Friday, January 8, 2016

09.01.2016 अमृत कथा

जब उसने अभ्यास की कमाई की और सुरति को अन्तर्मुख किया तो उस नाम की कमाई के कारण अन्तःकरण में आत्मिक दृश्य देखे। जिस स्थान पर वह पहले सत्संग के लिए जाता था, वहां गया तो सभी अन्य लोग चौधरी प्रेमचन्द के बदले हुए रंग-ढंग को देखकर चकित हो गए। अब तो उसकी आँखों में निराली ज्योति और हृदय में अनूठी मस्ती की लहर झूम रही थी। सबने मिलकर उससे पूछा- तुम्हें क्या हो गया है? उसने उत्तर दिया- बलिहार जाऊँ मैं अपने सद्गुरुदेव जी पर, जिन्होंने मुझ जैसे भूले भटके को अपना घर दिखाया और सुरति को इस संसार के मोह से स्वतंत्र कराकर अन्तर्मुख कराया और शब्द का भेद बताया। इसप्रकार वह मुक्तकंठ से श्री परमहंस दयाल जी के गुणानुवाद गाने लगा।
उसकी बातें सुनकर सत्संग में आने वाले अन्य लोगों में भी श्रद्धा उत्पन्न हुई । वे भी चौधरी प्रेमचन्द जी के साथ श्री परमहंस दयाल जी के श्री दर्शन के लिए गये। श्री दर्शन कर सबने श्री चरणों में प्रार्थना की- महाप्रभु- आप कुछ दिन यहाँ रह कर अपने वचनों से हमें भी कृतार्थ करें। उनका श्री चरणों में प्रगाढ़ प्रेम तथा श्रद्धा देखकर श्री परमहंस दयाल जी ने उनकी विनय स्वीकर की।
एक दिन सत्संग में श्री परमहंस दयाल जी ने फ़रमाया - इस जीव के सच्चे साथी केवल सन्त सद्गुरु ही हैं। शेष जितने भी सांसारिक सम्बन्ध हैं, उनका आत्मा से कोई भी सम्बन्ध नहीं। उनका सम्बन्ध मनुष्य के शरीर से ही है। जैसे मार्ग में यात्री आपस में मिलते हैं और बिछुड़ जाते हैं, ऐसे ही मनुष्य का संसार से सम्बन्ध है। इसी प्रकार दो दिन अमृत-वचन होते रहे।

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