Thursday, June 30, 2016

29.06.2016

उन श्रद्धालुओं में से एक ख़ान साहिब कैकाबाद जी (पारसी) और उनकी सुपुत्री प्रवीण आपके प्रति अति श्रद्धालु थे। खान साहिब उस समय की ब्रिटिश गवर्नमेंट की ओर से अति उच्च पद पोलिटिकल एजेण्ट की पदवी पर नियुक्त थे। आप जब भी कोयटा में पधारते तो ख़ान साहिब अपनी सुपुत्री सहित कोयटा रेलवे स्टेशन पर आकर आपको निवास स्थान पर ले जाते और जब तक कोयटा में निवास करते, वे प्रतिदिन सांय समय आपको अपनी मोटर कार में बाहर सैर के लिए ले जाते तथा श्री दर्शन का लाभ उठाते। जब आप कोयटा से प्रस्थान करते तो ख़ान साहिब रेलवे स्टेशन पर पहुँचाने तक आपकी सेवा में उपस्थित रहते।
      एक बार आपको कोयटा से अन्य स्थान पर पधारने के दिन ख़ान साहिब जी एक आवश्यक सरकारी काम में उलझे हुए थे। वे समय पर स्टेशन न पहुँच सके, परन्तु उनके मन में अत्यधिक व्याकुलता थी। अतः वे कार्य को बीच में ही छोड़ कर रेलवे स्टेशन पर पहुँचे। ख़ान साहिब जी ने रेलवे प्लेटफार्म पर पांव रखा ही था कि गाड़ी ने चलने की सीटी दी। ख़ान साहिब जी उन्मत्त होकर उस डिब्बे की ओर भागे, जिसमें आप विराजमान थे। ख़ान साहिब जी जैसे भागते हुए दिखाई दिये तो गार्ड ने उन्हें देखते ही गाड़ी रोक दी और वे आपके पास पहुँच गए और उन्होंने श्री चरणों को स्पर्श कर अपने आपको कृतार्थ किया। ख़ान साहिब जी को प्लेटफार्म पर भागते हुए देखकर उस समय वहां जितने लोग उपस्थित थे, सभी चकित हो गए कि इतने  ऊँचे पद के अधिकारी साधारण मनुष्यों की भाँति कहां भागे जा रहे हैं। उस समय ख़ान साहिब जी को किसी की भी चिन्ता न थी। जो मनुष्य अपने रुहानी राहनुमा जिनसे कि उसको आत्मिक शान्ति प्राप्त हुई हो और फिर वह अपने मालिक से बिछुड़ रहा हो, भला ऐसे मालिक के दर्शन और चरण-स्पर्श करने के लिए जाते समय किसी अन्य ओर ध्यान कैसे जा सकता है।
      सत्य तो है कि सच्चे प्रेमी को अपने प्रियतम के अतिरिक्त कुछ भी अच्छा नहीं लगता। वह उनके प्रेम में इतना आनन्द विभोर हो जाता है कि उसे उस आन्तिरक आनन्द तथा वास्तविक प्रेम में दुनियावी मान-अपमान, हानि -लाभ सब मिथ्या दिखाई देते हैं। ख़ान साहिब जी भी इसी सच्चे प्रेम के रंग में रंगे हुए थे, जिसका स्पष्ट रूप लोगों के सामने स्वयं प्रकट हो गया। गाड़ी में आपने अपने प्रेमी की आतुरता को मिटाने के लिए दो-तीन श्री अमृत वचन भी फ़रमाए। प्रेमी ने चरण-स्पर्श भी किया और एक क्षण श्री दर्शन तथा श्री अमृत वचनों का पान भी कर लिया। पुनः गाड़ी चल पड़ी और ख़ान साहिब जी बिना किसी ओर ध्यान दिए अपने काम पर लौट आए।

Wednesday, June 29, 2016

28.06.2016

आपने साधू वेष में ही अपनी विलक्षणता प्रकट की। जो लोग भी आपकी पावन संगति को प्राप्त करते, वे सुध-बुध भूल जाते। उस समय कोई यह न समझ सकता था कि आप अभी विधि के अनुसार रूहानी जानशीन हुए हैं या नहीं। आप जन्म से ही परमहंस के रूप को लेकर प्रकट हुए थे। कितनी विचित्र लीला है कि आप तो अपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री दर्शन के लिए लालायित रहते और सिन्ध में प्रेमीजन तथा जिज्ञासु आपके श्री दर्शनों की चाह में तड़पते। आपने प्रेम-भक्ति का ऐसा नशा पिलाया, जिसको पीकर सभी प्रेमी आन्तरिक आनन्द में झूमने लगे। कई बार तो बड़े-बड़े लोगों को आपके पीछे फिरते हुए देखा गया। आपके श्री दर्शन की लालसा के लिए दिवाने बने हुए उन्हें देखकर  अन्य लोग (जो इस पथ पर न आये थे) हैरान हो जाते कि इन सत्पुरुषों में कौन सी ऐसी शक्ति है जिससे दिल स्वयं ही मतवाला हो जाता है। उस समय अपनी स्थिति का भी किसी को ख्याल न रहता। लोक मर्यादानुसार मान-अपमान की चिन्ता भी न रहती। लोग आपको प्रेमवश 'जादूगर' भी कहते। आप भी तो प्रेम-भक्ति का ऐसा जादू चलाते कि उस अनूठी अनुपम मस्ती में खोकर प्रेमी सदा के लिए उसमें खोये ही रहना चाहते। जिस दिव्य आनन्द की खोज साधक, सिद्ध, योगी, तपस्वी जीवनपर्यन्त कठिन तपस्या एवं साधना में खोजते हैं, परन्तु फिर भी उन्हें सुलभ नहीं होता, वह शाश्वत आनन्द आपके श्री दर्शन मात्र से ही प्रेमीजनों को प्राप्त हो जाता। जिसने एक बार आपकी श्री सुषमा को निहारा, जिसके साथ एक-दो वचन भी हुए, वह तो अपना अस्तित्व ही खो बैठा। वह प्रेम-भक्ति के रंग में रगा गया।
      आपकी कीर्ति सिन्ध के आसपास के क्षेत्रों में अधिक फैल चुकी थी, क्योंकि आपने सिन्ध के गांव-गांव व शहर-शहर में पहुँचकर भक्ति का सन्देश दिया। आपकी कीर्ति सुनकर शिकारपुर (सिन्धप्रान्त) निवासी सेठ ताराचन्द जी आपके दर्शन के लिए आए। यह आपके अति विश्वासी और श्रद्धालु भक्त बन गये। इनका व्यापार काफ़ी बढ़ा हुआ था। इनका व्यापार शिकारपुर के अतिरिक्त कोयटा (बिलोचिस्तान) में भी चलता था तथा वहां पर ठहरने के लिए कोठियां भी बनी हुईं थीं। सेठ ताराचन्द जी व्यापार के काम के लिए जब भी कोयटा जाते तो आपजी के श्री चरणों में प्रार्थना करते कि कोयटा चलकर अपने पावन सत्संग रूपी अमृत से जीवों की प्यास बुझायें। आप उनकी प्रार्थना स्वीकारकर कई बार कोयटा पधारे। यहां पर आपने अनेकों जीवों को सत्संग-उपदेश से परितृप्त किया। काफ़ी संख्या में  लोग आपके श्रद्धालु बन गए।

