Tuesday, January 12, 2016

13.01.2016 अमृत कथा

         
श्री परमहंस दयाल जी टेरी को अपने वचनामृत से लाभान्वित कर रहे थे। आपकी महिमा आस-पास के क्षेत्रों में भी फैली हुई थी। अतः एक दिन पंडित भगवानदास नरयाब निवासी आपके श्री दर्शन को टेरी आये। भक्ति तथा वैराग्य की अवस्था में आँखों में आँसू भरकर श्री चरणों में प्रार्थना की कि महाराज- मेरा तो उद्धार असम्भव नज़र आता है। मैने ऐसे ऐसे कर्म किये हैं जिनका वर्णन नहीं हो सकता। लाखों जीव शिकार में मारे हैं। और क्या क्या विनय करूँ। जब उनके सम्बन्ध में सोचता हूँ तो निराश हो जाता हूँ। श्री परमहंस दयाल जी ने उन्हें धैर्य देते हुए फ़रमाया कि अब आप उनका कोई भी ख्याल दिल में न लायें और निरन्तर भजनाभ्यास करते जायें। आपका अवश्य उद्धार होगा। देखो- बाल्मीकि जी डाकू थे। उन्होंने अनेकों मनुष्यों का वध किया। राम राम की जगह मरा मरा जपा अर्थात अजपा जाप के अभ्यास से ऐसे उच्च कोटि के सन्त हुए कि उन्होंने श्री रामचन्द्र जी के जन्म से हज़ारों वर्ष पहले श्री रामायण लिखकर रख दी और श्री रामचन्द्र जी की धर्मपत्नी सीता जी भी उनका पानी भरती थी, फिर आपका तो ब्राह्मण का शरीर है। यदि आप भजन करोगे तो आपकी मुक्ति में क्या सन्देह है? श्री कृष्णचन्द्र महाराज जी ने भी फ़रमाया है कि जब शूद्र और वैश्य सबका उद्धार होता है तो हे अर्जुन! तू तो क्षत्रिय है, तेरी मुक्ति और उद्धार में क्या सन्देह है? श्री परमहंस दयाल जी ने पंडित भगवानदास को फ़रमाया कि आप भजन-अभ्यास में लगे रहो-धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा ।

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