Tuesday, November 15, 2016

14.11.2016

श्री आनन्दपुर ट्रस्ट
श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने एक महत्त्वपूर्ण कार्य यह किया कि अपने शरणागतों की व भक्तों की श्रद्धा भक्ति पूर्वक भेंट की गई चल व अचल सम्पत्ति की रक्षा के लिए दिनांक 22 अप्रैल  सन् 19540 तदनुसार 10 वैशाख संवत् 2011 विक्रमी को "श्री आनन्दपुर ट्रस्ट' के नाम से एक संस्था की स्थापना की जिसमें शरणागतों, महात्माओं, भक्तों व सेवकों के पालन-पोषण, देख-रेख तथा सुरक्षा के सम्पूर्ण अधिकार एक ट्रस्टी-समिति को सौंप दिए गए। इस ट्रस्टी समिति अथवा बोर्ड आफ़ ट्रस्टीज़ के सदस्य कुछ महात्माजन तथा कुछ भक्तजन हैं जिनकी पूर्ण संख्या छत्तीस है।
इस ट्रस्ट के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं----
1. श्री परमहंस अद्वैत मत के सिद्धान्तों को निष्ठापूर्वक जन-जन तक पहुँचाना।
2. भक्ति-पथ पर चलनेवाले जिज्ञासुओं की आत्मिक उन्नति व मनःशान्ति के लिए भजनाभ्यास तथा सत्संग आदि के विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करना।
3. जनसाधारण को मानुष जन्म के लक्ष्य का बोध कराना तथा आध्यात्मिक लाभ पहुँचाना।
4. आश्रम की चल व अचल सम्पत्ति की सुरक्षा करना।
5. आश्रम के स्थायी निवासियों के शारीरिक निर्वाह हेतु (भोजन, वस्त्र, आवासगृह आदि का) उचित प्रबन्ध करना।
6. आश्रम में आनेवाले दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए आवासगृह एवं भोजन आदि का निःशुल्क प्रबन्ध करना।
7. आश्रमवासी व समीपवर्ती लोगों की सुविधा के लिए आधुनिक धर्मार्थ चिकित्सालय एवं पाठशाला स्थापन करना।
8. स्वाध्याय के लिए धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन करना।
इन सब उद्देश्यों की पूर्ति श्री आनन्दपुर ट्रस्ट द्वारा अत्यन्त सुचारु रूप से की जा रही है।


आनन्द भवन शिमला
आपकी मौज कई मौजों का भण्डार थी। आपने क्या-क्या किया और क्या करना चाहते थे, इसका अनुमान लगाना कठिन है। एकान्त व शान्त वातावरण आपको अत्यधिक प्रिय था। श्री आनन्दपुर का कण-कण आपके चरण स्पर्श करने के लिए लालायित था कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी  अपनी कृपादृष्टि से हमारे भी भाग्य जगायें। अत: सन् 19550 में आबादी के उत्तर-पूर्वी भाग में एक ऊँची पहाड़ी ने श्री चरणों में सौभाग्यवती बनने की विनय की। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कुछ महात्मा व भक्तजनों सहित यहां पधारे। पहाड़ी को ऊपरी सिरे से कटवाना आरम्भ करवाया। यहां पर कुछ महात्माजन, भक्तजन व प्रेमी जिज्ञासु इस सेवा में सम्मिलित होते और रात्रि को कुछ एक को छोड़कर वापस घर लौट आते।
इसी समय में जबकि आनन्द भवन शिमला को आबाद किया जा रहा था, एकबार श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी वहां महुआ के पेड़ के नीचे पलंग पर विराजमान थे। दो चार सेवक समीप की फुलवाड़ी में सेवा कर रहे थे। दो निजी सेवक श्री चरणों में बैठकर पुस्तक सुना रहे थे। नीचेवाली मंज़िल जहां सेवा का कार्य हो रहा था, पहाड़ी को एक सिरे से काटकर बुनियाद खोदी जा रही थी। एक ओर तो ऊँची पहाड़ी थी और दूसरी तरफ़ एक खड्ड था। खुदाई होते हुए पहाड़ी में दरार पड़ गई और एकदम ही पहाड़ी का एक भाग नीचे आ गया। धमाके की आवाज़ होते ही श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने एकदम नंगे पांव ही वहां शीघ्रता से कृपा की। उनके पीछे-पीछे सेवक भी भागते चले आए। खुदाई की सेवा करनेवाली संगत आश्चर्यचकित एक ओर खड़ी थी। श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने पूछा----कोई नीचे तो नहीं आ गया? जाँच-पड़ताल करने पर मालूम हुआ कि एक भक्त कम है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के संकेत से मिट्टी हटाई गई और उसे बाहर निकाला गया। मिट्टी हटाने पर देखा गया कि वह भक्त बेहोश था। पहाड़ी का इतना भाग नीचे गिरने पर भी उसे कोई चोट नहीं आई थी। कुछ समय के पश्चात् वह भक्त होश में आया। उस भक्त से पूछने पर उसने बताया कि जब पहाड़ी मेरे ऊपर गिरी तो श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी भागते हुए आए और उन्होंने मुझे अपनी गोद में ले लिया। उसके बाद मुझे कुछ पता न चला। बाद में होश में आने पर उसने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री चरणों में दण्डवत्-प्रणाम कर विनय की कि आपको मेरे लिए बहुत कष्ट उठाना पड़ा। सब संगत प्रसन्नता में जयकारे बोलने लगी। सब संगत ने उस समय कहा कि ""धन्य हैं श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी! जो सदा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।''
इसी पहाड़ी के एक ओर से चढ़ने के लिए ढलान का मार्ग और दूसरी ओर से सीढ़ियां बनवार्इं। इस प्रकार से यह एक रमणीक स्थान बन गया।

Monday, November 14, 2016

09.11.2016

श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने इस साधु श्रेणी में से कुछ को सत्संग-प्रचार के लिए भेज दिया ताकि ये नाम की अमर ज्योति शीघ्रातिशीघ्र भारत के कोने- कोने में फैलाएँ। प्रत्येक ग्राम तथा नगर में सत्संग आश्रम निर्माण करने का आदेश दिया और विशेषकर यह प्रवचन उसी दिन ही फ़रमाए----
""जब तक मनुष्य अपना जीवन उन नियमों के सांचे में नहीं ढाल लेता, जिन नियमों पर वह दूसरों को चलाना चाहता है, तब तक उसका प्रभाव पूर्ण रूप से दूसरों पर नहीं पड़ता। अपना आचरण ही दूसरों पर प्रभाव डालने के लिए उपदेश की अपेक्षा अत्यधिक प्रभावशाली होता है। अपने आचरण में कमी ही केवल वाचक ज्ञान बनकर रह जाती है, जिसका प्रभाव श्रोताओं पर पूर्णरूप से नहीं हो सकता। गुरुवाणी में भी कहा है----
अवर उपदेसै आपि न करै ।। आवत जावत जनमै मरै ।।
दूसरों को उपदेश देना या केवल दिखावा-मात्र काम करना, यह विचार केवल मान-बड़ाई और इज़्ज़त के लिए ही होता है कि लोग हमारी पूजा करें। जिन्होंने अमली तौर पर कुर्बानी की होती है, उनका प्रभाव लोगों पर स्वयं ही पड़ता है। इसीलिए पहले स्वयं आचरण करो, पुन: दूसरों को उपदेश दो तो उसका प्रभाव सबपर अधिक पड़ेगा, वरना आप आचरण न करने से दूसरों का कल्याण करने की अपेक्षा स्वयं ही आवागमन के चक्र में फंस जायेगा।
सेवक बनकर सद्गुरु की ओर से परमार्थ का सन्देश लोगों तक पहुँचाओ। उनकी तरफ़ से जो सेवा-भेंट हो उसे सद्गुरु की भेंट समझो। वह सब सेवा सद्गुरु के चरणों में भेंट करने की होती है ताकि अपनी ममता या अहंता किसी वस्तु में न हो। औरों को उपदेश देने का यह अभिमान नहीं करना कि मैं विद्वान् हूँ, मैं गुणवान् हूँ, मैं चतुर हूँ और मेरे ही उपदेश से मेरी मान्यता होती है। यह सरासर ग़लती और कमज़ोरी है।
जिसके ज़िम्मे सद्गुरु की ओर से जो सेवा लगी हो यदि वह स्वयं उसका मालिक बन बैठे तो उसकी यह हालत होती है कि----
।। दोहा ।।
सिष साखा बहुते किये, सतगुरु किया न मीत ।।
चाले थे सतलोक को, बीचहि अटका चीत ।।
                                     परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
तुम साधु हो। तुम लोगों में यह कमज़ोरी नहीं होनी चाहिये। यहां पर भी जिस महात्मा या भक्त को सत्संग-प्रचार की आज्ञा दी जावे, उसे दृढ़ता से समझ लेना चाहिये कि यह सेवा सद्गुरु की ओर से उसे सौंपी गई है। यदि सत्संग करनेवाला यह चाहे कि मेरी मान्यता हो, लोग मेरी प्रशंसा करें तो वह गिरावट की ओर जायेगा। स्वयं आचरण करता चला जाये, उसका प्रभाव स्वयं लोगों पर पड़ेगा।
श्री आनन्दपुर में भी जो महात्माजन सत्संग करते हैं, वे इसे अपनी सेवा ही समझें। इसी तरह हर सत्संगी चाहे वह श्री आनन्दपुर में है या बाहर सत्संग करता है, वह अपने आपको सेवक ही समझे। श्रोतागणों को चाहिये कि वे यह समझें कि हमें महापुरुषों के वचन सुनाये जा रहे हैं जिनपर हमने आचरण करना है।
ऐसा करने पर दोनों श्रोता और वक्ता श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की कृपा के पात्र बनकर अपने जीवन को सफल करेंगे।''
इस प्रकार से साधु मण्डली श्री अमृत प्रवचनों का रसपान कर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के अमर सन्देश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सेवा में जुट गई। स्थान-स्थान पर जाकर आश्रम स्थापित किये। भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तक व पूर्व से पश्चिम तक इस अमृत को उड़ेला, यहां तक कि विदेश में भी इस कलिमलहारिणी त्रि-ताप विनाशिनी भक्ति का सन्देश पहुँचाया।