Tuesday, June 28, 2016

27.06.2016

इस प्रकार सम्पूर्ण सिन्ध में आप (श्री तीसरी पादशाही जी) ने नाम की अमर ज्योति का प्रकाश कोने-कोने में भर दिया। पहले से ही आप श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी की श्री आज्ञानुसार अपने ही नाम पर नाम की दीक्षा दे रहे थे तथा सम्पूर्ण सिंध के भक्तों के घर में आप ही की श्री मूर्ति विराजमान थी। अन्य प्रचारक महात्मा जन जिनको श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने अन्य स्थानों पर सत्संग उपदेश के लिए भेजा था, वे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के नाम पर सत्संग कर रहे थे। उनमें से कुछ महात्माजनों ने आते-जाते हुए सिन्ध में एक अनोखी रचना देखी कि आप ( श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) अपने नाम पर नाम-उपदेश व गुरु-दीक्षा देते हैं तथा अपनी ही पूजा करवाते हैं। उनके दिल में कुछ शंका उत्पन्न हो गई।
      एक बार महात्मा धर्मात्मानन्द जी से रहा न गया। उन्होंने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के चरणों में जाकर सिन्ध का सारा वृतान्त कह सुनाया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया- " वे हमारी जी आज्ञा से सब कुछ कर रहे हैं। इसमें किसी को संशय करने की आवश्यकता नहीं। बिना आज्ञा के ऐसा करने की किस में शक्ति है? उन महात्मा जी ने क्षमा मांगी। जब उन्होंने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही जी) के बढ़ते हुए तेज को देखा तो श्रद्धा व प्रेम से आपकी सेवा करने लगे और अन्तिम श्वास तक श्री दरबार की सेवा करते रहे।
      अब ( श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) की विनय करने पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी सिन्ध में पधारे। उस समय सिन्ध के भक्तों ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के चरणों में विनय की कि अपनी ही श्री मूर्ति पूजा के लिए देवें। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पदाशाही जी) उस समय साधु वेष में थे तथा महात्मा रोशनानन्द जी उनकी सेवा में हुआ करते थे। भक्तों के विनय करने पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने आप ( श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) की ओर संकेत करते हुए फ़रमाया- " आप लोगों के पास जो पहले श्री मूर्ति है वही ठीक है।" अर्थात आपने पहले ही दर्शा दिया कि ये (श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) परिपूर्ण हैं। हम में और इनमें कोई भेद नहीं।

Monday, June 27, 2016

27.06.2016

बाद में जब भक्त हज़ारीमल जी की लगन व रुचि अधिक बढ़ती गई तो वहां पर एक बाबा जी रहते थे, जो उस गाँव में पूजनीय थे। भक्त हज़ारीमल जी ने इस सच्चे उपदेश की चर्चा उन से भी की। बाबा जी ने पूछा- "क्या तुमने उन्हीं से गुरु-दीक्षा ली है जो घोड़े पर चढ़ने की देरी में ही ज्ञान देते हैं।" उसने तो कटाक्ष किया, किन्तु कैसी विचित्र बात है कि आप इतनी शीघ्रता से माया के बन्धन से मुक्त कराकर ज्ञान का प्रकाश देते थे कि ऐसा अन्यन्त्र उदाहरण मिल सकना बड़ा कठिन है।
भक्त हज़ारीमल जी एक बार श्री दर्शन के लिए लक्खी गये और बाबा वाली बात श्री चरणों में निवेदित की। आपने मुस्कुराते हुए फ़रमाया - "हमने धुर दरगाही हुक्म को देखना है न कि बाबाजी को। उन्होंने अपना काम करना है, हमने अपना काम करना है।" महापुरुष तो त्रिकालदर्शी होते हैं। जो उनकी अपनी रूहें अर्थात परमार्थ तथा गुरु-भक्ति पर चलने वाली रूहें होती हैं, वे उनको स्वंय ढूँढ कर उसे परमार्थ का कार्य करवाते हैं।
      कितनी अपरम्पार लीला है। जिस मालिक को मिलने के लिए योगी, ऋषि, मुनि तपस्या करते हैं, हज़ारों वर्षों की तपस्या करने पर भी उन्हें मालिक की प्राप्ति सुलभ नहीं होती, वही इष्टदेव मालिक सन्त-महापुरुषों के रूप में शिष्यों की खोज करते हैं।
भक्त हज़ारीमल जी का कहना है कि जनवरी सन् 1936 में मुझे टी.बी. की बीमारी हो गई थी। मैं टी.बी. के अस्पताल में दाखिल हुआ। सात मास वहां रहा, परन्तु चिकित्सा करने पर भी ठीक न हुआ।
      डाक्टरों ने मुझे कहा कि तुम्हारा रोग तीसरे दर्जे पर पहुँच चुका है। यह झय रोग (टी.बी.) किसी दशा में भी ठीक नहीं हो सकता। भक्त हज़ारीमल जी ने मन में सोच कि अब बचने की कोई आशा नहीं है, इसीलिए क्यों न मैं अपने जीवन के कुछ दिन श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की सेवा में ही व्यतीत कर लूँ। वे सक्खर शहर के सैनिटोरियम अस्पताल से सीधे लक्खी लक्खी के आश्रम में पहुँच कर सेवा करने लगे। एक दिन उन्होंने अपने मन में सोचा कि मरने से पहले एक बार मुझे श्री सद्गुरु देव महाराज जी के श्री पवित्र दर्शन हो जाते तो अच्छा होता। उस समय श्री सद्गुरु देव महाराज श्री तीसरी पादशाही जी नसीराबाद में विराजमान थे और सत्संग का कार्य पहले अधिक बढ़ चुका था। परन्तु जिस समय उनका विनय-पत्र श्री चरणों में पहुँचा तो आपने महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी को लक्खी स्थान पर भेजा कि भक्त हज़ारीमल जी को अपने साथ नसीराबाद ले आओ।
जब महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी लक्खी पहुँचे तो क्या देखते हैं कि भगत जी को 103 (डिग्री) का बुखार है और स्टेशन पर पहुँचने के लिए कोई सवारी भी नहीं है। जब महात्मा जी ने भक्त जी को श्री दर्शनों के लिए चलने का सन्देश दिया तो उनकी खुशी की सीमा न रही। उन्हें बुखार भूल गया और वे साथ चलने को तैयार हो गए। रेलवे स्टेशन रुक (Ruk) वहाँ से पांच मील की दूरी पर था। गाड़ी का समय भी हो चुका था। उन्होंने पांच मील का रास्ता भागते भागते तय कर स्टेशन पर गाड़ी को पकड़ा। लक्खी स्थान के लोगों ने भक्त जी को इस हालत में जाने से मना किया था कि ऐसा न हो कि रास्ते में तुम्हारी हालत अधिक बिगड़ जाए, परन्तु भगत जी ने किसी की एक न मानी। जब वे स्टेशन पर पहुँचे तो बुखार स्वयं उतर गया और सब लोग हैरान हो गए। जो बुखार डाक्टरों के इतना इलाज करने पर भी न उतरा, वह उस दिन बिल्कुल ही उतर गया और भक्त जी निरोग हो गए। डॉक्टर बोधराज जी ने इनका इलाज किया था। वे जब कभी इनसे मिलते तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की महिमा करते हुए कहते जहां डाक्टरों के दिमाग़ ने काम नहीं किया, वहां श्री सद्गुरुदेव जी की कृपा काम कर गई। निस्सन्देह धन्य हैं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी।
      अब भक्त हज़ारीमल जी श्री दरबार में शरणागत होकर हित-चित से सेवा करने लगे तथा कुछ समय पश्चात श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने इन्हें साधु वेष देकर इनका नाम महात्मा परम विवेकानन्द जी रखा। इन्होंने अन्तिम स्वांस तक बड़े उत्साह, श्रद्धा, प्रेम और सच्ची लगन से श्री दरबार की सेवा की।

