एकबार आप
टेरी में भक्त भगवानदास जी के घर ठहरे हुए थे। एक दिन राजयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग
आदि विषयों पर सत्संग वार्ता करते करते प्रेमयोग को उच्चतम योग बतलाकर हर्षातिरेक
हो आनन्दमग्न हो गए। नयन मूँद लिए और अश्रुओं की धार बहाने लगे। प्रेमीजन इस दृश्य
को देखकर कि महापुरुषों की लीला अगम है, मौन हो निहारते रहे; परन्तु
नन्दलाल भक्त जी तो मानो इस दिव्य रूप को निहारने में आनन्द मग्न हो समाधिस्थ हो
गए। कुछ समय पश्चात आपने नेत्र खोले और अपनी पूर्ववत् अवस्था में प्रवचन आरम्भ
किये। सभी भक्तजनों का ध्यान बार बार उस भक्त जी की ओर खिंचता चला जा रहा था कि वे
अभी तक समाधि अवस्था में बैठे हुए हैं। आपने सबकी ओर निहारते हुए फ़रमाया- भई! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? यह सब
हार्दिक विशुद्ध प्रेम का परिणाम है।
भक्त अमीरचन्द ने उठकर विनय की- दाता दयाल
जी! हमने इस प्रेमी को कभी भजन-ध्यान करते हुए नहीं देखा तो
इसे समाधि अवस्था कैसे प्राप्त हो गई?
आपने
फ़रमाया- प्रेम का नियम ही यही है जो दिल की तारों को झन-झनाकर आनन्द के राग गाने
लगता है, उसी राग में स्वयं को विलीन कर देता है और परमपद को पा लेता है जहाँ पर
योगी, तापस, सिद्ध-साधक हज़ारों जन्मों तक भी नहीं पहुँच सकते। सबने पढ़ा सुना तो
है परन्तु अनुभव के बिना उस गति को कौन जान सकता है। उद्धव ज्ञानियों के सिरमौर,
नीतिनिपुण और श्री कृष्ण जी के सखा थे। उन्हें कब मंजूर था कि उद्धव ज्ञान की गाँठ
में बँधे रहकर कई जन्म और लें और लक्ष्य को पाने में इतना समय लगायें। उन्होंने
उद्धव को ब्रज में गोपियों को ज्ञान प्रदान करने के लिए भेजा परन्तु रहस्य यही था
कि वे प्रेम-भक्ति के स्वरूप को निहार सकें। सो वे ब्रज में गये, उनको जैसेही
परा-अपरा भक्ति के भेद समझाने लगे तो गोपियों ने एक ही वाक्य में सब सार बतला
दिया-
कान्ह भये
प्रानमय प्रान भये कान्हमय।
हिय में न
जानि परै कान्ह है कि प्रान है।।
No comments:
Post a Comment