Wednesday, November 9, 2016

09.11.2016

जब-जब भी आप कुछ दिनों के लिए जनकल्याण हेतु बाहर जाते तो  श्री आनन्दपुर के प्रेमी, शरणागत उन दिनों आपके वचनानुसार सेवा में तथा आपकी याद में एक-एक क्षण चकोर की न्यार्इं बाट जोहने में लगाते। जब आप (श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी) की कार सुरीले मनहरण हार्न करती हुई वापस आती तो श्री आनन्दपुर की धरती का कण-कण और प्रेमियों के ह्मदय शरद्-पूर्णिमा के विधु को पाकर कैरव कुसुम की तरह खिल उठते। कार के हार्न ज़मीन व आसमान को बाँसुरी की धुन की न्यार्इं गुँजा देते। प्रेम दीवाने उस प्रेम की मधुरिमा को पाकर पुन: मस्ती में झूम उठते। श्री आनन्दपुर तो मानो यह चाहता कि मेरा एक-एक कण श्री चरण-कमलों से पवित्र हो ताकि मैं भी अपने सौभाग्य पर इठलाऊँ।
श्री आनन्दपुर में शरणागतों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। जितनी शरणागतों की संख्या बढ़ती उतना ही श्री सद्गुरुदेव महाराज जी अत्यन्त प्रसन्न होते, क्योंकि उनकी जन्मों से बिछुड़ी हुई रूहें अपने धाम में पहुँच रही थीं, जिनके लिए वे सब रचनाएँ रच रहे थे। वे उच्च संस्कारी तथा आतुर प्रेमियों को अर्थात् रूहों को जो आपके श्रीचरणों में शरणागत होना चाहती थीं या भक्ति की अभिलाषी थीं, उन्हें निज स्थान पर पहुँचा हुआ देख तथा अपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री वचनों को पूरा होता देखकर प्रसन्न हो रहे थे। अत्यधिक प्रसन्नता आपको इसलिए हुई कि आप जिस कार्य को पूरा करना चाहते थे, वह सम्पूर्ण हो रहा था।
इस प्रकार श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने यथासम्भव साधनों से सर्वसाधारण को भी प्रेम-भक्ति का अमृत पिलाया। जिन जीवों के ह्मदय में गुरु-भक्ति की लगन जागरूक हो चुकी थी तथा जो श्री दरबार में शरणागति लेना चाहते थे, उनकी अटूट निष्ठा को देखकर उन्हें चरण-शरण प्रदान की तथा जो संस्कारी आत्माएँ आपकी विमल भक्ति में लगन बढ़ाती हुई संसार में रह रही थीं, आप उनके अन्तर्मानस की जानते हुए उन्हें उसी अनुरूप  श्री प्रवचनामृत पान कराकर उनकी भक्ति बना रहे थे।
भक्त धर्मभानु जी जोकि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के अनन्य प्रेमी व उच्च संस्कारी आत्मा थे, उनका कथन है कि मैं दिल्ली में रहता था तथा सभा- समाजों में व्याख्यान दिया करता था। ग्रीष्मावकाश होने पर मैं प्राय: श्री दर्शन के लिए श्री आनन्दपुर आ जाया करता था। गर्मियों की छुट्टियां श्री दरबार की सेवा में ही व्यतीत होती थीं।
जब मैं यहां पहुँचा और श्री दर्शन की आज्ञा पाकर अन्दर श्री चरणों में उपस्थित हुआ----तब श्री भगवान अकेले अपनी पवित्र मौज में पलंग पर विराजमान थे। श्रद्धापूर्वक साष्टांग दण्डवत्-प्रणाम किया और ज्योंही आज्ञा पाकर मैंने श्री पदारविन्दों में सिर रखकर आँखें उठार्इं तो सहसा श्री सद्गुरुदेव जी ने फ़रमाया---""सत्संग होता है?'' मैं असमञ्जस में पड़ गया कि क्या उत्तर                दूँ। महाप्रभु जानते थे कि मैं सभा-समाजों में बहुत व्याख्यान दिया करता                       हूँ, इसी विचार से ही श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने पूछ लिया कि ""सत्संग होता  है।''
मैं तो यह प्रश्न सुनकर स्तब्ध सा हो गया। मुख से मेरे कोई उत्तर न निकल सका। इसपर श्री प्रवचन हुए कि ""सत्संग नहीं होता, क्योंकि किसी पुस्तक का पाठ कर देने को "सत्संग' नहीं कहते। पुस्तकों तथा ग्रन्थों की वाणी पढ़कर सुनाना, उसके अर्थ करना, परन्तु उसपर आचरण न करना---इसे "सत्संग' नहीं कहते। तब महाप्रभु ने बड़ी ही गम्भीर मुद्रा धारण की और अत्यन्त शान्तिपूर्वक समझाने लगे कि सत्संगउसद्वस्तु का संग कराना। सत् से मिलाप हो जाना। सत् से मेल कौन कराता है? इन विविध पुस्तकों की पंक्तियों का पाठ करके इनपर चिन्तन करो, तब पता चलता है कि ये धर्मग्रन्थ भी यही कहते हैं कि सत्-वस्तु से संग करना चाहिये। सत् का ज्ञान महापुरुषों से होता है। अत: सन्त महापुरुषों से मिलाप कर सत्-असत् का ज्ञान कराना ही सत्संग होता है। अत: अब सत्संग भी किया करो।''
इन श्री प्रवचनों में कितना रहस्य छिपा है कि एक तो महापुरुष जीव को असत् से सत् देश की ओर ले जाते हैं, दूसरा आपने यह स्पष्ट करा दिया कि भक्त धर्मभानु जी केवल महाभारत, रामायण का पाठ ही सभा-समाजों में न किया करें, अपितु इनका वास्तविक अर्थ समझाया करें जिससे अन्य जीव भी इन ग्रन्थों के रहस्य को समझकर सन्त महापुरुषों की संगति प्राप्त करें तथा अपने मानव जीवन का पूर्णतया लाभ उठा सकें।
इस प्रकार से आपने शरणागतों तथा अन्य प्रेमी जिज्ञासुओं को अपने अपने ढंग से ही लाभ पहुँचाया।
शरणागत प्रेमी गुरुमुखों में से कुछ शरणागत साधु-वेष ग्रहण करने के लिए बार-बार विनय करते। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कुछ अधिकारी गुरुमुखों को साधु-वेष प्रदान करते। जब ये साधु-वेष लेकर श्री चरणों में पुष्प-पत्रादि भेंट करने के लिए आते तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी अत्यन्त हर्षित हो प्रसाद बंटवाते, उनकी खुशी का ठिकाना न रहता।

Friday, November 4, 2016

04.11.2016

उसी दिन सायं समय आपने जयपुर में कृपा की। महात्मा परम विवेकानन्द जी ने स्वागत के रूप में काफ़ी तैयारियां की हुई थीं। श्री सद्गुरुदेव महाराज   जी ने सेठ जी की कोठी में कृपा की। दिन-रात सत्संग की पावन धारा बहाने लगे। उसी दिन रात्रि समय भक्त लोग उस सेठ को भी श्री दर्शन के लिए बुला कर ले आये। आपके सम्मुख आते ही उसने अपनी तन-बदन की सुधि खो दी। श्री दर्शन ने उसे ऐसा मतवाला बना दिया कि वह श्री छवि को देखते ही समस्त वृत्तियों को खो बैठा। आप उस समय प्रवचन फ़रमा रहे थे----""इन्सान माया का परवाना बना हुआ है। यदि कभी इस माया को पीठ दे तो पता चले कि यह छाया की भाँति उसके पीछे कैसे दौड़ती है। इन मायावी सामानों में जीव ने सुरति इस क़दर फँसा दी है कि इसे इसके परिणाम का पता ही नहीं कि क्या होगा? धन में सुरति लगाने से अन्त में सर्प की योनि मिलती है। मकान में सुरति फँसाने से भूत-प्रेत की योनि प्राप्त होगी। यदि सुरति पुत्र में अटकी रह जायेगी तो सूअर का जन्म मिलेगा। इसी प्रकार अन्यान्य योनियों का जीव शिकार बनकर चौरासी का चक्र ख़रीद लेता है। यदि यही सुरति सन्त महापुरुषों के दिये हुए सच्चे नाम से जोड़ी जाये तो अन्तिम समय यह सुरति प्रभु के धाम में पहुँचा देगी जहां पहुँच कर आवागमन के चक्र से छुटकारा मिल जाता है। परन्तु जीव के लिए स्वयं ऐसा काम करना कठिन है। सन्त महापुरुषों की संगति से ही जीव को ऐसा ज्ञान मिलता है। सन्त महापुरुष जीव को वचनामृत द्वारा सदा सावधान करते हैं।
वैसे तो जिस धरती पर सन्त महापुरुष स्वयं कृपा करते हैं उस धरती का वातावरण निर्मल बन जाता है। उनके पावन वचनामृत श्रवण करने से मन की चंचल वृत्तियां शिथिल हो जाती हैं। मन स्वयं भक्ति मार्ग को अपना लेता है। सन्त महापुरुषों की संगति ही जीव के विचारों में परिवर्तन ला सकती है। अत: सन्त महापुरुषों का समागम अत्यावश्यक है। मनुष्य सन्त महापुरुषों की संगति प्राप्त कर अपना कल्याण करे।''
ये वचन सेठ जी के मन पर बाण की तरह लगे। उसने सोचा कि शायद यह महापुरुष मेरे लिए ही वचन फ़रमा रहे हैं। सन्त महापुरुष तो स्वाभाविक ही ऐसे वचन फ़रमाते हैं जो जीव के संकल्प-विकल्पों को मिटा दें। सत्संग समाप्त हुआ। सब संगत अपने-अपने घर लौट गई, किन्तु सेठ जी वहीं बैठे रहे। सेठ जी के जन्म-जन्मान्तरों के कलुष जैसे एक पल में ही धुल गये। उसे अपने दिलरूपी दर्पण में जैसे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी दिखाई देने लगे।
संगत के जाने के बाद उसने आपके सुकोमल चरणों में वन्दना कर अपने अपराधों की क्षमा मांगी तथा विनय की कि मैंने यहां के भक्तों से कहा था कि अभी मैंने अपनी कोठी का उद्घाटन नहीं करवाया। बिना उद्घाटन के कोठी तुम्हें कैसे दे दूँ। अब मैं अपना विचार प्रकट करता हूँ कि जिन महापुरुषों की वाणियों का पाठ करवाकर मैंने मुहूत्र्त करवाना था, वे महापुरुष (आप) साक्षात् हमारे घर में पधारे हैं अथवा जिन देवताओं का पूजन करना था उन देवताओं के देव ने आज स्वयं यहां कृपा फ़रमाई है। मेरे जैसा भाग्यशाली कौन होगा? आपके श्री दर्शन के लिए हज़ारों मीलों से प्रेमी आते हैं, उनको भी एकान्त में इतना समय आपके श्री दर्शन करने का शायद ही नसीब होता होगा जितना मुझे मिल रहा है। आपके श्री दर्शन तथा अमृत-वचनों ने मेरा कठोर ह्मदय मोम की तरह नर्म कर दिया है। मैं किस मुख से आपकी महिमा का वर्णन करूँ। आप साक्षात् भगवान हैं। हम जैसे जीवों को आप दिव्य दृष्टि देकर सत् और असत् की परख कराने आए हैं। मैं अपने मन की अवस्था को बदला हुआ देखकर स्वयं हैरान हूँ कि मेरे विचारों में धरती और आकाश का सा अन्तर इतनी शीघ्रता से कैसे आ गया ? आप दयालु हैं; आप अपनी कृपा-दृष्टि से जीव को भक्ति रूपी धन से मालामाल कर सकते हैं। जैसे गुरुवाणी का वचन है----
साचे   साहिबा   किआ   नाही   घरि   तेरै ।।
घरि त तेरै सभु किछु है जिसु देहि सु पावहि ।।
यह बात आज प्रत्यक्ष मैंने देख ली। मेरी जिह्वा में यह शक्ति नहीं कि आपकी महिमा का गायन कर सकूँ। धन्य हैं गुरुदेव। उसने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी से नाम-दीक्षा ली और कृतकृत्य हो गया।
अब उसने अपने सम्बन्धियों से भी यह कह दिया कि मेरी कोठी का उद्घाटन बड़ी धूमधाम से हुआ है। उसने फिर उस कोठी का उद्घाटन कभी न करवाया। इतना प्रताप है एक पल की श्रेष्ठ संगति का। यदि जीव निरन्तर सन्त महापुरुषों की संगति करता रहे तो कितना लाभ होगा, इसका अनुमान कहां लगाया जा सकता है? जब आप नित्यप्रति पावन सत्संग की गंगा में सर्वसाधारण को मज्जन करवाकर चार-पांच दिन के पश्चात् श्री आनन्दपुर लौटने लगे तो सेठ जी ने एक-दो दिन और रहने का आग्रह किया। यह विनय भी की----दीनदयाल! हम जीवों के अवगुणों को न निहारते हुए इस भवन को अपना ही समझकर यहां पधारने की कृपा करते रहियेगा। यह मेरी हार्दिक अभिलाषा है। आप उस स्थान को कृतार्थ कर और आशिष से उसके दामन को भरकर श्री आनन्दपुर में पधारे।

Wednesday, November 2, 2016

02.11.2016

इसमें श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी, श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री चौथी पादशाही जी एवं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी के समय-समय पर होने वाले श्री अमृत प्रवचन तथा अन्य महात्माओं के भक्ति-ज्ञान-वैराग्य से युक्त विचारों को एकत्रित कर कथा, लेख, भजन, श्री अमर वाणी आदि विभिन्न रूपों में प्रकट किया जाता है, जिसे पढ़ कर प्रेमियों को असीम लाभ हुआ और हो रहा है। इसे ज्योति-स्तम्भ कहा जाए तो अनुपयुक्त न होगा। यह पूर्ण सन्त महापुरुषों के मिलाप का एक साधन है। साधक के लिए पथ-प्रदर्शक है। इसी से जीवन के आनन्द रूपी संदेश को प्राप्त कर सर्वसाधारण भी लाभान्वित हो रहे हैं।
श्री आनन्दपुर दरबार की संगतें व अन्य जीवों को भारत में तथा विदेशों में जहां-जहां भी भक्ति के जिज्ञासु थे और हैं, सबको यह आनन्दमय सन्देश पहुँचाता रहा और पहुँचा रहा है। इसने जीवन में नया रंग, नई उमंग, नया साहस, भक्ति की प्रतिभाशाली तरंग तरंगित करने का कार्य पूर्ण रूप से निभाया और निभा रहा है। इस मासिक पत्र "आनन्द सन्देश' के प्रकाशन के लिए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने श्री आनन्दपुर सत्संग आश्रम में "आनन्द पिं्रटिंग प्रेस' स्थापित करवा दिया। आनन्द सन्देश के साथ-साथ यहाँ धार्मिक पुस्तकें जैसे भक्ति सागर, भक्ति दीपक, सार-उपदेश, आनन्द रामायण तथा अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित की गर्इं।
इसके पश्चात् श्री श्री 108 श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी ने आत्मिक सम्पदा का एक विशेष अमूल्य उपहार "श्री परमहंस अद्वैत मत' (अमर ज्योति) ग्रन्थ---प्रेमी, गुरुमुखों एवं भक्ति की अभिलाषी आत्माओं को प्रदान किया, जिसमें श्री आनन्दपुर के उन्नायक श्री परमहंस महान् विभूतियों का जीवन-चरित लिखा हुआ है। इसे पढ़ने से ह्मदय दिव्य आलोक से आलोकित हो उठता है तथा परम सुख एवं आनन्द की अनुभूति होती है। इसका प्रथम संस्करण अप्रैल सन् 1972 में प्रकाशित हुआ। परमार्थ, भक्ति एवं आत्मोन्नति के उच्च सिद्धान्तों को सम्मुख रखकर प्रेमियों की मांग को पूरा करने के लिए आप समयानुसार धार्मिक पुस्तकों का निरन्तर प्रकाशन करवा रहे हैं।
मई सन् 1973 में विदेश में निवास करने वाले गुरुमुखों की मांग को पूर्ण करने के लिए ‘‘‘च्र्ण्ड्ढ च्द्रत्द्धत्द्यद्वठ्ठथ् एथ्त्द्मद्म’  के नाम से अंग्रेज़ी भाषा में मासिक पत्रिका का प्रकाशन करवाया जिससे भारत तथा विदेश में रहने वाले गुरुमुखों को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो रहा है। इसके साथ-साथ अन्य इंग्लिश पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ है। अब इस आनन्द पिं्रटिंग प्रेस में श्री आनन्दपुर दरबार की ओर से हिन्दी, सिन्धी तथा अंग्रेज़ी भाषा में धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन होता है, जिनको पढ़कर जनसाधारण भी लाभ उठा रहे हैं।
इसी प्रकार आप श्री आनन्दपुर के कार्य की देखरेख करते हुए अन्य स्थानों पर जनकल्याण हेतु जाते थे। एक बार 1953 में आप राजस्थान की ओर पधारे। छबड़ा गुगर, कोटा से होते हुए अजमेर पहुँचे। वहां जयपुर की संगत ने विनय की कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी जयपुर को भी पवित्र करने की कृपा करें। उन लोगों की नम्रता, श्रद्धा व प्रेम को देखकर कृपालु भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। आपने दो दिन पश्चात् जयपुर पधारने का उन्हें वचन दिया।
अब जयपुर की संगत व महात्मा परम विवेकानन्द जी परस्पर सलाह करने लगे कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के ठहरने के लिए एक ऐसा विशाल भवन होना चाहिये जहां जयपुर की संगत आकर श्री दर्शन का लाभ उठा सके। उन्होंने अत्यधिक खोज की। ढूँढ़ने पर पता चला कि एक सेठ ने एक नई कोठी बनवाई है, परन्तु वह सेठ श्रद्धालु न था। जयपुर के एक भक्त सत्संगी की उससे जान-पहचान थी। उसने सेठ जी के साथ चर्चा की कि हमारे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी दो-तीन दिन के लिए जयपुर पधार रहे हैं। अगर आप अपनी नई कोठी उनके ठहरने के लिए दे देवें तो बहुत अच्छा होगा। सेठ जी ने कहा कि अभी तो मैंने उसका उद्घाटन ही नहीं करवाया। भक्तों ने कहा कि तीन-चार दिन बाद करवा लेना। उनके आग्रह पर सेठ जी ने कोठी भक्त जनों को सौंप दी।