Friday, June 24, 2016

23.06.2016

इसके बाद आपने परमार्थ के लिए श्री आज्ञानुसार सिन्ध जाना था। आप लौटने को तैयार हुए। भगत जी भी आपके साथ पुनः स्थान गरेला (सिन्ध) आ गये। आप अपने परमार्थ पथ पर चलते हुए दिन-रात सत्संग की धारा प्रवाहित करने लगे। सन्त रज्जबदास जी का कथन है-
।। दोहा ।।
सन्त नदी जल मेघला, चलैं विहंगम चाल ।
रज्जब जहँ जहँ पग धरें, तहँ तहँ करैं निहाल ।।
सन्त महापुरुष- नदी व बादल- पक्षी की चाल चला करते हैं। यह तीनों जहाँ जहाँ पर कदम रखते हैं, सबको शीतल बना देते हैं। आपके प्रेमी आप में अनन्य अनुराग और अचल निष्ठा रखते थे। अब आप अपनी उच्च संस्कारी आत्माओं को जो सांसारिक व्यवहार में ग्रस्त थीं, परंतु परमार्थ पथ के लिए भी जिज्ञासु थीं, उन्हें इस पथ पर लाने के लिए स्वयं उनके पास गए। उनमें से एक भक्त हज़ारीमल जी (महात्मा परम विवेकानन्द जी) भी थे।
आप सिन्ध में बीचांजी स्थान में सत्संग की अमृत धारा प्रवाहित कर रहे थे। आपके निवास स्थान से लगभग पाँच छः मील की दूरी पर एक गाँव भिरकण था, जहाँ लोग पैदल आया-जाया करते थे। उन दिनों यातायात के साधन सुगम न थे। सवारी इत्यादि का कोई प्रबन्ध न था। वहाँ एक भक्त किसी कार्य के लिए नित्यप्रति पैदल जाया करता था। एक दिन आपकी मौज उठी कि हम भी उस गाँव में जाएँ। आपने उस भक्त को कहा कि हमने भी उस गाँव में जाना है। उसने विनय की- प्रभो! गर्मियों का मौसम है, पृथ्वी बहुत तपती है जिस पर पैदल चलने से आपको बहुत कष्ट होगा। यही अच्छा होगा यदि आप अब न जाकर फिर कभी जायें। आपने फ़रमाया कि हमारी आज ही वहाँ जाने की मौज उठी है, क्योंकि वहाँ बहुत ज़रूरी काम है। इसलिए हमें वहाँ अवश्य ही पहुँचना है। वह भक्त महापुरुषों के गुप्त रहस्यों को न समझता हुआ चुप हो गया। और आप भी उसके साथ गांव भिरकण जा पहुँचे।
      भिरकण पहुँच कर आप सीधे एक स्कूल में गए जहाँ लड़के पड़ते थे। स्कूल के सब लड़कों को निहारते हुए आपकी दृष्टि भक्त हज़ारीमल पर पड़ी जो सातवीं कक्षा में पड़ते थे। इन्हें देखकर आप दिल में विचार करने लगे यही लड़का उत्तम संस्कारी मालूम होता है। यही हमारे काम का है। भक्त हज़ारीमल को समीप बुलाया। उससे कुछ वार्तालाप किया। पाठशाला के सभी लड़के देखकर दंग रह गये कि हज़ारीमल को क्या हो गया है। उसकी आँखों में आपके मिलने से एक अनूठी मस्ती छा गई। वह उसी समय ही पद-पंकज का भँवरा बन गया। आपने उसे नाम उपदेश दिया और आश्रम का पता बता कर लौट आए। वहां से लौट कर उस सेवक ने ( जो साथ गया था ) आपके श्री चरणों में प्रार्थना की कि महाराज! यदि आप यहां होते तो आपके सत्संग में हज़ारों लोग आते और उनका कल्याण होता और आपका दिन सफल हो जाता। आपने फ़रमाया- "भक्त जी! आप तो एक दिन की बात कर रहे हो, परन्तु हमारा तो सिन्ध में आना ही आज सफल हो गया है। आगे चलकर जब वह लड़का परमार्थ के काम पर लगेगा। तो कितने ही जीवों का भला करेगा।" वह भक्त यह उत्तर सुनकर श्री चरणों में गिर पड़ा और कहने लगा- आप त्रिकालदर्शी हो। आने वाले समय में क्या होना है, यह आप ही जानते हो। हमारी भूल क्षमा करें।

Thursday, June 23, 2016

22.06.2016

आपकी श्रद्धा व भावना श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के प्रति उच्च स्तर की थी। एक बार आप स्थान गरेला ज़िला लाड़काना (सिन्ध) में विराजमान थे। गरेला में आपके कई धनाड्य भक्त भी श्रद्धालु थे। उनमें से भक्त जमीयतराय ने अपने भ्रमण के लिए एक कार खरीदी थी। सांय समय जब वह सैर के लिए जाता तो आपको भी सैर के लिए कार पर ले जाता। आप तीन-चार बार तो उसके साथ कार पर जाते रहे, पुनः कुछ सोचकर कार पर जाना छोड़ दिया। भक्त जमीयतराय ने जो आपका अनन्य श्रद्धालु था, आपसे कार पर न जाने का कारण पूछा। पहले तो आपने कोई कारण न बताया, परन्तु उसके अगाध प्रेम को देखकर आपने बताया कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) तो सैर व यात्रा पैदल चलकर या घोड़े पर चढ़कर करते हैं और हम यहां कार में बैठकर सैर करें, यह बात हमें शोभा नहीं देती। आपकी श्रद्धा व सच्चाई का प्रभाव उस पर ऐसा पड़ा कि उसने विनय की- ''यदि आप आज्ञा दें तो मैं अपनी यह कार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री दूसरी पादशाही जी) के श्री चरणों में समर्पित कर दूँ, क्योंकि इस कार को खरीद किये हुए अभी थोड़ा-सा समय ही हुआ है। यदि आपकी मौज हो तो नई कार भी ली जा सकती है।"
      आप (श्री तीसरी पादशाही जी) ने फ़रमाया कि भेंट करनी है तो नई वस्तु भेंट की जाए जो एक बार भी अपने प्रयोग में न लाई गई हो। नई वस्तु श्री चरणों में भेंट करना अधिक अच्छा होता है। इसप्रकार आप भक्त जी को उचित सलाह देकर उसको साथ लेकर लाड़काना (सिन्ध) से लाहौर (पंजाब) गए, वहां से डाज (Dodge) कम्पनी की नई कार खरीदी और उसे वहां से आश्रम पगाला ज़िला गुजरांवाला में ले गए।
      यह प्रसंग मार्च 1933 का है। उस समय श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी सन्त आश्रम पगाला ज़िला गुजरांवाला में संगतों को श्री दर्शन व अमृत वचनों से निहाल कर रहे थे। जब आप व भगत जी कार लेकर पहुँचे तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया हमें कार की ज़रूरत नहीं है। हमें तो पैदल यात्रा करने में बड़ा आनन्द आता है, लेकि आपकी व भगत जी की अत्यधिक श्रद्धा व प्रेम को देखकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को कार स्वीकार करनी पड़ी। भक्त हरनाम सिंह जी (महात्मा पूर्ण श्रद्धानंद जी) कार चलाना जानते थे। अतः वे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को सैर पर ले जाते रहे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को कार पर विराजमान हुए देख सारी संगत तथा आप (श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) अत्यन्त हर्षित हुए।

Wednesday, June 22, 2016

21.06.2016

।। श्लोक ।।
यद्यदारचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।
श्री मद्भगवद्गीता 3/21

हे अर्जुन! श्रेष्ठ पुरुष जो आचरण करते हैं, अन्य पुरुष भी उसके अनुसार ही चलते हैं। वे श्रेष्ठ पुरुष जो कुछ प्रमाणित कर देते हैं, लोग भी उसके अनुसार ही बर्तते हैं। अर्थात आपने वही नियम अपनाये जो गुरु-भक्ति मार्ग में अनिवार्य हों। जब गुरु-दीक्षा लेकर आपने तन-मन-धन एवं सर्वस्व समर्पित कर दिया तो सब कुछ सद्गुरु का बन गया। उनकी श्री आज्ञा तथा श्री प्रसन्नता ही शिष्य का धर्म बन गया। आप भक्तों, जिज्ञासुओं एवं प्रेमियों द्वारा लाई हुई वस्तुओं तथा श्रद्धायुक्त भेंट को श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री दूसरी पादशाही जी) के श्री चरणों में भेंट कर देते। आप फ़रमाते थे कि संसार की प्रत्येक वस्तु अपने इष्टदेव जी के चरणों में समर्पित करके भक्ति में दिल लगाना चाहिए। धनी धर्मदास जी ने भी ' श्री गुरु महिमा' में कहा है कि -
असन वसन वाहन अरु भूषण ।
सुत दारा निज परिचारक गण ।।
कर सब भेंट गुरु के आगे ।
भक्ति भाव उर में अनुरागे ।।
अर्थात श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में श्रद्धा-प्रेम से परिपूर्ण होकर जाना चाहिए। जो कुछ वे दें, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। कई बार भक्त लोग अच्छे वस्त्र व कईं प्रकार की वस्तुएँ आपको भेंट कर सेवन के लिए विवश करते, लेकिन आप फ़रमाते- जो कोई श्रेष्ठ पदार्थ पाऊं, सो गुरु चरणन आन चढाऊँ। " आप हमें भेंट करते हो तो हम अपने इष्टदेव श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के चरणों में भेंट करेंगे।
      आपकी सेवा, भावना और श्रद्धा को देख कर सत्संगी लोग अधिक प्रभावित होते थे। जब आप सिन्ध से श्री दर्शन के लिए जाते तो बहुत सी संगत आपके साथ जाती थी। उन लोगों की श्रद्धा एवं प्रेम को देखकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी( श्री दूसरी पादशाही जी) बहुत प्रसन्न होते। आपने अपने प्रेमियों को भी त्याग का मार्ग दिखाया और सबमें त्याग एवं वैराग्य की भावना कूट-कूट कर भर दी।
आप समय-समय पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री दर्शन के लिए जाते। एक बार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी चकबंदी व भखड़ेवाली में विराजमान थे। आप श्री दर्शन के लिए श्री चरणों में पहुँचे और सिन्ध में कृपा करने के लिए श्री चरणों में विनय की। आपकी विनय स्वीकार कर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सिन्ध को कृतार्थ किया। आपने सिन्ध प्रदेश व वहोआ के कुछ एक श्रद्धालुओं को सन्यास भेष भी दिलवाया। आपके श्रद्धालु व प्रेमी एक से एक बढ़कर धनी थे फिर भी आप उन्हें सादगी तथा फ़कीरी का पथ दिखलाते थे। प्रेमी बढ़िया से बढ़िया भोग प्रसाद भेंट करते, परन्तु आप मक्की का फुलका तथा साग ही पसन्द करते और उसी का ही श्री भोग लगाते। उस समय जिन प्रेमियों ने आपकी पावन लीला को निहारा, वे आज भी अपने मुँह से यही कहते हैं कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही जी) मक्की का फुलका और साग का भोग लगाते तथा साथ ही फ़रमाते थे- "खा के देखो, कितना स्वाद है इसमें। ऐसा स्वाद तो पकवान्न और अन्य पदार्थों में भी नहीं मिलता। साधारण भोजन से मन भी शुद्ध होता है।" इसीलिए प्रेमीजन सात्त्विक भोजन ही श्री भोग के लिए लाया करते थे।

