Tuesday, January 12, 2016

14.01.2016 अमृत कथा


एक बार आप जयपुर में विराजमान होकर सत्संग-प्रवचन कर रहे थे। भक्त मण्डली एवं जिज्ञासुजन श्री चरणों में बैठकर वचनामृत का रसपान कर रहे थ कि एक फ़कीर आपके सामने आया। आपने पूछ- फ़कीर साहिब! बड़ी मुद्दत बाद आए, इतने दिन कहां रहे? उसने बड़े गर्व से कहा - वाह बाबा! यूँही तो छः वर्ष व्यर्थ नहीं किये। आखिर एक सिद्धि तो प्राप्त कर ही ली है। जिस इरादे पर चले थे तो भटकते ही रहना था क्या? कुछ पाना चाहिये सो पा लिया। आपने कहा- आख़िर कौनसी बड़ी शक्ति प्राप्त कर ली है, हम भी तो देखें कि क्या पाया आपने।
        उसने कहा- यदि आप देखना चाहते हैं तो यह लीजिए, देखिये। उसने झट से आँखें बन्द कीं और मुँह में कुछ कहते हुए लोट-पोट होता हुआ देव-दुर्लभ मानव काया को पलटकर मृग बनकर कुलाचे भरने लगा। कभी इधर भागता तो कभी उधर। जब कुछ देर उसने अपना मनोविनोद कर लिया तो वह अपनी काया-कल्प कर मनुष्य रूप धारण करने के लिए खूब ज़ोर लगाने लगा। भक्त मण्डली यह सब देख रही थी कि आप ( श्री परमहंस दयाल जी) उसे मात्र देख ही रहे थे। वह काया-कल्प करने के लिए छटपटाने लगा; कभी दीवार से सिर टकराता तो कभी भूमि पर गिर-गिरकर माथा पटकता, परन्तु अपने कार्य में सफल न होने पा रहा था।
        एक भक्त ने विनय की- प्रभो! इसे क्षमा कीजिये। आपने फ़रमाया कि जब तक यह संकल्प न कर दे कि मैं पुनः इसप्रकार नहीं करूँगा तबतक यह अपनी पहली अवस्था में नहीं आ सकता।
उस मृग रूपी फ़कीर ने संकल्प किया और क्षमायाचना की। वह अपनी पूर्व देह को प्राप्त हुआ तो आपने फ़रमाया -
        मनुष्य तो अपनी इच्छाओं एवं वासनाओं के अधीन पहले ही पशु-तुल्य कर्म करने में निरत है। फ़कीरों (साधुओं) का काम तो उन्हें मानव-जन्म की विशेषता का बोध कराना है। आत्म-जागृति ही मनुष्य की साधना है। मनुष्य बनकर पुनः जानवर बनने के लिए साधना करना कितनी अज्ञानता है। और फिर फूला नहीं समाता अपनी अज्ञानता पर कि मैंने कुछ पा लिया है। यदि पाना ही था तो वास्तविक वस्तु को पाने का प्रयत्न करता जिससे पुनः जन्म मरण के चक्कर में न आना पड़ता।
साधु का कर्तव्य तो यह है जैसे किसी आरिफ़ ने कहा है कि-
।। शेअर ।।
आबो गिल बरहम ज़दन ख़ुदरा बख़ुद जुस्तन मदाम ।
क़फ़से जुज़ वीयत शिकस्तन दीदा बस्तन सूये यार ।।
अर्थात पांच तत्त्व के शरीर से मुँह फेरकर अपने आपको अपने में ही सदैव खोजना। अल्पज्ञता के पिंजरे रूपी बन्धन को तोड़कर आँखें प्यारे की ओर लगाये रखना। यही एक सच्चे जिज्ञासु का कर्तव्य होता है।
        फ़कीर ने क्षमायाचना की और आपसे प्रभावित ह नित्यप्रति आपके श्री दर्शन एवं सत्संग से लाभान्वित होने के लिए आने लगा। भक्तमण्डली इस अगम लीला को निहार नत-मस्तक हो आपके गुणानुवाद गाने लगी और अनायास ही भक्तजी ने कहा कि पूर्व पुण्यों के फलस्वरूप हमें पूर्ण सत्पुरुषों की सुसंगति का सुअवसर प्राप्त हो गया है, इससे पूर्णतया लाभ उठाना चाहिए।

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