Sunday, October 30, 2016

30.10.2016

सन् 1953--1954--1955 के वर्ष में तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की मौजों ने श्री आनन्दपुर में अनूठा ही रंग भर दिया, जैसे यह समय श्री आनन्दपुर को पावन तीर्थधाम बनाने तथा श्री आनन्दपुर दरबार के कण-कण का साज सँवारने व जन-जन तक इस पुष्प की सुगन्धि फैलाने की लहरें साथ लाया हो। अमर सत्यता की प्रतीक अनूठी एवं अनुपम रचनाओं का उद्घाटन श्री आनन्दपुर में हुआ। प्रत्येक रचना एवं मौज में एक दिव्य जागृति तथा ज्योति आलोकित हो उठी।

आनन्द सन्देश
सर्वांगीण दिव्य ज्योति से अनुप्राणित होकर श्री आनन्दपुर दरबार से प्रेम, भक्ति तथा आत्मज्ञान की जो किरणें फूटीं, वे प्रेमियों गुरुमुखों के ह्मदय में जगमगा उठीं। इस दिव्य ज्योति का प्रकाश घट-घट में पहुँचाने के लिए प्रेमियों, गुरुमुखों तथा सत्संगियों ने श्री चरणों में विनय की कि प्रभो! जो-जो भी श्री सद्-प्रवचन आप जनकल्याण हेतु पर्व पर या समय-समय पर श्री मुख से फ़रमाते हैं, वे अमर वचन ऐसी दिव्य ज्योति हैं जो दिल को छूकर मन के सभी शत्रुओं को दूर भगाकर ह्मदय को शुद्ध कर देते हैं। इस ज्योति को घट-घट में जगाने के लिए ऐसा उपाय किया जाये जिससे कोई भी प्राणी इस अमृत-रस के पीने से वंचित न रह जाये। प्रेमियों और जिज्ञासुओं की प्यास तो इससे कहीं अधिक बढ़ी हुई है। वे त्योहार पर कई संसारी झंझटों से श्री दर्शन पर नहीं आ सकते तो श्री अमृत-प्रवचन सुनने के लिए लालायित रहते हैं। कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां छ: मास अथवा एक वर्ष से पहले सत्संग उपदेश के लिए किसी प्रचारक महात्मा का जाना नहीं हो सकता। ऐसा कोई साधन हो जिससे घर बैठे उन्हें श्री अमृत वचन तथा अन्य भक्ति के मुक्ताकण मिल सकें।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इस बढ़ती हुई मांग को स्वीकार किया। प्रेम, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य तथा त्याग के आचरण रूपी जीवन का निर्माण करने हेतु इन्हीं भावनाओं तथा विचारों से युक्त एक मासिक-पत्रिका के प्रकाशन का प्रबन्ध करवाया, जिसके पढ़ने तथा श्रवण करने से ह्मदय में ज्ञान का प्रकाश होने लगता है। यह प्रकाश या रोशनी श्री दर्शन करने व श्री अमृत तुल्य वचनों को सुनने के लिए उत्साह भर देती है। जब सन्त महापुरुषों की संगति मिल जाती है तो काम-क्रोध-अहंकारादिक शत्रु इस रोशनी को पाकर स्वयं भाग जाते हैं।
इस मासिक-पत्रिका का शुभ नाम श्री मुख से "आनन्द सन्देश' फ़रमाया। 1 फ़रवरी 1953 को इस मासिक-पत्रिका के निकालने की आज्ञा प्रदान की। 13 अप्रैल 1953 वैशाखी के शुभ पर्व पर मासिक-पत्रिका "आनन्द सन्देश' प्रकाशित होने की खुशख़बरी सर्व संगत को सुनाई गई। सब संगत ने इस हर्ष में जयकारों से हाल को गुँजा दिया। आनन्द-सन्देश को उर्दू, हिन्दी व सिन्धी तीन भाषाओं में छपवाने का प्रबन्ध किया गया। इसका प्रथम संस्करण मई 1953 में छपकर तैयार हो गया और जन-जन को आत्म-ज्ञान की गंगा में स्नान कराने के लिए वह घर-घर पहुँच गया। नाम अनुरूप गुणों को लेकर वर्तमान समय तक यह उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होकर सर्वसाधारण को कृतार्थ कर रहा है।

Monday, October 24, 2016

24.10.2016

श्री आनन्दपुर का कार्य विस्तृत होने के कारण आप "नया गांव' कोअधिक उन्नति न दे सके। इसीलिए आप द्वारा बनाई हुई रूपरेखा को श्री श्री 108      श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री चौथी पादशाही जी ने पूरा करने का प्रयत्न किया और आज भी महान् विभूति के रूप में श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी इस कार्य की पूर्ति कर रहे हैं।
पहले कहा जा चुका है कि समय-समय पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पादशाही जी) श्री सन्त नगर, नया गांव, रोशनपुर तथा अन्य स्थानों को कृतार्थ करते थे, परन्तु मुख्य केन्द्र श्री आनन्दपुर ही था। जब प्रत्येक स्थान पर कुछ दिन के लिए सत्संग-नाम-उपदेश की पावन धारा बहाने जाते तो पुन: श्री आनन्दपुर ही लौट आते। श्री सन्तनगर अथवा नया गांव या अन्य किसी स्थान को पवित्र करने के लिए जाना होता तो विशेष पर्व श्री आनन्दपुर में ही मनाने के पश्चात् जाते। केवल दशहरा पर्व ही नया गांव में मनाया जाता। यहां श्री सन्त नगर अथवा नया गांव की लीला व श्री प्रवचनों को उस स्थान के आदि से अन्त तक एक ही बार दिया गया है, क्योंकि प्रत्येक वर्ष में दो बार सन्त नगर और दो बार नया गांव (उरुली कांचन) में विराजमान होते। बार-बार लिखने के स्थान पर एक ही बार पूर्ण विवरण दिया गया है।
एक बार श्री वचन हुए कि ""आप सब गुरुमुखों का नाता हमारे साथ जन्म-जन्मान्तरों से चला आता है। आप सभी गुरुमुख त्रेता में भी थे और द्वापर में भी। तभी तो उस पुरानी शक्ति को लेकर आप गुरु-सेवा के मग पर दृढ़ पग से चल रहे हो।'' दो-चार नये जिज्ञासु भी मध्य में बैठे थे। उनके दिल में विचार आया कि काम तो सेवक स्वयं करते हैं तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कैसे शक्ति प्रदान करते हैं। मन में विचार उठा ही था कि श्री अन्तर्यामी भगवान ने सब सेवकों को (उनके सहित) जिस स्थान का पहले वर्णन हो चुका है कि उरुली कांचन जहां अपना आश्रम स्थापित किया था वहां से दस मील की दूरी पर "येवत' नामक स्थान ख़रीदा था; यह स्थान एक पहाड़ी के आकार का था, अपनी मौज से इस पहाड़ी के पत्थर जहां तहां से उठाकर अपनी ज़मीन के चारों ओर चारदीवारी बनाने का आदेश देकर भेज दिया। ये सब सेवक सुबह बस  पर सवार होकर वहां जाते। दिन भर सेवा करते और रात्रि को बस पर पुन: उरुली कांचन आ जाते। यह उनका नित्यप्रति का नियम था।
इन सेवकों ने "येवत' पहुँचकर जब सेवा का कार्य आरम्भ किया तो पूरे दिन में 2-3 पत्थर ही दीवार तक लगा पाए। ये पत्थर इतने भारी और लम्बे- चौड़े थे कि हिलने का नाम ही न लेते थे। गुरुमुखों को ऐसा काम करने का अभ्यास भी न था, परन्तु वे हिम्मत न हारते हुए श्री आज्ञानुसार सेवा में जुटे रहे।  दूसरे दिन में गुरुमुखों ने 4-5 पत्थर जोड़े। इस प्रकार आठ-दस दिन के पश्चात् वे दिनभर में 10-12 पत्थर दीवार में जोड़ने लगे।
एक दिन सायंकाल के समय श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कार में विराजमान होकर येवत पधारे और एक पत्थर पर विराजमान हो गए तथा श्री वचन     किये---""क्या बात है? काम बहुत ढीला है। क्या कारण है कि अभी तक बस ज़रा-सा काम हुआ है।'' सेवकों ने विनय की---""प्रभो! पत्थर बहुत भारी हैं। बड़ी कठिनाई से दिन भर में 10-12 पत्थर ही जोड़े जाते हैं।'' श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया----""वाह! ये पत्थर तो बेचारे कई जन्मों से आस लगाए प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब गुरुमुखों के हाथ लगें और हमारा कल्याण हो। ये तो आप ही आप जाते हैं। केवल संकेत करने की आवश्यकता है।'' जब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इतने वचन फ़रमाए तो पड़े हुए वज़नदार पत्थर गुरुमुखों के हाथ लगते ही तेज़ी से दीवार की ओर बढ़ने लगे। उन जिज्ञासुओं ने यह अद्भुत लीला देखी कि जिन पत्थरों को सभी प्रेमी मिलकर बड़ी कठिनाई से हिला पाते थे, वही पत्थर दो चार प्रेमी मिलकर आसानी से ले जाने लगे। फलस्वरूप दो घण्टे में 70 पत्थर दीवार में जोड़ दिए गये, फिर भी थकावट का नाम न था। वे जिज्ञासु इस अलौकिक शक्ति को देखकर उस दिन से और भी अधिक श्रद्धा व विश्वास से सेवा करने लगे। उन्होंने कुछ गुरुमुखों से भी अपने मन की शंका का वर्णन किया तथा बताया कि शायद श्री सद्गुरुदेव जी ने हमारे लिए ही यह लीला रची होगी। वास्तव में वे पत्थर यही बाट जोह रहे थे कि कब प्रभु आएं और उन्हें श्री दर्शन देकर हिलने की सामथ्र्य प्रदान करें।
यह था उनके वचनों और कृपा-दृष्टि का प्रताप। उनकी अनुपम लीलाओं का कहां तक वर्णन किया जा सकता है! जितना करो उतना ही कम है।

