श्री
परमहंस दयाल जी श्री पावन वचनों की वृष्टि कर अन्यत्र चले गए। तीन दिन पश्चात
अचानक ही सेठ जी की माता स्वर्ग सिधार गई। सेठ जी को अत्यन्त शोक हुआ। उनके दिल
में तरह तरह के संकल्प उठने लगे।
इसी शोकयुक्त विचार में जब सेठ जी को
रात्रि समय नींद आई तो क्या देखते हैं कि श्री परमहंस दयाल जी हीरे लाल जवाहरात
जड़ित सिंहासन पर विराजमान हैं, जिसके आगे अनेकों सूर्य की ज्योति भी लजाती है।
ऐसे दिव्य सिंहासन के समीप सेठ जी की माता जी श्री परमहंस दयाल जी के श्री चरणों
की ओर बैठी हैं। सेठ जी ने श्री परमहंस दयाल जी के श्री चरणों में विनय की कि
प्रभो! मेरी माता जी तो आपके सुकोमल चरण छत्रछाया में मुसकरा
रही हैं और हमें इनका अत्यन्त शोक हुआ है।
आपने
फ़रमाया- सेठ जी, तुम्हारी माता जी उच्च संस्कारी आत्मा थी। नाम-दीक्षा से ही इसकी
सुरति ब्रह्मांड में शीघ्र ही पहुँच गई थी। इसने सुरति को सद्गुरु के प्रेम के
अटूट बन्धन में बाँध दिया था। अतः इसे अपनी कमाई और भावनानुसार श्री चरणों में
स्थान मिला है। इसके बाद सेठ जी की नींद खुल गई ।
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