Monday, June 20, 2016

20.06.2016


         ऐ आधारी! योगिन बन, तू प्रभु के ध्यान में लीन रहे।
अडिग हिमालय की भाँति, तू एक जगह आसीन रहे ।।
जड़ होकर भी प्रेम का अद्भुत, सब को पाठ पढ़ाती है।
प्रीति निभाने की रीति का, ढंग विचित्र बताती है।।
अब वह मन ही मन लजाता हुआ आश्रम में आ गया। आते ही आपजी के श्री चरणों में दण्डवत की। आपने मुसकुराते हुए पूछा-प्रेमी कहाँ गया था? उसने पुनः पुनः वन्दना कर क्षमा मांगी और विनय की कि प्रभु! मेरे मन ने मुझे धोखा दिया था, आपने कृपा की है, इसीलिए क्षमा मांगता हूँ। आपने वचन फ़रमाये- ''सन्त महापुरुषों की परीक्षा लेना उचित नहीं। यह मन तो जन्म जन्मों से जीव का शत्रु है। पग-पग पर जीव को धोखे में डालकर इसे गिरावट की ओर ले जाता है। मन ही तो जीव को भक्ति-मार्ग पर चलने नहीं देता। गुरुमुख को इसके धोखे में नहीं आना चाहिए। सन्त महापुरुषों की परीक्षा लेना स्वयं को धोखे में डालना है।"  उस प्रेमी ने पुनः क्षमा मांगी।
आपने परमार्थ पथ पर आरूढ़ होकर साधु-वेष में पूरे सिन्ध प्रान्त तथा बिलोचिस्तान को अपने अमृत प्रवचनों से अनगृहित किया। इसके अतिरिक्त ज़िला डेरागाज़ीखां में हज़ारों जीवों को भक्ति पथ पर लगाया। हज़ारों प्रेमी जिज्ञासु आपके शिष्य बने। आपने सिन्ध प्रदेश में सत्संग के लिए निम्नलिखित आश्रम बनवाये-
1. लक्खी ज़िला सक्खर 2. भैन गांव ज़िला सक्खर 3. सक्खर शहर 4. गरेला ज़िला लाड़काना 5. गोघाना ज़िला लाड़काना 6. नसीराबाद ज़िला लाड़काना 7. वहोआ ज़िला डेरागांज़िखां 8. मांडी ज़िला सक्खर।
इन स्थानों पर प्रतिदिन प्रातः सांय भक्त लोग सत्संग के लिए आते और दोनों समय भजन अभ्यास भी होता । कुछ नियत किए हुए प्रेमी-गुरुमुख इन आश्रमों का प्रबन्ध तथा सेवा जी-जान से करते। समय समय पर संगतें आपके श्री चरणों में दर्शन देने के लिए विनय करतीं। आप उस विनय को स्वीकार कर कई कई दिन तक एक स्थान पर ठहरते और सत्संग प्रवाह चलता रहता। आप जिस जिस स्थान पर जाते, प्रेमियों की संख्या अधिक से अधिक हो जाती थी। आप सत्संग का ऐसा अमृतमय प्रवाह बहाते कि जिज्ञासुओं को खाना-पीना भी भूल जाता था। दूर-दूर से आये हुए प्रेमी कई-कई दिन उन स्थानों पर ठहरे रहते। इन स्थानों पर लंगर व ठहरने का प्रबंध मुख्य-मुख्य भक्तों की ओर से होता था। जिज्ञासु, श्रधालू व प्रेमीजन जो सेवा, सामान एवं धन राशि भेंट करते, आप सब सेवा चकौड़ी सन्त आश्रम में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की आज्ञानुसार लंगर में लगा देते। आपने गुरु-भक्ति पथ को दृढ़ करने के लिए इस प्रकार का आदर्श स्थापित किया, जैसे भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी महाराज ने अर्जुन को उपदेश दिया है कि-

Sunday, June 19, 2016

19.06.2016

एक दिन क्या हुआ कि रात्रि के समय वही भक्त नींद से उठा और आपको पलंग पर विश्राम न करते हुए देखकर चकित हो गया। इधर-उधर देखकर वह  सोचने लगा कि महापुरुषों की लीला अपार होती है, गये होंगे किसी प्रेमी का गृह कृतार्थ करने। आपके आने की राह देखते-देखते उसे नींद आ गई। इस प्रकार निरन्तर तीन चार रात्रि इस प्रकार हुआ कि उसकी नींद खुल जाती और वह उठकर देखता तो आप पलंग पर विश्रम करते हुए दिखाई न देते। प्रातः उठने पर आपको पलंग पर विराजमान पाता। उसके मन पर उत्कण्ठा उत्पन्न हुई कि रात्रि समय आप कहाँ जाते हैं?
इसके दूसरे दिन वह रात्रि काल में जागता रहा। जब आप रात को उठ कर जाने लगे, तो वह भी चुपके से आपके पीछे हो लिया। जब आप अपने नियत स्थान पर पहुँचे तो उसने देखा कि एक आधारी (लकड़ी की बनी हुई बैरागन) आपके आसन पर सीधी खड़ी है। आप वहां जाकर अपने आसन पर विराजमान हो गये और नयन मूँद कर अपने आनन्द में लीन हो गये। वह भक्त भी थोड़ी दूरी पर दुबक कर बैठ गया और श्री छवि को निहारता रहा। जब आप वापिस लौटे तो उसने आधारी को वैसा का वैसा खड़े हुए पाया। उसके दिल में इस आधारी (वैरागन) के समीप जाकर उसके परीक्षण का विचार उठा। वह छुप कर एक ओर हो गया। जब आप उसे बिना देके लौट आए तो वह वहां गया, जहाँ आपका आसन बना हुआ था। आसन कुशों का था, ऊपर सफेद चादर बिछी हुई थी। उसके ऊपर आधारी बिल्कुल सीधी खड़ी हुई थी। उसने उसे हिलाया, परन्तु आश्चर्य! वह आधारी तो सुमेरु पर्वत की तरह अडिग तथा अचल थी। उसने नीचे ऊपर सब ओर देखा कि कहीं कोई कील तो नहीं लगाई गई, परन्तु कहीं भी कुछ दिखाई न दिया। उसने उसे खूब ज़ोर से हिलाया, लेकिन हिलाने में असफलता प्राप्त हुई, यहां तक कि कुशा के आसन को भी धरती से एक इंच ऊपर न उठा सका। उसने आसन के आगे वन्दना की और लौट आया। मार्ग में बार-बार पीछे की ओर देखता कि कहीं अभी वह आधारी गिरी तो नहीं। वह तो अपने प्रभु की आज्ञानुसार साधना में लीन थी कि कब रात्रि हो और उसके मालिक उसे कृतार्थ करें। वह भक्त पुनः लौट गया और श्रद्धा तथा प्रेम से उस आसन के सामने बार-बार वन्दना कर आधारी की स्तुति अपने उद् गारों में इसप्रकार की-
 शेष प्रसंग कल आयेगा।