Saturday, October 22, 2016

16.10.2016




सन् 1963 में यहां श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने मौज के अनुसार अंगूरों के लिए गड्ढे खुदवाए। वे गड्ढे इतने पथरीले थे कि जिनसे यह आशा ही न की जा सकती थी कि पौधे यहां फल दे सकेंगे। बाहर खेतों से मिट्टी व खाद मंगवा कर इन गड्ढों में डलवाई गई। फिर अक्टूबर 1963 में ही एक दो पौधे निज कर-कमलों से लगा कर "अंगूर उद्यान' का उद्घाटन किया। इस अंगूर आरोपण के समय आपने गुरु-सेवा की विशेषता दर्शायी। कुछ विद्यार्थी भी उस समय सन् 1963 में श्री आनन्दपुर से "नया गांव' में श्री दर्शन की इच्छा से गये हुए थे। वहां पर आपकी मौज अंगूरों का कार्य करने की थी। वे विद्यार्थी सेवा की ओर कुछ कम ख़्याल देते थे। आपने फ़रमाया कि ""गुरु-सेवा जोकि अत्यन्त मौज में तरंगित हो, वे हीरे, लाल व जवाहरात हैं, जिन्हें किसी भी मूल्य पर नहीं ख़रीदा जा सकता। हाथ में आया हुआ समय खोकर पछताना पड़ता है। सेवा करने के लिए आए हो, सेवा करो। यह विद्या पुन: वापस जाकर पढ़ लेना। सन्त महापुरुषों की शरण में जाकर उस सच्ची विद्या को लगन से प्राप्त कर लेना ही उचित है। अतएव इस समय में सेवा रूपी हीरे जवाहर एकत्र कर लो।'' उस समय मिट्टी से ट्रक भरने की सेवा चल रही थी। बाकी सेवक 20 ट्रक मिट्टी प्रतिदिन भरा करते थे। उस दिन चार विद्यार्थियों के मिलने पर श्री आज्ञा हुई कि तीस ट्रक मिट्टी भर कर छुट्टी करनी है।
श्री आज्ञा पाते ही सभी सेवक प्राणपन से जुट गये। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी "नया गाँव' टपरा (जिसे आजकल छतरी कहते हैं) में विराजमान थे। प्रेमी पूर्ण उत्साह से सेवा कर रहे थे। दोपहर को श्री सद्गुरुदेव महाराज जी प्रसाद देकर विश्राम गृह लौट गये। सेवक रात्रि के आठ बजे तक सेवा में जुटे रहे, परन्तु ट्रक अभी 23 ही भर पाए थे। सेवकों के दिल में यह विचार था कि तीस ट्रक पूरे करने ही हैं। श्री दर्शन खुलने का समय हो गया, परन्तु कोई भी अपने काम से तिल भर न हिला।
कुछ अन्य सेवा पर काम करनेवाले सेवक अपनी सेवा समाप्त कर श्री दर्शन के लिए तैयार होकर घर में बैठे थे। महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी भी "नया गांव' में मौजूद थे। उन्होंने पहले तो ट्रक भरने वाले प्रेमियों को कहा कि अब छुट्टी करो, श्री दर्शन का समय हो गया है। परन्तु सबने यही उत्तर दिया कि रात का चाहे एक बज जाये हम तो श्री वचन पूरे करके ही छुट्टी करेंगे। महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी सबके कमरों में गए (जो प्रेमी श्री दर्शन के लिए तैयार बैठे थे उन के पास) और कहा कि देखो! कैसी अमूल्य दात लुटाई जा रही है और आप आराम से घर में बैठे हो, चलो सेवा करो। सब अन्य प्रेमी भी वहां उपस्थित हो गये।
चाँदनी रात थी, चाँद भी इस सेवा में संलग्न हो गया कि कहीं अन्धकार हो जाने पर सेवा में बाधा न आए। एक ओर से ट्रक, दूसरी ओर से ट्राली, तीसरी ओर से डम्पर, इसप्रकार के हार्नों ने आकाश को एक नये जयघोषों से गुँजित कर दिया। ऐसा लगता था मानो गगनमंडल में सितारे तथा देवतागण भी इस सेवा में उपस्थित होकर लाभ उठा रहे हैं। ऐसी भीड़ हो गई कि एक मिट्टी की डलिया को हाथ लगाने को भी विनय करनी पड़ी। कुछ समय में सात ट्रक भी भर गए और सब काम पूरा हो गया। सभी जयकारों से नभ को गुँजाते हुए श्री दर्शन के लिए चल दिये।
कितनी विचित्र लीला है कि जिस प्रभु की मिलन की लगन में हज़ारों वर्ष की तपस्या भी फलीभूत होनी कठिन होती है, वही भक्तवत्सल कुल मालिक प्रेमियों की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब प्रेमी आएँ और श्री दर्शन खुलें। प्रेमी, गुरुमुख श्री दर्शन  के लिए सीधा ही श्री दर्शनहॉल में पहँुचे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी भोजन लंगर से मंगवा कर प्रतीक्षा कर रहे थे। पहुँचते ही पहले नर लीला के रूप में फ़रमाया कि इतनी देर क्यों लगा दी। फिर सबको अपने सम्मुख खाना खिलाया। इसके बाद श्री दर्शन, सत्संग व प्रवचन हुए। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया---""हिम्मते मर्दां, मददे ख़ुदा। जब इन्सान हौंसला बांधकर काम करता है तो कुदरत उसकी मदद करती है। फिर आप तो ठहरे गुरुमुख, आप यदि सेवा में पूर्ण रुचि से जुट जाओ तो दैवी शक्तियां स्वयं तुम्हारी मदद करने के लिए आएँगी।''
इस प्रकार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने मिट्टी तथा खाद डलवाकर ज़मीन में अंगूर लगवाये। उन्होंने जो कुछ किया सब हम जीवों की ख़ातिर किया। आप उन विद्यार्थियों को फ़रमाया करते----(निज कर-कमलों में नाशपातियों के गुच्छे बनाकर उन्हें दिखाते) ""इस तरह अंगूरों के गुच्छे नीचे की ओर लटकेंगे। अब आप सेवा कर रहे हो फिर जब यहां आओगे तो तुम्हारी सेवा फल लायेगी। ये गुच्छे भी इसी तरह लटकेंगे। यहां इतने अंगूर होंगे कि संभाले भी न जा सकेंगे। फिर तुम खूब अंगूर खाओगे।'' अर्थात् श्री सद्गुरुदेव महाराज जी दर्शा रहे थे कि किए हुए कर्मों का फल मिलता है। यदि सेवा करोगे तो अच्छा फल मिलेगा।

Sunday, October 16, 2016

16.10.2016

यहां एक बार आपने निज मौज से फ़रमाया----""यह एक छोटा श्री आनन्दपुर है। यह लगभग श्री आनन्दपुर की तरह ही बनेगा। उदाहरणतया श्री मन्दिर, तालाब, पार्क, बाग़-बगीचे, सत्संग हाल, संगतों के निवास की जगह तथा स्नान के लिए टैंक व लंगर आदि यहां होंगे।'' बिजली व मोटरें भी आपने लगवार्इं जिससे कि बग़ीचोंे व खेतों की सिंचाई की जा सके। आपने उरुली कांचन के स्थान को छोड़कर "नया गांव' को सत्संग का केन्द्र बनाया। यहां पर श्रीदर्शन के लिए संगतें आने लगीं। जब प्रथम बार नया गाँव में संगतें आर्इं तो आपने श्री प्रवचन फ़रमाए----
""अनुकूल भोजन के सेवन करने से ही शरीर स्वस्थ रह सकता है। भोजन सेहत के लिए खाया जाता है। प्रतिकूल भोजन शरीर को हानि पहुँचाता है। कोई भी वस्तु जो शरीर के अनुकूल नहीं, केवल जिह्वा के स्वाद के लिए खा ली गई हो, उससे हानि ही हानि है, लाभ कुछ नहीं होता।
इसी तरह कर्म भी जो मनुष्य करता है मनुष्य को सोचना चाहिये कि अमुक कर्म जो मैं कर रहा हूँ मेरे अनुकूल है या प्रतिकूल। यदि कर्म अनुकूल नहीं हैं तो वे भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। जैसे प्रतिकूल भोजन  मनुष्य को हानि पहुँचा सकता है, इसीतरह से प्रतिकूल कर्म भी मनुष्य को हानि पहुँचाते हैं। यही कारण है कि यह जीव हर समय दुःखी और अशान्त रहता है। बुरे कर्म करने से यह जीव चौरासी लाख योनियां खरीद बैठता है। चौरासी लाख योनियां अपने किये कर्मों का फल है। अत: मनुष्य को पहले से ही सोच समझकर कर्म करने चाहियें। ऐसे कर्म नहीं करने चाहियें जिनका परिणाम दुःख, परेशानी, कलपना और अशान्ति है। फ़कीरों का कौल है----
।। शेअर ।।
अज़    मुकाफ़ाते---अमल    ग़ाफ़िल    मशौ ।
गन्दुम   अज़   गन्दुम   बिरौयद   जौ   ज़ि   जौ ।।
सन्तों का कथन है कि ऐ मनुष्य! कर्मों के परिणाम से गाफ़िल न हो। क्योंकि जैसे गेहूँ बोने से गेहूँ की फसल मिलती है और जौ के बोने से जौ की फसल पैदा होती है, इसी तरह से जिस प्रकार के कर्म भी किए जायेंगे, उसीके अनुसार ही प्रकृति की ओर से फल मिलेगा। अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल दुःखदायी होगा। इसलिए सन्त महापुरुष पहले से ही जीव को समझाते व चेतावनी देते हैं कि ऐ मनुष्य! अब भी समय है कि तू सोच-समझकर कर्म कर ताकि बाद में तुझे पश्चात्ताप न करना पड़े।
अब प्रश्न यह है कि कौन-से कर्म अच्छे हैं जिनके करने से मन में शान्ति पैदा होती है और कौन-से कर्म मनुष्य को दुःखदायी बनाते हैं जिनके करने से चौरासी लाख योनियां भोगनी पड़ती हैं। सन्त महापुरुषों ने मनमति के अनुसार मोह-माया, अहन्ता, ईष्र्या, तृष्णा व वासनाओं के ख़्यालों के निमित्त किए गए कर्म बुरे कर्म कहे हैं। इनके करने से मनुष्य के मन में मानसिक रोग (आधि, व्याधि, उपाधि) बढ़ जाते हैं और मनुष्य के विचारों में अशान्ति व क्लेश पैदा करते हैं। कलह-कलपना बढ़ जाती है। मनुष्य हर समय चिन्ता की अग्नि में जलता रहता है। इसलिए ऐसे कर्मों के न करने का सन्त महापुरुष उपदेश देते हैं।
सन्त सद्गुरु की सेवा, सद्गुरु-शब्द की कमाई, सत्संग, सबके प्रति हित की भावना---ये अच्छे कर्म हैं। इन कर्मों के करने से मन में शान्ति व आनन्द की प्राप्ति होती है। इसलिए ऐ जीव! तुम ऐसे कर्म करो जिससे तुम्हारा यह जीवन सुख से व्यतीत हो और मृत्यु के बाद भी तुम्हारी रूह को नरक योनियां न भोगनी पड़ें। परन्तु मनुष्य अपनी समझ से अच्छे कर्म करने का मार्ग ढूँढ़ नहीं सकता। इसलिए समय के सन्त-सद्गुरु की संगति में ही इस जीव को भक्ति व ज्ञान का मार्ग मिल सकता है जिसपर आचरण करने से ही मनुष्य सुख व शान्ति प्राप्त कर सकता है।''

Tuesday, October 11, 2016

05.10.2016

सन् 1958 की बात है कि श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पादशाही जी) नया गाँव (श्री प्रयागधाम) में विराजमान थे, यहां बावली की खुदाई का सेवा कार्य चल रहा था। सब प्रेमी दिलोजान से सेवा में लगे हुए थे। समीप ही एक टपरा में जहां आजकल छतरीनुमा गोल कमरा बना हुआ है, श्री सद्गुरुदेव महाराज जी विराजमान थे। समय दोपहर का 1 बजे का था, गर्मी का मौसम था। इसी समय कुछ विदेश में रहनेवाले प्रेमी-भक्त श्री दर्शनों के लिए आये। श्री चरणों में उपस्थित हो श्रद्धा सहित दण्डवत्-प्रणाम किया। श्री गुरुदेव ने आशीर्वाद देकर उन्हें अमृत तुल्य वचनों से कृतार्थ किया।
आपके पावन दर्शन कर एवं अमृतमय प्रवचन सुनकर वे सब प्रेमी आनन्द-विभोर हो उठे एवं अपने अपने देश को श्री चरणों से कृतार्थ करने के लिए करबद्ध हो विनय करने लगे कि स्वामी जी! भारतवर्ष पर तो आपकी अत्यन्त कृपा है। प्रान्त-प्रान्त और नगर-नगर में कृपाकर आप प्रेमी जिज्ञासुओं को श्री दर्शन व अमृत प्रवचनों द्वारा सत्य पथ दर्शाकर नाम-भक्ति के सच्चे धन से निहाल कर रहे हैं एवं जगह-जगह आत्मिक सुख व शान्ति प्राप्त करने के लिए सत्संग केन्द्र बना दिये हैं। क्या हम पर भी कभी ऐसी कृपा होगी? विदेश में जहां चारों ओर माया ही माया का बोलबाला है, भक्ति-नाम, आत्मिक सुख व शान्ति का नाम भी नहीं और हम जैसे जीव इस माया की झूठी चमक दमक को देखकर भूल जाते हैं। क्या वहां भी कभी आपकी कृपादृष्टि होगी? हमारे भी कभी भाग्य खुलेंगे? क्या हमारे भी गृह आप अपने चरण-कमलों से पवित्र करेंगे? प्रभो! इन देशों में भी कृपा कर अपने पावन दर्शन एवं अमृतमय प्रवचनों से इन भूले-भटके जीवों को सद्मार्ग दर्शाकर सच्चा सुख व परम शान्ति प्रदान कीजिये।
भक्तजनों की भावपूर्ण प्रार्थना सुनकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने उन्हें धैर्य देते हुए फ़रमाया कि ""हम आपकी श्रद्धा-भावना से अति प्रसन्न हैं। घबराओ नहीं। आप देख ही रहे हैं कि इस अवस्था में तो हम वहां जा नहीं सकते (क्योंकि उस समय आपकी पवित्र सेहत बहुत ही सुकोमल थी) मगर हम वायदा करते हैं कि समय आने पर स्वस्थ होकर हम आप सबके पास अवश्य आयेंगे। यह पारमार्थिक कार्य तो धुर-दरगाह से हमारे ज़िम्मे है। हमने श्री आनन्दपुर की महिमा और श्री परमहंस अद्वैत मत का सन्देश सृष्टि भर में जन-जन तक पहुँचाना है।'' आपकी ऐसी भविष्यवाणी तथा ऐसे सुमधुर वचन सुन कर प्रेमी भक्तजन गद्गद हो अपने भाग्य सराहने लगे एवं खुशी में सद्गुरु-महिमा का गुणानुवाद करने लगे।
आज हम इन्हीं श्री वचनों को साकार रूप में देख रहे हैं। श्री पंचम रूप में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी अथक परिश्रम करके श्री परमहंस अद्वैत मत का अमर-सन्देश देश-विदेश के कोने-कोने में जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। जगह जगह पर प्रेमी जिज्ञासु आत्माओं के लिए श्री परमहंस अद्वैत मत के सत्संग केन्द्र बन गए हैं, जहां पहुँचकर अनगिनत जीव भक्ति, नाम और सत्संग से लाभान्वित होकर सच्चे सुख, शान्ति और आनन्द को प्राप्तकर जीवन सफल बना रहे हैं।

Wednesday, October 5, 2016

श्री प्रयागधाम आश्रम..........

