमणि लोहे को
स्पर्श करते ही सोना बना देती है इसीप्रकार मन (लोहा) भी नाम से स्पर्श करते ही
सोना बन जाता है अर्थात मोह के बन्धन टूट जाते हैं। मन स्वयं इस शब्द में लगना
आरम्भ हो जाता है जिससे ज़िन्दगी में एक अनूठे आनन्द का अनुभव होने लगता है।
संसार
की कोई भी वस्तु परलोक में साथ नहीं जा सकती, यहाँ तक कि अपनी शरीर भी यहीं रह
जाता है। परन्तु सद्गुरु द्वारा दिया हुआ शब्द एवं इस शब्द की कमाई साथ जानेवाली
है। इसप्रकार बहुत समय तक प्रवचन होते रहे। सत्संग की समाप्ति पर घर के सभी
सदस्यों ने नाम की दीक्षा मांगी और आपने उनकी श्रद्धा व प्रेम देखकर उन्हे नाम दान
देने की कृपा की। आपके अनुपम दर्शन तथा सच्चे नाम से प्रभावित होकर सेठ जी की
वृद्ध माता को बहुत आनन्द आया और
उसकी सुरति ध्यान में लीन हो गई। उस संस्कारी आत्मा की सुरति जब शब्द में जुड़
तो वह सचखण्ड के नज़ारों में मग्न हो गई। सेठ जी की माता जी जब धुरधाम का दृश्य
देखकर वापिस इस पिण्ड देश में आई तो आप पर बलिहार बलिहार जाने लगी और कहने लगी कि
हम जीव कितने भाग्यशाली हैं कि आज स्वयं खण्डों ब्रह्मण्डों के मालिक हमारे घर में
चलकर आये हैं। ऋद्धियाँ सिद्धियाँ जिनके आगे हाथ बाँधे खड़ी हैं सब देवी देवता
जिनकी सेवा के इच्छुक हैं। सेठ जी ने श्री चरणों में विनय की कि भगवन्, यह कमरा
जिसमें आप विराजमान हैं वह आप अपना ही समझिये और हमारी यह इच्छा है कि हम प्रतिदिन
यहाँ आपकी आरती व भजन-अभ्यास किया करें। आपने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर फ़रमाया-
ठीक है।
No comments:
Post a Comment