Saturday, June 18, 2016

18.06.2016

इस प्रकार आप सत्संग-उपदेश की पावन गंगा निरन्तर बहा रहे थे और प्रेमीजन संस्कारी आत्माएं उसमें मज्जन कर कृतार्थ हो रही थीं। आप सिन्ध प्रान्त के प्रत्येक गांव में तथा उस पूर्ण क्षेत्र में नाम की ज्योति का प्रकाश फैलाने में संलग्न थे।
      आप लक्खी से एक बार भैन गांव में गए वहां पर भक्त ककूमल जी तथा भक्त फिरन्दमल जी के घर ठहरे। कुछ समय पश्चात वहां आश्रम भी बनवाया। वहां पर आप नित्यप्रति नदी के किनारे सुहावने वातावरण में एकान्त शान्त स्थान पर रात्रि समय भजनाभ्यास के लिए जाते तथा दिन के समय सत्संग कार्य करते। आप परब्रह्म होते हुए भी नर-लीला के रूप में सर्व कार्य जन कल्याण के लिए करते जिसे जीव की बुद्धि समझ ही नहीं सकती। किसी भक्त के मन में यह ख़्याल आया ( जो श्री चरणों की सेवा में रहता था) कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी भी हमारी ही तरह रात्रि को विश्राम करते हैं। प्रातः उठते हैं और दिन के समय सत्संग कार्य करते हैं। हमें तो हर समय भजनाभ्यास नियमपर्वक करने के लिए उपदेश करते हैं, न जाने स्वयं कब भजनाभ्यास करते हैं? प्रभाव भी इनका इतना है कि हृदय में किसी और के लिए स्थान ही नहीं रहा। ऐसा तेजोमय सुन्दर स्वरूप है जिससे आप से आप लोग इधर खिंचे चले आते हैं। मैं स्वयं भी तो दीवाना बना रहता हूँ। समझ में कुछ नहीं आता कि यह कैसी लीला है। कई बार श्री चरणों में कुछ पूछने के लिए जाता हूँ, परन्तु सम्मुख जाते ही सब कुछ भूल जाता हूँ।
इधर आप दिन के समय सत्संग का कार्य करते और रात्रि समय जब समस्त संसार निद्रा में सोया हुआ होता तथा आपके सेवक भी गहरी निद्रा में सो जाते तो आप उठकर योगाभ्यास के लिए दूर चले जाया करते थे। आश्रम से दूर बाँध के समीप आपने एक आसन बनाया था, वहां पर जाकर विराजमान हो जाते। प्रातः लोगों के उठने से पहले ही लौट आते ताकि किसी को भी पता न चले। सन्त-महापुरुषों का यह आदिकाल का नियम है कि -
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागृति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ।
                                    श्री मद्भगवद् गीता 2/69
सम्पूर्ण भूत प्राणियों के लिए जो रात्रि है, उस नित्य शुद्ध बोधस्वरूप परम आनन्द में ब्रह्मनिष्ठ योगी पुरुष जागता है और जिस नाशवान क्षणभंगुर सांसारिक सुखों की आशाओं में सब भूत प्राणी जागते हैं, तत्त्व को जानने वाले मनीषियों के लिए वह रात्रि होती है अर्थात जब संसार के लिए रात्रि होती है योगी व परमात्मा से मिलने वाले अभिलाषियों का वही दिन होता है। वे इस शान्त-एकान्त वातावरण में भजनाभ्यास में लीन हो जाते हैं। जब संसारी लोगों का दिन होता है तो सन्त महापुरुषों की रात्रि होती है, क्योंकि दिन के समय सन्त महापुरुष परमार्थ का कार्य करते हुए थोड़ा-सा विश्राम कर लेते हैं। श्रीरामचरितमानस में अयोध्याकाण्ड में लक्ष्मण जी गुह को उपदेश करते हुए फ़रमाते हैं-
।। चौपाई ।।
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथी प्रपंच बियोगी ।।
कि इस संसार रूपी रात्रि में वे योगीजन जागते हैं, जो माया से विरक्त तथा परमार्थी होते हैं और वे ही रात्रि के समय योगाभ्यास किया करते हैं।

Friday, June 17, 2016

17.06.2016

अभी तो आपने सिन्ध में लक्खी स्थान में ही पदार्पण किया था, आपने तो सम्पूर्ण सिन्ध में परमार्थ की ज्योति का प्रकाश फैलाना था। सिन्धी लोगों की साधु-महात्माओं में सहज श्रद्धा थी। अतः  अन्होंने सहज इस पथ को स्वीकार किया। अज्ञान के अन्धकार में भटकते हुए सिन्धी प्रेमीजन प्रेम के देव को पाकर प्रेम-विभोर हो गए। उनकी जन्म जन्मांतरों की तृषा ने ऐसा संयोग बनाया। थोड़े समय में ही आपने सिन्ध सिन्ध में सत्संग आश्रम स्थापित कर सिन्धी भाषा भी सीख ली। आपने गुर-भक्ति का जो बीज सिन्ध में बोया, वह दिन-प्रतिदिन फलने फूलने लगा। सैंकड़ों प्रेमी व जिज्ञासु इस पावन नामोपदेश के तीर्थ में मज्जन करने लगे। परिणामस्वरूप आपकी महिमा संपूर्ण सिन्ध तथा आसपास के क्षेत्रों में फैल गई। दूर व समीम से संगतें श्री दर्शन व सत्संग-उपदेश श्रवण करने के लिए आने लगीं। आप प्रायः यह प्रवचन फरमाते थे-
''मानव मानव अंतरा, कोई हीरा तो कोई कंकरा।''
संसार में अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के परिणामस्वरूप मानव जन्म तो मिल गया, परन्तु मनुष्य मनुष्य में भी अन्तर होता है। इनमें से कुछ हीरें के समान हैं, शेष कंकरों के समान। अर्थात जिसने मानव जन्म पाकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं किया, प्रभु मिलन की जिसने दिल में तड़प ही पैदा नहीं की, वह मानव जन्म पाकर भी चौरासी लाख योनियों में जाने की तैयारी कर रहा है। ऐसे जीवों को सन्त महापुरुषों ने कंकरों का दर्जा दिया है। जिन्होंने मानव जन्म को पाकर  पूर्ण पुरुषों की संगति में उनसे अनमोल नाम रूपी हीरे को प्राप्त किया तथा उस नाम (अथवा शब्द) की कमाई की, उनका जीवन हीरे के समान है। हीरा अत्यन्त मूल्यवान वस्तु है, परन्तु इसकी अपेक्षा कंकरों का क्या मूल्य है? कंकरों को सब पांव के नीचे ही रौंदते हैं। इसी प्रकार ही मानव जीवन की कीमत केवल सन्त-महापुरुष ही जानते हैं , वही इस हीरे की परख करते हैं।
      यह संसार सागर की न्याई है। इससे पार उतरने का ढंग सन्त महापुरुष समय के सन्त सद्गुरु ही बताते हैं। जिस मनुष्य ने सन्त महापुरुषों की सुसंगति ग्रहण कर ली, वह उच्च संस्कारी आत्मा है। यह उच्च संस्कारी आत्मा ही मानव जन्म रूपी हीरे का मूल्य पहचान सकती है। अतः महापुरुष यही उपदेश देते हैं कि ऐ जीव! अपने मानव जीवन के ध्येय को प्राप्त कर और इस संसार सागर से पार हो जा। मानव जीवन को प्राप्त करने का यही परम लक्ष्य है। अपने लक्ष्य की पहचान कर।