श्री प्रयागधाम आश्रम..........
उरुली कांचन (दयाल धाम) का स्थान संगतों के लिए छोटा था, क्योंकि आपके आगमन का समाचार शीघ्रातिशीघ्र महाराष्ट्र तथा आन्ध्र प्रदेश के सब श्रद्धालुओं तक फैल गया। प्रेमी जिज्ञासु अधिकाधिक संख्या में श्री दर्शनों के लिए आने लगे। आपकी मौज इस स्थान पर (नया गांव में) जल्दी विराजमान होने की थी। अतएव आप श्री आनन्दपुर से काफ़ी संख्या में सेवक साथ ले आते और सेवा कराते। इस बार भी जब श्री आनन्दपुर से उरुली कांचन पधारे तो 50--60 महात्मा व भक्त बस में साथ ले आये।
एक दिन आपने सब भक्तों व महात्माजनों को फ़रमाया---""चलो आज तुम्हें एक नई जगह पर ले चलें जहां किसी का आना जाना नहीं है, जो एक स्वतंत्र जगह है। आप सब लोग अपने-अपने सेवा के औज़ार लेकर हमारे साथ चलो। आज हम आपको उस स्थान पर ले चलेंगे जहां सत्संग का (महाराष्ट्र का) मुख्य केन्द्र बनाना है। वहां आज सेवा का प्रारम्भ कर आश्रम का उद्घाटन करना है।'' सब सेवक बड़ी उमंग के साथ सेवा के लिए तत्पर होकर हर्ष से कार के साथ-साथ चल दिये। मार्ग में गांव वाले उचक-उचक कर देखते कि इस निर्जन स्थान की ओर यह दल कहां से आ गया। जिन गांव वालों ने इस सड़क पर कभी साइकिल चलती न देखी, वे देख रहे थे कि कार बड़ी मस्ती से पत्थरों व ऊबड़-खाबड़ रास्ते को पार करती हुई आगे बढ़ रही है। साथ में महात्मा व भक्तजन हैं।
कार के मार्ग में बड़े-बड़े पत्थर बार-बार मार्ग रोक लेते। महात्मा व भक्तजन मिलकर उन पत्थरों को उलट-पलट कर एक ओर कर देते तथा कार को मार्ग मिल जाता। ऐसा लगता था मानो ये पत्थर भी गुरुमुखों की तथा श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की बाट जोह रहे थे कि कब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी हमें दर्शन दें और गुरुमुखों के हाथों हमारा भी उद्धार हो। गांव वाले यह देखकर चकित हो रहे थे कि कैसे भक्तजन पत्थरों को एक तरफ़ सरका कर मार्ग बनाते जा रहे हैं। इतने भारी पत्थर जिन्हें बिना किसी यन्त्र के हिलाना भी कठिन था, भक्तजन एक साथ मिलकर उन्हें उलट पलटकर एक ओर करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। इसी प्रकार सच्चे प्रेमी सेवक श्री इष्टदेव मालिक श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी के साथ "नया गांव' में एक पथरीली धरती पर पहुँचे।   
यहां पहुँचकर आपने कार को रुकवा लिया। यह धरती काले-काले पत्थरों से भरी हुई थी। आप कार से नीचे उतरे और कुर्सी पर विराजमान हो गये। आसपास सेवकों को बैठाकर श्री वचन फ़रमाये----""यह सामने एकत्रित पत्थरों के समूह के आकार की एक पहाड़ी है। इन पत्थरों को जो कि बीच में पड़े हुए हैं, पहाड़ी के मध्य में दीवार के आकार में जोड़ने हैं। ध्यान रहे कि कोई भी पत्थर नीचे न जाने पाये। नीचे किसी को नहीं गिराना। ऊपर चढ़ाने का प्रयत्न करना है।'' पुन: सेवकों को दो भागों में बाँटकर प्रसाद दिया और सेवा करने का आदेश दिया।
जब आसपास के लोगों ने यह सुना व देखा कि इन महात्मा लोगों ने  यह ज़मीन ख़रीदी है जो पथरीली है यानी बेकार है, जिस ज़मीन को हमारे दादा-परदादा ने भी कभी आँख उठाकर न देखा था, वही इन्होंने ली है, तो वे परस्पर कहने लगे कि महात्मा लोग इस ज़मीन को कैसे आबाद करेंगे। थोड़ा ज़ोर लगा लें आख़िर तो ये भी छोड़ ही जायेंगे। उनको यह विदित न था कि उसके निर्माता स्वयं यहां विराजमान हैं। उनका संकेत ही सब कुछ कर सकता है। सेवकों में जो शक्ति भरी है वह क्या-क्या कर दिखायेगी। उन्हें क्या मालूम कि यह सन्त जंगल में मंगल कर देनेवाले हैं। बस कुछ ही दिनों में वह पहाड़ी के आकार में पत्थरों से ढकी हुई धरती दीवार के रूप में समतल खड़ी हो गई। एक वर्ष में जबकि श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी केवल दो-तीन बार एक-एक मास के लिए यहां पधारते थे, यहां मकान बन गए, बावली खोदी गई, पत्थरों की चारदीवारी (सीमा) भी बन गई। अब वे गाँव के लोग जान गये कि यदि एक वर्ष में इतना कुछ हो गया तो इससे आगे न जाने क्या क्या हो जायेगा।

Sunday, October 2, 2016

20.08.2016

सेवकों ने श्री आज्ञा पाकर उस ओर कदम बढ़ाया, उस भूमि पर पहुँच गये जहाँ श्री मौज थी। किन्तु वहां की ज़मीन इन्हें पसन्द न आई, क्योंकि वह तो पथरीली ज़मीन थी। जहां दृष्टि डालो पत्थर ही पत्थर दिखाई देते थे। हरियाली के लिए नाम मात्र को भी कोई पेड़ या पौधा नहीं था। उन्होंने थोड़ी से ज़मीन खोदकर देखी तो नीचे सब पत्थर ही पत्थर थे। उन्होंने परस्पर परामर्श किया कि यह ज़मीन तो बहुत ही पथरीली तथा ऊबड़-खाबड़ पत्थरों से भरी हुई है शायद हम भूल से यहां आ पहुँचे हैं। उन्होंने इससे आगे कदम बढ़ाये, नदी के समीप उससे थोड़ी अच्छी ज़मीन देखकर उसे खरीदने का विचार किया। श्री चरणों में लौटकर भूमि का सब ब्योरा कह सुनाया।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी भविष्यद्-द्रष्टा, घट घट के ज्ञाता ही यह जानते थे कि कहां क्या करना है। फ़रमाया कि चलो हम साथ चलकर देखते हैं। रास्ता बैलगाड़ियों के जाने योग्य भी न था, फिर भी कार में विराजमान होकर अनेक जम्प व कष्टों को सहते हुए उस भूमि पर आ पहुँचे, जिसे सेवकों ने बेकार और पथरीली समझ कर उपयोगी न समझा था। आपने कार रुकवाली और फ़रमाया- "यही भूमि हमारे काम की है। यही सत्संग का वास्तविक स्थान है। इसी को हमने महाराष्ट्र का मुख्य केन्द्र बनाना है। इसके लिए ही तो हमने इतने स्थान खरीदे हैं। यही वास्तविक स्थान है।" सभी सेवक चकित थे कि इसी स्थान को ही तो हमने बहुत सख्त व बिगड़ा हुआ जानकर छोड़ दिया था। इन बड़े-बड़े पत्थरों पर मकान कैसे बनेंगे। वे इसी सोच में ही थे कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया कि "बिगड़े हुओं को सुधारना ही सन्त महापुरुषों का ध्येय है।" तुम सरकारी कानून अनुसार इस भूमि को खरीद लो। आपने इस पथरीली भूमि के भाग्य स्वयं आकर जगाये। इस धरती ने आपके इस अत्यन्त उपकार के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद दिया तथा अपने भाग्यों पर इठलाने लगी कि अब तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी मुझे कभी-कभी अवश्य श्री चरण-स्पर्श प्रदान कर कृतार्थ करते रहेंगे। सेवकों ने आज्ञा प्राप्त कर 24 जून 1957 को इस स्थान को ख़रीद लिया, जिसका शुभ नाम उस समय 'नया गांव' था जो कि वर्तमान समय में श्री प्रयागधाम के नाम से विख्यात है। आप स्वयं उरुली कांचन लौट आये ।

Tuesday, August 23, 2016

19.08.2016

इसके पश्चात आप सब सेवकों को साथ लेकर उस स्थान का निरीक्षण करने आये। आपने फ़रमाया- "अभी तो यह स्थान कुछ समय के लिए काम आयेगा, लेकिन जो वास्तविक स्थान हमें ज़रूरत है उसको अभी खोजना है।" महापुरुषों से क्या बात छिपी होती है। वे त्रिकालदर्शी होते हैं। अपने सेवकों की सेवा बनाने के लिए वे रचना रच देते हैं। वे सेवकों को सेवा का अवसर प्रदान कर लोक-उपकार का कार्य करते हैं। इससे सेवकों की गढ़त भी होती रहती है और साथ साथ उनके मन की अवस्थाओं की जाँच भी होती रहती है। इसे ख़रीदने का आज्ञा प्रदान की ताकि यहां परमार्थ-कार्य आरम्भ हो जाये।
      5 सितम्बर 1952 को उरुली कांचन (दयाल धाम) का यह स्थान ख़रीद लिया गया। यहां पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी समय-समय पर पधार कर सत्संग-उपदेश की पावन धारा बहाने लगे तथा साथ ही श्री दर्शन से जन-जन को कृतार्थ करने लगे। इसके साथ-साथ सेवा का कार्य भी आरम्भ करवा दिया। बड़े-बड़े कमरे निवास के लिए, भजनशाला, सत्संग हॉल, ब़गीचा व चारदिवारी बनवाई। वहां पर जो बावली खुदवाई, उसका पानी डॉक्टरों ने परीक्षण कर पूरे इलाके भर के पानी से प्रथम स्तर का बताया। आपने जहां भी श्री मौज अनुसार पानी निकलवाया, वहां ही स्वादिष्ट मधुर जल निकला। जहां भी श्री मौज के अनुसार आपने कार्य करवाये, वहां से यदि अमृत का स्त्रोत भी बह जाता तो असम्भव नहीं था। यहां पर बम्बई, पूना, कल्याण व हैदराबाद से संगते आकर श्री दर्शन, सेवा तथा सत्संग का लाभ उठाने लगीं।
इसके साथ-साथ आपकी उस वास्तविक स्थान की खोज के लिए भी मौज बनी हुई थी। उसका कार्य भी सेवकों से आरम्भ करवाया। आपने सेवकों को इस क्षेत्र के आसपास का स्थान ढूँढने की आज्ञा दी। उन्होंने उरुली से 10 मील की दूरी पर 'येवत' नामक शहर में कुछ ज़मीन खरीद कर वहां मकान, बावली और चारदिवारी पत्थरों की बनवाई। इसके बाद इसी उरुली स्थान से एक मील दूरी कच्ची सड़क पर कोरे गाँव (पूर्ण धाम) की कुछ ज़मीन खरीदी गई। इतनी ज़मीन खरीद लेने पर भी आपकी मौज जिस स्थान को पवित्र करने की थी वह पूरी न हुई। आपने फ़रमाया- वह स्थान ओर है जहां हमारा प्रयोजन सिद्ध होगा। हमने सत्संग का बड़ा आश्रम बनाना है। फिर सेवकों को स्पष्ट रूप से फ़रमाया- ''आप कोरे गांव (जो कि छोटा स्थान खरीदा है) से लगभग एक मील दूर, नदी से आध फ़र्लांग इस ओर ज़मीन देखो, वह उपयुक्त स्थान रहेगा।"