Thursday, June 16, 2016

16.06.2016

दूसरे दिन प्रातःहोते ही पंडित जी का हृदय प्रेम में झूमने लगा। उसने अनुभव किया कि उसने जैसे किसी खोई हुई वस्तु को प्राप्त किया हो। उसने विनय की- ''प्रभु! आपका यह अपना स्थान है, यहीं पर ही कृपा फरमाइये।" उसकी विनय तथा प्रेमी संस्कारी आत्माओं की प्साय बुझाने के लिए दिन-रात वहीं सत्संग प्रवाह चलने लगा। प्रेमीजन विभिन्न प्रकार की भोजन सामग्री तथा श्रद्धायुक्त भेंट श्री चरणों में लाने लगे। यह देख कर पंडित जी बहुत हैरान थे कि ऐसा दिव्य स्वरूप, मनोहारी 'साधु-महात्मा' आज तक तो देखने में नहीं आया जो इतनी जल्दी प्रभाव डाल सके। कोई भी प्रेमी जैसी भी भेंट लाता अर्थात यदि कोई मक्की या जौ की रोटी अथवा कोई अन्य पकवान आदि लाता तो आप सब कुछ सहर्ष स्वीकार करते। बड़े प्रेम से सबमें बांटते और प्रसन्न होते। इससे उन प्रेमियों की श्रद्धा, प्रेम और विश्वास अधिक बढ़ जाता। आप एक ही नज़र से प्रेमियों के हृदय पटल पर अधिकार कर लेते। जो भी जिज्ञासू शरण में आया अथवा आपकी पावन संगति जिसे भी मिली, वह सारी सुधि भूल जाता। पण्डित जी का अपना दिल भी अब आनन्द की लहरों में झूम रहा था, वे दूसरों के विषय में क्या सोचते? आठ दिन पश्चात जब आप वहां से किसी अन्य स्थान की ओर जाने लगे तो पण्डित जी ने आग्रह पूर्वक कहा कि दीन दयाल जी! इस स्थान को अपना समझ कर कृतार्थ करते रहें। कितना प्रताप था श्री दर्शन का? कहाँ तो रात्रि भर स्थान देने को तैयार नहीं था और अब वह विलग होना नहीं चाहता था।

Wednesday, June 15, 2016

15.06.2016

बढ़ गये गुरु भक्ति पथ पे, परमार्थ पथ के राही ।
श्री आज्ञा व श्री सेवा में, गुरु की प्रसन्नता पाई ।।
सब जंजाल झटक कर अपना, औरों को दीन्ही रिहाई ।
एक नई दुनिया को बसाने, प्रगटी जोत इलाही ।।
विलक्षणता आपका प्रथम गुण था। बाल्यकाल से आकर्षण शक्ति का भी गुण विद्यमान था। इसके साथ-साथ सुन्दर स्वरूप, सुडौल शरीर, चेहरे पर एक अनोखे ढंग की दीप्ति, ओठों पे मधुर मुसकान, बांकी चितवन और मधुर वाणी- भला ऐसा कौन होगा जो इस दिव्य स्वरूप और तेजोमय मूर्ति को देखकर आकर्षित न होगा। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने जैसे स्वयं ही अपने स्वरूप  जैसा इस दिव्य रूप को बनाया हो। विधाता तो इस दिव्य स्वरूप का दर्शन कर आश्चर्य में पड़ गया, साथ में साधु वेष। इस वेष ने जैसे आपकी मनोहारी झांकी की शोभा को ओर भी निखार दिया। भगवे वेष के साथ उसी रूप की आभा मुखमण्डल पर इठलाती थी। मस्तक पर एक नूरानी तेज झलकता था। प्रकृति ने अजब रंग दिखाया है, उद्यान में अनेक रंगों के पुष्प खिलाये, परन्तु पुष्पराज गुलाब तो अपनी दिव्य छटा से मन मुग्ध करने के लिए अनोखे ढंग से उद्यान में शासन करता है। ऐसे ही हृदय रूपी उद्यान पर आपने अनोके ढंग से शासन किया।
      आप श्री आज्ञानुसार फोर्टसन्डेमन तथा बिलोचिस्तान होते हुए रुक (Ruk) स्टेशन पर पहुँचे। यहाँ आपको सेठ बन्नामल जी मिले। वे आपको अपने साथ लक्खी ले गये। यहाँ पर आप भक्त जी के साथ एक धर्मशाला में ठहरे। जब धर्मशाला में गये तो उसके निवासी पंड़ित जी ने स्थान देना अस्वीकार कर दिया। आपने भगत जी को फ़रमाया कि उससे एक रात्रि यहां ठहरने के लिए स्थान मांगें। भक्त जी ने श्री वचनानुसार समझा-बुझा कर एक रात्रि के लिए स्थान ले लिया। आपने परमार्थ-कार्य आरम्भ किया। श्री पावन मृदल वचनों से सर्वप्रथम पंडित जी को उपदेश दिया। रात्रि के होने तक ही संस्कारी उच्च आत्माएं बरबस आपकी ओर खिंचती चली आईं। यह दिव्य गुणसम्पन्न विभूति जब जिस ओर भी पग बढ़ाती, मुस्काते वदन से चित्ताकर्षक किरण फूटती जो बरबस दिलों को खींचने लगती। बस फिर क्या था? प्रेमीजन भ्रमरों की न्याईं उस सरस ज्ञान-कमल पर लगे मंडराने।  आप भी श्री वचनों से सबको कृतार्थ करने लगे।

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज- साधु वेष


श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के हृदय में नाम-उपदेश की अमर ज्योति का प्रकाश स्थान-स्थान पर फैलाने की एक तरंग उठी। इस लहर ने सन् 1920 में लक्की मरवत् में साकार रूप धारण किया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने कुछ अधिकारी गुरुमुखों को साधु-वेष देकर लक्की मरवत् में एक साधु-मण्डली तैयार की। उनमें से कुछ महात्मा जनों को सत्संग उपदेश कार्य के लिए विभिन्न स्थानों पर भेजा। साथ में यह आज्ञा भी दी कि सद्गुरु के नाम पर सत्संग उपदेश देकर अधिकारी आत्माओं को परमार्थ-लाभ कराओ।
उन्हीं दिनों में स्थान लक्की मरवत् में ही सन् 1920 में आपको साधू वेष प्रदान कर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने आपका शुभ नाम श्री स्वामी वैराग्य आनन्द जी रखा। आपके हृदय में प्रेम का सागर हिलोरें लेने लगा। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने आपको भी सत्संग-उपदेश की सेवा फ़रमाई। साथ में यह वचन फ़रमाए - ''आप फोर्टसन्टेमन, बिलोचिस्तान तथा सिन्ध को चिताने के लिए जाओ। वहां पर अपने ही नाम पर सत्संग-उपदेश दो। कुछ लोग इस विषय पर आपत्ति करेंगे, लेकिन आप उनकी ओर तनिक भी ध्यान न देना।'' आपको श्री सद्गुरुदेव महाराज जी का वियोग असह्य था। श्री प्रन्नता तथा श्री मौज को प्राप्त करने के लिए आपने श्री आज्ञा को शिरोधार्य कर वैसा ही किया। श्री आज्ञा थी कि अपने नाम पर परमार्थ-लाभ कराओ। इतनी शीघ्र इतना ऊँचा पद मिल जाने पर भी आपके हृदय में अपने पद का ख़्याल उत्पन्न न हुआ।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने आपको सिन्ध भेजते समय फ़रमाया कि कलियुग के जीव निर्बल हैं, वे अपने कर्मों से नहीं, अपितु सद्गुरु की कृपा से पार हो सकते हैं। इसलिए जो भी आपसे नाम का दान मांगे, उसे उदारता के साथ नाम-दान प्रदान करना है। यह जो सत्य नाम है कभी निष्फल नहीं जाता। चाहे एक दिन में, चाहे एक वर्ष में, चाहे इससे भी अधिक समय में अपना फ़ल ज़रूर देता है। नाम रूपी बीज जीव के हृदय में अवश्य ही अंकुरित होता है और अवश्य ही होगा। आप इस नाम के अमृत को जन-जन को पिलायें। हमारा आशिर्वाद आपके साथ है।
      आप नम्रता से श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की आज्ञानुसार परमार्थ की अनन्त यात्रा पर निकल पड़े। इसके आन्तरिक रहस्य को तो केवल श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ही जानते थे। अतः उन्होंने आरम्भ से ही आपको ऐसी श्री आज्ञा प्रदान की।

Tuesday, June 14, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज....

कुछ समय तक आप श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के साथ रहे। जहां भी वे जाते, आपको निजी श्री सेवा का सुअवसर प्रदान करते। आप भी उनके श्री दर्शन करते हुए श्री आज्ञा में सदा तत्पर रहते। आपने सेवा का वह अद्भुत चमत्कार दिखाया कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की प्रसन्नता एवं कृपा के पात्र बन गये। वे मन ही मन आपके त्याग और प्रेम को देखकर अत्यन्त पुलकित हो उठते थे। आपको उस समय न दिन में विश्रमा की चिन्ता रही न रात्रि को नींद के लिए ही विचार उत्पन्न हुआ।
      सद्गुरु की कृपा का पात्र बनने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि जीव सद्गुरु की आज्ञा व मौज पर चलने एवं भक्ति के प्रत्येक नियम पर आचरण करने के लिए तत्पर रहे। उपनिषद्कार का कथन है कि परमात्म-तत्त्व को वही जानने वाला है अर्थात आत्म साक्षात्कार वही कर सकता है जिसके अन्दर प्रभु मिलन की तड़प है, जो प्रभु के अतिरिक्त किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता। अपने विचरों को अथवा अपने मस्तिष्क को अन्य झंझटों में नहीं डालता अर्थात श्री गुरुदेव की मौज में राज़ी रहता है। उनकी आज्ञानुसार सेवा में निरत रहकर श्री प्रसन्नता को प्राप्त करता है। गुरु-आज्ञा मानना ही गुरु-भक्ति का मुख्य नियम है। ऐसा ही आपने किया तथा इस सिद्धान्त पर चलकर गुरु-भक्ति के लिए यह सिद्धान्त आवश्यक बताया कि 'मनमति का त्याग कर गुरुमति को ग्रहण करना।' यही नियम ही गुरु-भक्ति की मंज़िल को प्राप्त करने का एकमात्र सरल तथा अत्युत्तम साधन है।

Wednesday, June 8, 2016

05.06.2016

इस प्रकार की शुभ प्रेरणा आप बार-बार पिताजी को दिया करते। इससे सिद्ध होता है कि स्वभावतः संसारी बन्धनों से मुक्त रहना चाहते थे। आपकी शुभ प्रेरणा का प्रभाव आपके पूज्य पिताजी के मन पर पूर्ण रूप से पड़ा। उन्होंने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के रूहानी जानशीन होने के चार-पांच मास पश्चात ही श्री चरणों में शरणागति प्राप्त कर ली। इसके पश्चात शीघ्र ही विनय कर साधु-वेष भी ग्रहण कर लिया। साधु वेष में महात्मा पुरुषोत्तमानन्द जी के रूप में उन्होंने दरबार की हित-चित्त से सेवा की।
      आपके मन की साध पूरी हुई। पिताजी के शरणागत होने पर मार्ग की बाधाओं से स्वतन्त्रता प्राप्त हो गई। यदि विघ्न बाधाऐं आतीं भी तो आप उनसे कहां डरने वाले थे। आप नाम रूपी अमृत के आनन्द में हमेशा लीन रहते। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री चरणों में आपका प्रेम दिन प्रतिदिन अधिकाधिक बढ़ता गया।
एक बार उन्हीं दिनों में जब आप निकटवर्ती स्थान पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री दर्शन के लिए गये, श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने स्वाभाविक ही सत्संग में यह प्रवचन किये-
।। दोहा ।।
भक्ति गेंद चौगान की, भावै कोई ले जाय ।
कह कबीर कछु भेद नहीं, कहा रंक कहा राय ।।
      अर्थात संसार के मैदान में ईश्वर ने भक्ति की गेंद उछाल दी है। जैसे खिलाड़ी गेंद के साथ खेलते हैं, उनमें निपुण खिलाड़ी ही चौगान की गेंद को पकड़ सकता है, साधारण नहीं, ऐसे ही भक्ति की गेंद भी चतुर गुरुमुख ही ले सकता है। इसके लिए ग़रीब-अमीर का कोई प्रश्न नहीं। जो भी चाहे इसे प्राप्त कर सकता है। इस भक्ति रूपी गेंद से खेलने के लिए सिर-धड़ की बाज़ी लगानी पड़ती है। अपनी मनमति का त्याग कर गुरु के बताए हुए उपदेशों पर चलना ज़रूरी हो जाता है। इस भक्ति को पाने के लिए त्याग, सेवा एवं अनन्य प्रेम की ज़रूरत है।
आपके हृदय में इन प्रवचनों को सुनकर एक त़ूफान उमड़ा कि अब तो जिस तरह से हो सके इस भक्ति रूपी गेंद को प्राप्त करना ही है। आपने शीघ्र ही स्वयं भी शरणागत होने के लिए विनय की। पिताजी को पहले ही आपने शुभ प्रेरणा देकर साधु बनवा दिया था। घर की सम्पत्ति-जायदाद-सुखैश्वर्य के सबी सामान आपके पिताजी आपको सौंपकर निश्चिन्त होकर भक्ति के मधुर अमृत का पान करने लगे। आपके हृदय में भी इस सारी सम्पत्ति को श्री दरबार की सेवा में लगाने की भारी उमंग थी। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी निजमुख से कईं बार यह वचन फरमाते थे कि आपने अपने पिताजी को साधु बनने के लिए इसी कारण ही ज़ोर दिया कि घर की सारी सम्पत्ति श्री गुरु-सेवा में सफल हो। आपने अपने दिल की भावना को पूरा किया तथा सम्पत्ति, धन धान्य सहित स्वयं को श्री चरणों में भेंट कर शरणागति के पथ को दृढ़ किया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने भी अनन्य शिष्य की प्राप्ति पर दिल में प्रसन्नता अनुभव की।

Sunday, June 5, 2016

04.06.2016

आपने अपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के अनुपम उपदेश को अति श्रद्धा से हृदय में धारण कर लिया था, अब इस भावना को और नवसाहस मिल गया। आप अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए तन-प्राण से जुट गए। आप टेरी से लौटे तो आपके हृदय में गुरु-भक्ति एवं प्रेम की लहरें तरंगित हो उठीं। आप उन लहरों में खो गए।
      उस समय आपकी आयु लगभग बीस-इक्कीस वर्ष की होगी जब आपने इंद्रियों पर संयम कर मन को परास्त करने के लिए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की श्री आज्ञा व मौज में पूर्ण रूप से ध्यान जोड़ दिया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री दूसरी पादशाही जी) उस समय टांक, कुलाची, डेरा इस्माइलखां, आदि नगरों को, सत्संग से कृतार्थ कर रहे थे। इधर आप भजनाभ्यास द्वारा आंतरिक मंज़िंलों को पार करने में लगे हुए थे। सन्त महापुरुष तो स्वयं आत्म प्रकाशक होते हैं, केवल जन साधारण के लिए उन नियमों को स्वयं अपनाते हैं, जो कार्य अन्य लोगों से करवाने हों। सन्त महापुरुषों के सिद्धान्त सर्वसाधारण के लिए पगडंड़ी बनते हैं। आप कई-कई घण्टे तक योगाभ्यास में मग्न रहते। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की मिलन की लगन तो हर समय आपको दीवाना बनाये रखती। जब भी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी लक्की मरवत् अथवा अन्य निकटवर्ती स्थानों पर कृपा करते तो आप कई कई दिनों तक श्री चरणों में सेवा के लिए उपस्थित रहते और श्री दर्शन के मधुर-मधुर अमृत का रसपान करते।
      आपके पूज्य पिता जी भक्ति भाव तथा कर्म धर्म के विचारों को तो पहले से ही रखते थे, अब आप उनको बहुधा गुरु-भक्ति के विषय में उपदेश करते। आपकी सत्प्रेरणा का प्रभाव शीघ्र पूज्य पिता जी पर पड़ा। आपने अपने पिता जी को भी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री दर्शन कराये और उन्हें भी सद्गुरु उपदेश से दीक्षित कराया।
      आपका अपना विचार यह था कि पिता जी शीघ्र ही चरणों में सर्वस्व समर्पण कर शरणागत हो जायें। जिस दिन आपने गुरु-दीक्षा ली, मन से तो उसी दिन से ही सब कुछ श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को सौंप दिया, परन्तु बाहरी रूप से अभी शरण प्राप्त नहीं की थी। आपके हृदय की यह प्रबल अभिलाषा थी कि पिता जी भी श्री दरबार में शरणागत हो जायें तो घर की सारी सम्पत्ति भी परमार्थ (श्री दरबार ) में लगा दी जाये। अतः आप अपने पिता जी से बहुधा कहा करते थे- ''पिता जी ! आप वृद्धावस्था में पदार्पण कर चुके हैं। अतएव अच्छा हो यदि आप सांसारिक जंजाल को त्याग कर जीव के अन्तिम दिनों में सन्यास धारण कर लें तथा भजन-भक्ति में मन लगावें।''