Wednesday, August 17, 2016

13.08.2016

नया गांव (श्री प्रयागधाम)
परमार्थ-लाभ कराने हेतु आपको मानव-हृदय आर्त्त स्वर से पुकार रहे थे। प्रेमियों की विह्वल पुकार ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को विवशतापूर्वक खींचा। आप जहां भी कृपा फ़रमाते, वह धरती तथा मिट्टी पवित्र बन जाती। मानव, दानव-वृत्तियों को त्यागकर देव-वृत्तियों को धारण कर लेते। माया व मन अपना सा मुँह लेकर रह जाते। उस धरती के कण-कण में हर्ष समा जाता। आपको बम्बई, पूना, शोलापुर, कोल्हापुर, कल्याण, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) के प्रेमी विनय कर रहे थे। वे इतनी दूर श्री आनन्दपुर में सुगमता से श्री दर्शन न कर सकते थे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की मौज भी यही थी कि भारत के कोने-कोने में इस नाम की ज्योति की किरणें पहुँचे अतएव भक्तों के आग्रह करने पर आपकी मौज यह हुई कि महाराष्ट्र में भी कोई आश्रम बनाना चाहिए जहां आकर संगतें श्री दर्शन व सत्संग का लाभ उठा सकें।
      आपने अपनी हार्दिक उमंग तथा दिव्य-दृष्टि से ज़िला पूना को सत्संग के लिए उचित क्षेत्र चुना और श्री मौज उठी कि इसके आस-पास की भूमि खरीदी जाए। यहीं पर ही आश्रम बनाया जाए, क्योंकि यहां का जलवायु स्वास्थयप्रद है। आपने अपने सेवकों महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी, महात्मा दर्शन प्रेमानन्द जी व महात्मा सद्गुरुसेवा नन्द जी को आज्ञा दी कि शोलापुर रोड़ पर किसी अच्छे स्थान को ढूँढ़ो। आपस में परामर्श करो फिर हम वहां जायेंगे। स्वयं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी पूना शहर में किसी स्थान पर विराजमान थे। सेवकजन श्री आज्ञा मानकर शोलापुर रोड़ की तरफ गए। रास्ते में ज़मीनें देखने लगे, क्योंकि बहुत दूर तो जाना नहीं था। पूना से 18 मील की दूरी पर उरुली कांचन बसा हुआ है, इसलिए वहीं ज़मीन देखने लगे। वहां पर इन सेवकों को एक भक्त सख़ावतमल मिल गया जो उपदेशी भी था और वहां के लोगों से परिचित भी। भक्त सखावत मल की सहायता से उरुली शहर से एक मील की दूरी पर पूना की ओर सड़क के समीप इन्हें एक भूमि जँच गई, वहां चार-पांच कमरे भी बने हुए थे। उस भूमि के मालिक से मिलकर ज़मीन के विषय में सब कार्यवाही कर श्री चरणों में पहुँचकर सब वृतान्त निवेदित किया।

Saturday, August 13, 2016

11.08.2016

श्री सद्गुरुदेव महाराज जी सर्वदा कुछ दिन बाहर लगाकर अपने मुख्य केन्द्र श्री आनन्दपुर में ही कृपा फ़रमाते थे। इधर श्री आनन्दपुर में भी सेवा का कार्य बड़े ज़ोर से चल रहा था। आप कुछ दिन बाहर लगाकर पुनः प्रेमियों को कृतार्थ करने के लिए यहां पधारे। अब यहां पक्के मकान तैयार हो रहे थे। भूमि उपजाउ बनाई जा रही थी।
एक पटवारी ज़मीन का निरीक्षण करने आया। उसने सरकारी नियमानुसार यह लिखना था कि कितनी भूमि बंजर है और कितनी उपजाऊ है। उस समय जिस भूमि का कार्य आरम्भ था, दो-चार दिनों के पश्चात् उसने उपजाउ के योग्य बन जाना था। उसके विषय में पटवारी ने बंजर भूमि के नाम लिख दी। सेवकों ने भी श्री चरणों में विनय की कि प्रभो! पटवारी तो इसे बंजर के नाम लिख रहा है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया कि उसे कहो कि इस ज़मीन को उपजाऊ लिखे। सेवकों ने पटवारी को बहुत समझाया कि दो-चार दिनों में यह उपजाऊ बन जायेगी, अतः यहां उपजाऊ शब्द लिखो। पटवारी ने उत्तर दिया कि यह ज़मीन तो पांच वर्ष में भी उपजाऊ बननी कठिन है। दो-चार दिनों का झूठ लिखा जा सकता है न कि इतना बड़ा झूठ! उसे क्या मालूम था कि यहां तो प्रकृति के स्वामी एक संकेत से जो कुछ करवाना चाहें करवा सकते हैं। उनके सामने यह साधारण सी बात है।
      पटवारी यहां से चल दिया। जब दफ़्तर में जाकर फाइलों में नोट करने लगा तो वही 'भूमि' उपजाऊ शब्द में लिखी गई। उसने फाईल बन्द की और घर की राह ली। पांच दिन पश्चात जब सने फाईल खोली तो अपनी कलम से 'उपजाऊ' शब्द लिखा पाया। वह हैरान था कि यह कैसे लिखा गया। पुनः वह श्री आनन्दपुर में उसी दिन आ गया। उस ज़मीन में बीज बोया देखकर उसके आशचर्य की सीमा न रही। उसने मन में समझ लिया कि यह महापुरुष मानवी शक्ति से परे हैं। उसने सेवकों के सम्मुख दर्शन करने की इच्छा प्रकट की। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने विनय स्वीकार कर उसे श्री दर्शन से कृतार्थ किया। उसने अपनी भूल पर श्री चरणों में क्षमा के लिए याचना की। आपने फ़रमाया कि यहां तो कुदरत की सभी शक्तियां स्वयं काम कर रहीं हैं। आप तो किसी न किसी साधन से पथ-भटकी रूहों को मार्ग पर लगाना चाहते थे। उस पटवारी को इस साधन से श्री दर्शन का अवसर मिला और उसने नाम उपदेश लेकर अपने जीवन का रुख़ सत्य-पथ की ओर मोड़ा।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी प्रत्येक दिन नये कार्यक्रम, नई रचना, नई उमंगों व प्रेमियों में नया साहस भरकर नई युक्ति से भक्ति का अमृत पिलाते। कभी प्रेमियों को सैर के लिए तासबावली ले जाते, वहां अनुपम लीलाएँ करते तथा साथ में सेवा कार्य भी करवाते तो कभी चक दयालपुर में ले जाते और कभी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री वचन तथा मौज के अनुसार श्री आनन्दपुर में नव-निर्माण की रूप रेखाओं को साकार रूप देने के लिए सेवा की धुन लगाते। प्रेमी तो प्रेम की डोरी में खिंचे चले आते। उनके लिए तो आपकी मौज तथा श्री आज्ञा पर चलकर प्रसन्नता प्राप्त करना ही जीवन था। आपकी मौज श्री आनन्दपुर में जिज्ञासुओं तथा दर्शार्थ संगतों के लिए 'श्री आनन्द भवन शिमला' बनाने की हुई। इसके साथ-साथ पानी की कमी को पूरा करने के लिए बोरिंग तथा अन्य कार्यों को पूरा करने की योजना बनाई। इधर महाराष्ट्र की धरती आपके श्री मृदुल चरण-स्पर्श कराकर पुण्यवती बनने के लिए पुकार रही थी। जिस ओर से प्रेम की आतुर पुकार आपको बुलाती आप उधर ही प्रेम के आगार बनकर उस करुण गुहार को सुनते।

Thursday, August 11, 2016

10.08.2016

एक दिन की बात है गर्मी तथा थकावट के कारण सब महात्मा व भक्तजन विश्राम के लिए बैठ गए। नौकर काम पर लगे हुए थे। एक घनी कंटीली झाड़ी को छोड़कर वे आगे बढ़ गए। आपने वहां कृपा करी। सभी सेवक उठ खड़े हुए।  आपने जहां-तहां निहारा कि कितना क्षेत्र साफ हो गया है। उस झाड़ी की तरफ संकेत कर आपने फ़रमाया –“ यह झाड़ी क्यों छोड़ दी गई है?” सेवकों ने विनय की- प्रभो! नौकरों से यह उखाड़ी नहीं जा रही थी, इसलिए उन्होंने छोड़ दी है। श्री वचन हुए कि जब तक स्वयं कांटों में हाथ नहीं डालोगे, तो औरों से क्या सेवा करवाओगे!
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी स्वयं सेवा के आदर्श थे। वे सेवकों को भी वही आदर्श बनाना चाहते थे। श्रीवचनों को सुनते ही सबके सब ऐसे सेवा में जुट गए कि किसी को भी न दोपहर की गर्मी, न दिनभर के विश्राम की सुधि रही। उन महात्मा जनों का कथन है कि हमने उस दिन से कुर्ते पहनने छोड़ दिये, बुनियान व धोती पहने सारा दिन श्रीसेवा में संलग्न रहते। हमें जो अपूर्व आनन्द उस समय मिला शायद ही ज़िन्दगी में कभी मिला होगा।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने दर्शाया कि अपना आचरण ही उपदेशों से कहीं अधिक प्रभावशाली होता है। परिणामस्वरूप कुछ दिनों में यह वन साफ़ हो गया और यहां आश्रम की स्थापना की गई, जहां पर समयानुसार आप एकान्तवास के कृपा फ़रमाते। कभी-कभी संगतों को भी श्री दर्शन का यहां सुअवसर दिया जाता। एक बार यहां कुछ प्रेमियों के सम्मुख आपने श्री प्रवचन फ़रमाए-
       “भक्ति और योग में कितना अन्तर है? भक्ति के सम्मुख ज्ञान-योग-साधन कुछ नहीं, क्योंकि इन सबकी पहुँच केवल बुद्धि तक है। बुद्धि से आगे का मार्ग वास्तविक प्रेम का मार्ग है जो सबसे ऊँचा है, क्योंकि बुद्धि से परे का स्थान आत्मा है। वहां तक प्रेम की पहुँच है बुद्धि की नहीं। विज्ञान ने जितनी भी वस्तुऐं बनाई हैं, सब बुद्धि की साहयता से बनाईं हैं। परन्तु इससे आगे की मंज़िल तक विज्ञान द्वारा कोई नहीं पहुँच सका। गुरुमुख व प्रेमी की सब कार्यवाही दिमाग़ व बुद्धि से परे  की होती है अर्थात वास्तविक प्रेम के मार्ग पर आरूढ़ होती है। वह सदा अपने इष्ट के प्रेम में मग्न रहता है। प्रेम-भक्ति व निष्काम सेवा के बराबर कोई साधन नहीं। जब प्रेमी का लगाव अपने इष्टदेव सद्गुरु के शब्द से जुड़ गया तो योग और वैराग्य में कौन सी कमी रह गई। शब्द से सुरति जुड़ने का नाम ही योग है। संसार से उपरामता ही वैराग्य है। सच्चा प्रेमी बिना किसी अन्य साधन के प्रेम द्वारा ही मंज़िल तक पहुँच जाता है, क्योंकि प्रेमी का ध्यान अपने इष्टदेव की प्रसन्नता के अतिरिक्त कहीं भी नहीं जाता। बस! श्री आज्ञा, प्रेम और सेवा ही गुरु-भक्ति के सर्वोत्तम साधन हैं। यही सुगमता से मंज़िल तक पहुँचाते हैं। अतः प्रेमी गुरुमुख अपने लक्ष्य की ओर ध्यान रखते हुए उस मंज़िल को प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे रहें, इसी में ही जीव का लाभ निहीत है।”

Wednesday, August 10, 2016

09.08.2016

इस प्रकार समय-समय पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री वचनों द्वारा गुरुमुखों को चेतावनी देते रहते थे ताकि गुरुमुखों के विचारों में दृढ़ता बढ़ती जाए। सब गुरुमुखों-प्रेमियों को अपनी-अपनी सेवा पर लगाकर आप स्वयं सबकी देख-रेख करते और कुछ महात्माजन भी इसके लिए नियुक्त किए जोकि समयानुसार सब सुव्यवस्था और आवश्यकताओं की पूर्ति करते।
       एकबार आपकी मौज ऐसी उठी कि एक स्थान ऐसा भी होना चाहिए जहां पर कभी-कभी जाकर विश्राम किया जाए। महापुरुषों के लिए आराम कहां! वे तो केवल धरती, मानव तथा प्रकृति की प्रत्येक रचना में बनी हुई वस्तुओं की करुण पुकार सुनते हैं। घने बन, कंटीली झाड़ियां तथा एकान्त प्रकृति की गोद में खेलते हुए भूमि-खंड आपको श्री चरण-स्पर्श करने के लिए विवश करते थे, क्योंकि आपका कार्य कांटों में फूल खिलाना, प्रेम अमृत से सिंचित कर भाग्य जागान था। इसलिए आपने समयानुसार अपने परमार्थ की पूर्ति के लिए हर स्थान को पवित्र किया और जीवनपर्यन्त इसको करते रहे।
कुदरत के आंचल में, खड़ा हूँ मैं भी दामन पसारे।
सुन लो पुकार ऐ मांझी! बे-सहारों के सहारे ।।
हम भी ठूँठ काँटों के, बने जन्मों से प्रभु प्यारे ।
करो कृपा की इक दृष्टि , लगा दो हमको भी किनारे।।
       आप अपनी मौज के अनुसार मार्च 1950 ई. में मुरादाबाद और काशीपुर के मध्य में स्थित रोशनपुर में पधारे। यहां पर महात्मा परम योगानन्द जी, महात्मा सत विचारानन्द जी तथा भक्त दरयाई लाल जी को बुलवाया। रोशनपुर स्टेशन से दो मील की दूरी पर ग्राम लालपुर बहिराई में आप सेवकों सहित पधारे। यहां पर एक घना वन था जहां हाथ को हाथ न सूझता था, लेकिन महापुरुषों के भजनभ्यास के लिए एकान्त, शान्त, सुन्दर वातावरण था। एक स्थान पर यहां श्री सद्गुरुदेव महाराज जी पलंग पर विराजमान हुए। उसी स्थान ने मानो श्री चरणों का स्पर्श पाकर श्री चरणों में स्वीकृत होने के लिए विनय की। दीनबन्धु श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इस विनय को स्वीकार किया। उस स्थान को अपनी श्री मौज अनुसार उचित जानकर उसे खरीदने के लिए आज्ञा फ़रमाई और लौट आए।
       पुनः श्री व्यासपूजा के शुभ पर्व के पश्चात् अगस्त सन् 1950 में इस स्थान के भाग्य जगाने के लिए पधारे। श्री स्वामी जी श्री दर्शन पूर्ण आनन्द जी महाराज, महात्मा सत विचारानन्द जी, महात्मा सद्गुरु सेवा नन्द जी, महात्मा योग प्रकाशानन्द जी, महात्मा सन्तोषानन्द जी, महात्मा नित प्रेमानन्द जी, महात्मा दर्शन अलखानन्द जी, महात्मा भक्ति ध्यानानन्द जी, महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी, महात्मा शब्द विवेकानन्द जी, महात्मा पूर्ण श्रद्धानन्द जी, महात्मा अपारानन्द जी, भक्त पहलूमल जी (महात्मा परमात्मा नन्द जी), भक्त बलराम जी (महात्मा योग सत्यानन्द जी) तथा कुछ अन्य महात्मा व भक्त श्री आज्ञानुसार सेवा के लिए साथ गए। वहाँ पहुँच कर आपने घने वन को साफ़ करवाना आरम्भ कर दिया। ये सब श्री आज्ञा को शिरोधार्य कर सेवा में जुट गए। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी स्थान-स्थान से कांटों की सफ़ाई करवाकर यह दर्शा रहे थे कि इसी प्रकार भक्तिमार्ग में भी कांटे हैं। जो इन कांटों से नहीं डरता, वही भक्ति रूपी पुष्ट को प्राप्त कर लेता है। जैसे कांटों में उलझने पर पीड़ा अनुभव होती है, कभी रक्त भी बहने लगता है, इसीप्रकार भक्ति मार्ग में कष्टों से गुरुमुख को नहीं डरना चाहिए। इन कष्टों को सहन करके ही भक्ति की मंज़िल को प्राप्त किया जा सकता है। इस स्थान को साफ़ करने के लिए इन गुरुमुखों के साथ कुछ मज़दूर भी लगे हुए थे।

Tuesday, August 9, 2016

08.08.2016

इसप्रकार सन् 1947 के पश्चात् दिन प्रतिदिन शरणागतों की संख्या बढ़ती गई और आप सेवा का भण्डार बढ़ाते गये। आए हुए शरणागतों को आप समय-समय पर पावन प्रवचनों से कृतार्थ करते थे। आपने एक बार श्री वचन फ़रमाये-
“ मनुष्य को संसार में बड़े विचार से रहकर अपने कर्तव्य को हर तरह से ख़्याल में रखते हुए अपने जीवन का सफ़र तय करना है। समय अपना काम करता है, वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। अब इसी समय के अन्दर जिसने कुछ कर लिया,वह उतना ही लाभ प्राप्त करेगा। जिसने इस लक्ष्य को समझकर कुछ काम संवार लिया तो अच्छा है, नहीं तो गफलत और मन के धोखे में रहकर वह हानि उठायेगा। वास्तव में तो उसे लाभ प्राप्त करना था, परन्तु मन व माया के धोखे में आकर लाभ की अपेक्षा हानि प्राप्त की- मन व माया की लपेट में आकर वह चौरासी लाख यौनियों के चक्र में पड़ गया। जैसे रोशनी व अन्धेरा दो पहलू हैं, इसी तरह कुदरत की रचना में प्रत्येक वस्तु के दो पहलू हैं। सुख-दुःख, दिन-रात, सत्य-असत्य, बुरा-भला, आत्मा-शरीर, माया व भक्ति – सब के दो दो पहलू हैं।
       गुरुमुख पुरुष माया में बर्तते हुए भी भक्ति को ग्रहण करते हैं। जैसे व्यवहार में माया की प्राप्ति के लिए बहुत से कष्ट, बाधाएँ और परीक्षाऐं सामने आती हैं, इसीतरह परमार्थ व भक्ति के रास्ते में कईं बाधाओं का सामना करना पड़ता है। गुरुमुख इसी राह पर चलते हुए अपने आपको मन व माया के चक्कर से बचाकर भक्ति में सफलता प्राप्त करता है। जब जीव माया के पंजे में फँस जाता है तो उसे आनन्द का धाम भूल जाता है। लेकिन गुरुमुख पुरुष अपने सद्गुरु की शरण लेकर स्वयं को माया की लपेट से मुक्त कर लेता है जबकि मायावी जीव काम-क्रोधाति दुश्मनों के पंजे में आकर दुःखी रहते हैं।
       यदि गफ़लत में समय बीते और रूह को मुक्त न कर सके तो कितनी हानि है। केवल यह नहीं कि ज़िन्दगी के दिन पूरे करने हैं और खाना-पीना, पहनना और समय गफ़लत में गँवा देना है। जिसने मालिक की प्रसन्नता प्राप्त नहीं की उसने माया के चक्र में समय व्यर्थ गँवा दिया और कुछ लाभ प्राप्त न किया। कुदरत की तरफ से ऐसा अच्छा संयोग मिलने पर भी यदि ग़फलत के कारण माया का दबाव पड़ गया- माया ने ताकत पकड़ ली तो परिणाम ख़राब होगा। डालना तो माया पर दबाव है-यदि माया ने दबाव डाल दिया तो अत्यधिक हानि उठानी पड़ेगी।
       सत्पुरुष तो यही चाहते हैं कि वह कौन सा सौभाग्यशाली समय होगा जब जीव इस माया के घेरे से आज़ाद होगा। आया तो था माया से स्वतंत्र होने के लिए तथा मालिक की भक्ति के लिए, परन्तु बन गया माया का गुलाम। मालिक के दरबार में ऐसा नियम नहीं है कि किए हुए कर्मों का फल न मिले। कोई इन किये हुए कर्मों के फल से ग़ाफिल न रहे। वह तो कुदरत अवश्य देगी। सन्त महापुरुष इसी बात पर ज़ोर देते हैं चाहे कोई माने या न माने। माया एक तिलकन बाज़ी है। एक बार पांव फिसला तो बहुत गहरे गड्ढे में जा गिरेगा जिससे निकलना बहुत कठिन है। इस रास्ते में माया से पीछा छुड़ाना है। माया को पीठ देकर भक्ति प्राप्त करने का प्रयत्न करना है। इन सब पर नज़र रखते हुए सद्गुरु के वचनों पर आचरण कर जीवन का कल्याण करना है।
उदाहरणतया एक यात्री जब जंगल में चोरों-डाकुओं से घिर जाता है तो उस समय उसे परिवार, धन-दौलत कुछ भी याद नहीं आता, केवल वह अपनी जान बचाता है। इसी प्रकार सुरति मोह-लोभ-अहंकार आदि शत्रुओं से घिरी हुई है। यह सुरति शरीर, मन, इन्द्रियों के बन्धन में करोड़ों गुना अधिक आई हुई है, लेकिन जीव को पता नहीं चलता। इसे सद्गुरु के शब्द की कमाई के द्वारा आज़ाद करना है। सन्त महापुरुष जो कि त्रिकालदर्शी, परम चेतन शक्ति हैं, वे ही सब कुछ जानते हैं। जीव इस जन्म में आज़ाद हो गया तो अच्छा, नहीं तो बहुत भारी बन्धन में पड़ जायेगा जिससे निकला मुश्किल होगा।
       यह कोई रेलगाड़ी की यात्रा नहीं है  कि एक रेल से निकल जाने पर दूसरी गाड़ी पकड़ लेंगे और सफ़र तय हो जायेगा। रूहानी मार्ग में तो जन्म-जन्म का अन्तर पड़ जायेगा। यह एक ऐसा नाज़ुक रास्ता है जिसे केवल सन्त महापुरुष ही जानते हैं कि जीव काल और माया के चक्र से कैसे छुटकारा पा सकता है।
       यदि सद्गुरु की आज्ञा, मौज व वचनों पर विश्वास करके अमल करोगे, तो सब बन्धनों से आज़ाद हो जाओगे। सन्त महापुरुष जो कुछ भी करते हैं, जीव की भलाई के लिए करते हैं। वे केवल जीवों के कल्याण की ख़ातिर ही ऐसी रचना रच देते हैं ताकि प्रेमी-गुरुमुख सद्गुरु दरबार की सेवा आज्ञा व श्री मौज अनुसार करके भक्ति के हीरे-जवाहरात प्राप्त कर मालामाल हो सकें। गुरुमुखों का कर्तव्य है कि श्री वचनों पर आचरण करते हुए जीवन का कल्याण करें।’

Monday, August 8, 2016

06.08.2016

गुरुमुख प्रेमीजन सेवा करते। आप सेवा के स्थान पर जाकर उनको श्री दर्शन से कृतार्थ करते। आप श्री मुख से फ़रमाते थे कि प्रत्येक गुरुमुख को इन चार नियमों को प्रतिदिन पूरा कर लेना चाहिये- 1. श्री दर्शन 2. सत्संग 3. भजन 4. सेवा। आपने इन नियमों का परिपक्वता से परिपालन करवाया। सेवा में गुरुमुख प्रातः से संध्या तक जुटे रहते। श्री दर्शन तो करुणाकर आप ही उन्हें सेवा पर विराजमान होकर देते रहते। सत्संग का अर्थ ही यही है कि ‘सन्तों का संग’। यहां तो संतो के सिरमौर श्री इष्टदेव कुल मालिक स्वयं विराजमान थे और उनकी पवित्र संगति का सौभाग्य तो गुरुमुखों को मिल ही रहा था, फिर भी समय समय पर श्री दर्शनों का विशेष लाभ मिल जाता। उसी समय पावन सत्संग भी होता तथा कभी-कभी श्री मौज अनुसार स्वयं भी प्रवचन फ़रमाते थे। संध्या समय मूल मंत्र का जाप आप स्वयं करवाते थे। इन चार नियमों को बिना किसी कठिनाई के गुरुमुख पूरा कर लेते। शारीरिक निर्वाह की उन्हें चिन्ता ही क्या थी जबकि कुल मालिक स्वयं उनके प्राणधन थे। समय पर लंगर (भोजन) तैयार हो जाता। भोजन सेवा के स्थान पर पहुँचाने को सेवक तैयार होते, परन्तु गुरुमुखों को उस आनन्दमय अमृत को पीकर भूख-प्यास की चिन्ता ही न रहती थी। स्वयं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी निज कर-कमलों से श्री प्रसाद देते तो प्रेमीजन सेवा से थोड़ा अवकाश कर लेते।
कुछ जिज्ञासुओं ने श्री चरणों में सर्वस्व समर्पित कर शरणागत होने के लिए विनय की। आपने फ़रमाया- “भक्ति के नियमों पर चलते हुए लंगर का दाल-फुलका तथा साधारण पहरावा जिसे स्वीकार हो, उसके लिए यह सच्चा दरबार हमेशा खुला है जब भी चाहें आ सकते हैं। यहां आवश्यकता पूर्ति तो की जाती है परन्तु मन की इच्छाओं की पूर्ति नहीं की जाती।’’ उन प्रेमियों ने बार-बार विनय की कि प्रभु! हमें आपकी प्रसन्नता के अतिरिक्त किसी इच्छा पूर्ति की चाह नहीं है। यहां की दाल-रोटी बढ़िया पकवानों से कहीं उत्तम है, यहां की दाल की तुलना में स्वर्ग के स्वादिष्ट भोजन भी तुच्छ हैं।
       भक्ति के अभिलाषी प्रेमियों को तो एक दिव्य आनन्द की लहर में ग़ोते लगाने की धुन सवार थी। इतनी श्रद्धा और ऐसे अटल विश्वास को देखकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने शरणागति के लिए आज्ञा दी। 1947 के पश्चात जैसे जैसे दरबार की महिमा फैलती गई, जो भी प्रेमी गुरुमुख अत्यन्त श्रद्घा-विश्वास सहित विनय करता उसे श्री आज्ञानुसार शरणागति मिल जाती। इस प्रकार से काफ़ी संख्या में गुरुमुख प्रेमियों ने शरणागति प्राप्त की तथा गुरु भक्ति के पथ पर चलकर मानव-जन्म को कृतार्थ करने लगे।