Saturday, June 4, 2016

03.06.2016

कुछ समय श्री सद्गुरुदेव महाराज जी लक्की मरवत् में अपने पवित्र सत्संग उपदेश-अमृत की धारा प्रवाहित करते रहे तथा इस समय में आप श्री चरणों में बैठ कर कर्म, भक्ति और ज्ञान की त्रिवेणी में मज्जन कर आत्मिक आनन्द प्राप्त करते रहे। इसके पश्चात जब श्री सद्गुरु देव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी टेरी लौटने लगे तो आप तथा महात्मा योगात्मानंद जी एवं भक्त साहिबराम जी भी उनके साथ श्री परमहंस दयाल जी श्री पहली पादशाही जी के श्री दर्शन के लिए मार्च सन् 1918 में टेरी गए। जब आपने श्री हुज़ूरी में उपस्थित होकर श्री चरणों में मस्तक झुकाया तो उन्होंने अपनी तत्व दृष्टि से आपकी उत्तम भक्ति को परखते हुए फ़रमाया- ''आप (श्री स्वामी जी श्री तीसरी पादशाही जी) को परमार्थ का बहुत बड़ा कार्य करना है।'' साथ में यह भी फ़रमाया कि जब परमार्थ की तरफ प्रवृत हुए हो तो संसार की ओर कतई ध्यान नहीं देना। यह बात गांठ बांध लो। तत्पश्चात आपका हाथ श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) के हाथों में स्वयं करकमलों से देकर फ़रमाया-'' आपको परमार्थ-लाभ इनसे ही प्राप्त होगा।'' पुनः फरमाया यह शेअर पढ़ो कि-
      ।। शेअर।।
चूँकि करदी ज़ाते-मुर्शिद रा कबूल ।
हम ख़ुदा दर ज़ातश आमद हम रसूल ।।
अर्थात् जब पूर्ण  सन्त सद्गुरु की शरण विशुद्ध मन से ग्रहण कर ली तो सद्गुरु के पावन स्वरूप में ही मानो परमात्मा की प्राप्ति हो गई। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी ने भी यही विचार अन्य रूप में प्रस्तुत किये हैं। -
दोहा
एक नाम को जान करि, दूजा देइ बहाय ।
तीरथ ब्रत जप तप नहीं, सतगुरु चरन सहाय ।।
सब आये उस एक में, डार पात फल फूल ।
अब कहो पाछे क्या रहा, गहि पकड़ा जब मूल ।।
अर्थात सद्गुरु का नाम वृक्ष की जड़ की न्याईं है। जब सद्गुरु की शरण मिल जाए और हृदय में नाम का प्रकाश हो जाए तो जप, तप तीर्थ सभी उसमें आ जाते हैं, फिर किसी भी अन्य कर्म करने की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती।


Friday, June 3, 2016

01.06.2016



अब आप अधिकतर समय श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की  सेव-संगति में व्यतीत करने लगे। सन् 1916 में आपने गुरु-दीक्षा की परम्परा को पूरा किया। आपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी से सुरत-शब्द-योग का उपदेश लिया तो आपके मन में नये प्रकार की शान्ति तथा आनन्द का अनुभव हुआ, जिस सच्चे आनन्द की प्राप्ति की खोज में आप थे। आप गुरु-दीक्षा से पहले कईं बार फरमाया करते थे कि 'सच्चा आनन्द, सच्ची खुशी' कुछ और है। जैसे मकरन्द का लोभी भ्रमर पुष्पों का रस पीते हुये तृप्त नहीं होता, इसी प्रकार आप श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की पावन संगति तथा भजनाभ्यास के अमृत-स्त्रोत से अमृत पीते हुए तृप्त न होते। हर समय एक निराली मस्ती में खोये हुए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री दर्शनों के इच्छुक रहते थे।
      इस समय आप युवावस्था में पदार्पण कर चुके थे। शरीर पर यौवन था, परन्तु मन में वासनाएं नहीं थी। शरीर सुन्दर, सुडौल, कान्तिमय था, किन्तु संसार के सुख-ऐश्वर्यों की ओर से मन उपराम था। सांसारिक गृहस्थ का विचार आपको आकर्षित न कर पाया। उभरते यौवन काल में जबकि जनसाधारण जगत के भोग-ऐश्वर्य के मतवाले होते हैं, आपको इस जगत से कोई सरोकार न था, हालांकि घर धन-धान्य सम्पन्न था और सब सुख-ऐश्वर्य आपके पीछे-पीछे फिरते थे। पूर्ण सन्त-महापुरुष श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के मिलन तथा शुभ संगति ने सोने पर सुहागे का काम किया। फलस्वरूप आपके चित्त में प्रेम-भक्ति-परमार्थ की भावनाएँ उमड़ पड़ीं। चकमक को रगड़ने पर, पारस को लोहे से छूने पर जो दशा होती है, वही दशा आपकी हो गई। जिस महान् एवं उच्चतम उद्देश्य की पूर्ति के लिए आप जगत में अवतरित हुए थे, उसी की सत्प्रेरणा आपके हृदय में होने लगी।

Wednesday, June 1, 2016

31.05.2016

श्री दूसरी पादशाही जी से भेंट
जन मानस में भर जाय, भक्ति का उजियारा ।
फँसे जीव न विकट माया में, उतरें भवजल पारा ।।
युग युगों तक बहे धरा पर, अमर सत्य की धारा ।
बन्धन मुक्त कराने को, प्रकटैं सर्गुण अवतारा ।।
इसलिए प्रकृति के अटल सिद्धान्तानुसार-
युगों युगों से चलता आता, गुरु शिष्य का नाता ।
कृपा करें अधिकारी शिष्य पर, पूर्ण सद्गुरु दाता ।।
सतगुरु स्वयं आत्म-प्रकाशी, पूर्ण तत्त्व ज्ञाता।
पूर्ण शिष्य निज रूप बनावें, गुण सम्पन्न सुजाता ।।
ये वही दिन थे जबकि श्री परमहंस दयाल जी श्री पहली पादशाही जी की आज्ञानुसार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी (साधू वेष में) लक्की मरवत् में सत्संग-प्रचार के लिए पधारे। भक्त साहिबराम जी ने आप (श्री सद्गुरुदेव जी महाराज श्री तीसरी पादशाही जी) को कहा कि आज रात को हमारे घर सत्संग होगा। आप भी प्रसन्नतापूर्वक रात्रि समय भक्त जी के घर पहुँचे।
महान आत्माओं का परस्पर पुराना सम्बन्ध हुआ करता है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी उस समय सत्संग कर रहे थे जबकि आप भक्त साहिबराम जी के घर गये। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने दिव्य दृष्टि से पारमार्थिक कार्य करने वाले शिष्य को पहचान लिया। आपने भी आन्तिक आनन्द के दाता पूर्ण सद्गुरु को प्राप्त कर लिया। यही वांछित संयोग नियति ने बना दिया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने पारमार्थिक कार्य करने वाले बहुमूल्य रत्न को पाकर हार्दिक स्नेह प्रदर्शित किया। इधर आपने भी अपने सच्चे सद्गुरु से मिलकर उनके श्री चरणों में अगाध प्रेम का सम्बन्ध जोड़ कर अपनी चिरकाल की आत्मा को तृप्त किया। पुरातन रीति के अनुसार आपने अनन्य शिष्य बनकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी से रूहानी धन (नाम-उपदेश)  प्राप्त किया। श्री अनाथदास जी ने गुरु-शिष्य के सम्बन्ध में लिखा है-
सूर दर्श आदर्श ज्यों, होत अगन अद्योत ।
तैसे गुरु प्रसाद से, अनुभव निर्मल होत ।।
जिस प्रकार आतिशी शीशे पर सूर्य की किरणें पड़ने से उसमें अग्नि उत्पन्न करने की शक्ति आ जाती है, इसी प्रकार ही गुरु की कृपा से शिष्य का अनुभव निर्मल हो जाता है। अर्थात गुरुदेव सूर्य हैं तो शिष्य आतिशी शीशा बनकर गुरुदेव से आत्मिक शक्ति रूपी धन पाकर शक्तिशाली बन जाता है। ऐसा केवल पूर्ण शिष्य अर्थात गुरुदेव जी की प्रसन्नता प्राप्त करने वाला शिष्य ही कर सकता है। इसी प्रकार आपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की सेवा में सर्वस्व समर्पण कर आत्मिक धन प्राप्त किया।