Saturday, August 6, 2016

05.08.2016

इधर 1947 में स्वतन्त्रता संग्राम के कारण देश-विभाजन हुआ। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तृतीय पादशाही जी) ने तो इसके विषय में 1940 में ही कई बार श्री वचन फ़रमाए थे। उनमें से एक दो विशेष वचनों का उल्लेख पीछे किया जा चुका है। इन वचनों से आप सांकेतिक रूप से प्रेमियों को पहली ही चेतावनी दे चुके थे। सन् 1947 में जब देश विभाजन हुआ, उस समय कई लोग बे-घर हो गए। अशान्त वातावरण के उत्पन्न होने के कारण सबके हृदय करुण-क्रन्दन कर उठे। ऐसे समय में उनके अशान्त-त्रस्त हृदयों को किसी शान्तिदायक आश्रय की आवश्यकता थी। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने पहले से ही इस आनन्दमयी, सुखदायक श्री आनन्दपुर की नगरी को, आकुल-व्याकुल हृदयों को शान्ति, सुख आनन्द प्रदान करने के लिए रचा था। इसीलिए प्रेमी गुरुमुखों ने तो श्री सद्गुरुदेव जी का नाम स्मरण कर वहां से जान बचाई तथा इधर भारत में आते ही श्री चरणों में पहुँचकर शान्ति तथा आनन्द प्राप्त किया।
       आपने इस श्री आनन्दपुर की रचना के साथ-साथ वहां से 20 मील की दूरी पर अशोकनगर में यात्रियों के आने-जाने की सुविधा के लिए थोड़ी सी ज़मीन खरीद कर आश्रम स्थापित करवाया, जिसका प्रबन्ध श्री स्वामी बेअन्त आनन्द जी महाराज (श्री चौथी पादशाही जी) के हाथ सौंप दिया था। प्रचारक महात्माओं के सत्संग से हज़ारों की संख्या में अन्य जिज्ञासुओं ने भी इस भक्ति-मार्ग को सहर्ष स्वीकार किया और अपनी वेदना, व्यथा व अशान्ति-युक्त हृदयों को नामोपदेश से सिंचित कर सुख की सांस ली।
       इस घनघोर दुःखद समय में आपने उन जिज्ञासुओं को अशोकनगर तथा श्री आनन्दपुर में आश्रय देकर उनका दुःख निवारण किया। अब क्योंकि जिज्ञासुओं एवं प्रेमियों की संख्या बढ़ गई इसके लिए आपने श्री आनन्दपुर की रचना को विशाल रूप दिया। 1947 तक झोंपडों (टप्परों) तथा बावलियों से ज़रूरत की पूर्ति होती रही। अब आवश्यकताएं बढ़ गईं और उनकी पूर्ति के लिए यथासम्भव साधन किये जाने लगे। सेवा को विशाल रूप दिया गया।
यहां पर झोंपड़ों (टप्परों) के स्थान पर ईंटों के मकान बन गए। जहां –तहां खेतों में पड़े हुए पत्थरों को एकत्र करवाना आरम्भ कर दिया। स्थान-स्थान पर उद्यानों के लिए स्थान साफ़ करवाने आरम्भ करवा दिए। इस प्रकार गुरुमुखों को सेवा का सवर्णावसर मिला। आपने अमुल्य सेवा रूपी निधी गुरुमुखों को प्रदान की। अब इस उपकार पर यदि गहराई से दृष्टि डालें तो क्या हम उस स्तर तक बुद्धि को पहुँचा सकते हैं कि कितना कितना परोपकार किया श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने हम पर? इधर हमारी दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपना अमुल्य समय देते हैं, इधर हमारी रूहानी प्यास को बुझाने के लिए तत्पर रहते हैं। क्या ऐसा कार्य किसी युग में हुआ कि स्वयं इष्टदेव कुल मालिक हमारे भोजन, निवास आदि विषयों पर स्वयं साकार रूप में ध्यान दें और साथ ही परलोक सुधारने का दायित्व भी अपने ऊपर लें? ऐसा अन्यन्त्र उदाहरण मिलना कठिन है

Friday, August 5, 2016

04.08.2016

इस प्रकार 1946 से 1963 तक आपने कितनी बार ही यहां पर इस टाहली के समीप प्रवचन फ़रमाए, कितना यहां पर प्रेम लुटाया, इसका अनुमान लगाना कठिन है। जड़-चेतन सभी को आपने अतुल्य प्रेम प्रदान किया। आपमें यही विलक्षणता थी कि आपके समक्ष आते ही श्री दर्शन की माधुरी छटा से प्रेमी आत्म विभोर हो जाता। आपके श्री दर्शन में क्या जादू था कि-
प्रेम-मंत्र जड़ चेतन सब में, करुणामय ने भर डाला।
जो हुआ आपकी शरणागत, उसे मालामाल था कर डाला ।।
जिस ओर निहारा एक नज़र, वहां प्रेम-पयोधि छलकत है।
क्या प्रेम की अतुल बड़ाई है, दीदार में तेरे झलकत है ।।
जौलाई सन् 1963 में आपने श्री सन्त नगर के अन्तिम भाग्य जगाए। सेवा, सत्संग, श्री दर्शन का सौभाग्य प्रदान करते हुए आपने यह वचन फ़रमाए-
साधारणतया लोग भगवान को पाने की अभिलाषा रखते हैं। हर किसी के मुख से यही आवाज़ निकलती है कि ईश्वर मिल जाये, भगवान के दर्शन हो जायें। परन्तु ईश्वर, भगवान अथवा मालिक क्या चीज़ है, यह बात बहुत कम लोग जानते हैं। वह मालिक केवल प्रेम-स्वरूप है। उसका वास्तविक स्वरूप प्रेम, प्यार, प्रीति और मुहब्बत है। यह सारी सृष्टि उस कुल मालिक की रचना है और इस रचना का आधार फ़कत मालिक का प्रेम ही है। विचारपूर्वक देखने से पता चलता है कि मालिक ने अपनी सृष्टि की रचना में प्रेम को ही आधार बना रखा है। प्रेम के तागे में ही सब दुनिया माला के मनकों की तरह पिरोई हुई है और इसी प्रेम की डोरी के द्वारा ही जीव अपने मालिक के चरणों में पहुँच सकता है।
       परन्तु इसके साथ दुनिया में माया और काल की रचना फैली हुई है। साधारण दुनियावी जीव माया की इस रचना में लुभा जाते हैं और माया में लिप्त हो जाने के कारण मालिक का सच्चा प्रेम उनके दिलों से लुप्त हो जाता है। जीव के अन्दर सार-तत्त्व तो मालिक का शुद्ध एवं सच्चा प्रेम है, परन्तु माया की रचना देख-देखकर जीव भूल जाता है क्योंकि माया की रचना ही ऐसी है, जैसा कि सत्पुरुषों ने कहा है-
ए जियरा तैं अमर लोक को, पर् यो काल बस आई हो।
मनै सरूपी देव निरंजन, तोहि राख्यो भरमाई हो ।।
पाँच पचीस तीन को पिंजरा, ता में तो को राखै हो।
तो को बिसरि गई सुधि घर की, महिमा आपन भावै हो ।।
निरंकार निरगुन ह्वै माया, तो को नाच नचावै हो ।
चरम दृष्टि को कलफी दीन्हो, चौरासी भरमावै हो ।।
सतगुरु पीव जीव के रच्छक, ता सो करो मिलाना हो ।
जा के मिले परम सुख उपजै, पावो पद निर्बाना हो ।।
जुगन जुगन हम आय जुनाई, कोई कोई हंस हमारा हो ।
कहै कबीर तहाँ पहुँचाऊँ, सत्त पुरुष दरबारा हो।।
                     परम सन्त श्री कबीर साहिब जी
महापुरुष समझाते हैं कि ऐ जीव! तू वास्तव में अमर लोक का वासी है, किन्तू काल के वश में आ गया है। मन रूपी देवता ने तुझे भ्रम में डालकर अपने अधीन कर रखा है। पाँच विषय- रस (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द), पच्चीस प्रकृतियां और तीन गुण रूपी पिंजरे में मन ने कैद कर रखा है, इसलिए तू अपने वास्तविक ठिकाने की सुधि भूला बैठा है। सूक्ष्म माया तुझे धोखे में फंसा कर नाच नचा रही है। उसने तेरी आँखों पर नफ़सानियत की पट्टी बांध दी है और इस प्रकार चौरासी लाख योनियों में भटका रही है। अब इस धोखे से छुटकारा क्योंकर होगा? इसकी युक्ति भी बतलाते हैं कि सतगुरु कुल मालिक का स्वरूप हैं जोकि जीव की रक्षा करने वाले हैं, तू उनसे मेल-मिलाप कर। उनके मिलने से परम सुख की प्राप्ति होगी और तू अपने असली ठिकाने निर्वाण पद को पा लेगा। श्री क़बीर साहिब फ़रमाते हैं कि सत्पुरुष तो युग-युग में जीवों को चिताने और जगाने के लिए आते हैं, किन्तु कोई विरला भाग्यशाली जीव ही उन सत्पुरुषों के वचन मानने वाला होता है। वही अपने आप को महापुरुषों की चरण-शरण में अर्पण करता है। ऐसे जीव को महापुरुष वहां पहुँचाते हैं, जहां मालिक का धाम है। महापुरुष जिस अनामी धाम से स्वयं आते हैं, उनके चरणों में जो प्रेम-प्रतीति करता है; वे उसे प्रेम की पवित्र डोरी में खींचकर वहीं ले जाते हैं।
सत्पुरुषों का संसार में अवतरण ही इसीलिए होता है कि वे अमरवाणी द्वारा जीव को वास्तविक ठिकाने का भेद बतलाते हैं। गफ़लत और मौह के अन्धकार से निकालकर प्रेम-भक्ति का सच्चा प्रकाश प्रदान करते हैं। सच्चा प्रेम प्राप्त करने का साधन ही केवल यही है कि महापुरुषों की बाणी, उनके वचन और उनकी आज्ञा-मौज अनुसार जीवन को बनाये। सौभाग्यशाली हैं वे जीव जिन्हें सत्पुरुषों की शरण-संगति प्राप्त होती है। वे उनके बताए हुए मार्ग पर चलकर लोक-परलोक संवार लेते हैं।

Thursday, August 4, 2016

03.08.2016

1962 में जब यहां (सन्त नगर में) भी अँगूर लगाने की मौज उठी तो इस मौज ने सन् 1963 में साकार रूप धारण किया। सेवकजन दिन रात एक करके इस मौज को पूरा करने में संलग्न थे। अँगूरों के लिए गड़ढे खोदे जा रहे थे। एक दिन मौजवश श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सेवकों से प्रवचन फ़रमाए-
''सेवक का दर्जा सर्वोत्तम है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के दर्शन करने, सत्संग व आज्ञानुसार सेवा करने में बहुत लाभ है, परन्तु शर्त यह है कि जीव को कुसंग व माया धोखा न देवें। सेवक के दर्जे को प्राप्त करने के लिए, सच्चे सेवक के पद के लिए सब तरसते हैं अर्थात चाह करते हैं। यदि सैकड़ों वर्ष भी तप किया जावे तो भी सेवक का दर्जा मिलना कठिन है। परमार्थ व गुरु दरबार की सेवा का बहुत महत्व है। सेवक श्रद्धा के साथ सेवा करे, आज्ञानुसार चले और अपनी सुरति की धारा इष्टदेव के चरणों में लगाए रखे, यही सेवक का कर्तव्य है।''
बेतार का तार (Wireless) एक वैज्ञानिक अविष्कार है। इसमें जहां भी सन्देश पहुँचाना हो, किसी विशेष व्यक्ति के नाम पर एक समय में एक को ही वह पहुँच सकता है। इसके लिए विद्युत धारा तथा वायु-तरंग की ज़रूरत पड़ती है। आपमें तो वह आध्यात्मिक 'बेतार का तार' की शक्ति समाहित थी कि बिना किन्हीं उपकरणों के सैकड़ों लाखों मील दूर बैठे हुए, बिना किसी के सन्देश पहुँचाये हुए प्रेमी दिलों को बरबस खींचती थी। जिसने भी एक बार गुरु-भक्ति की अभिलाषा की, श्री आनन्दपुर के सम्राट, त्रिभुवन मोहन का नाम सुन लिया, बस! वह खिंचा चला आया। जिसने भी एक बार आपके श्री दर्शन किये, पुनः दर्शन पाने के लिए सदा व्याकुल बना रहा। जब तक उसने श्री आनन्दपुर के सम्राट को हृदय-सम्राट न बना लिया, उसे चैन कहां! उसने अपने नयनों की तृषा श्री दर्शन से बुझानी चाही, परन्तु अत्यधिक बढ़ती ही गई। इस प्रेम की सच्ची लटक से सांसारिक विषय-वासनाओं, मोह-आसक्ति आदि बन्धन से मुक्त होकर वह त्याग, वैराग्य और सेवा की मूर्ति बन गया। अब उसे जीने का ढंग आ गया। वह दुनिया में रहता हुआ भी निर्लिप्त हो गया। वह अपने वास्तविक ध्येय को पा गया।

Wednesday, August 3, 2016

02.08.2016

''प्रत्येक मनुष्य में कोई  न कोई लगन रहती है। प्रत्येक प्राणी की यह इच्छा होती है कि मैं सबसे बड़ा बनूँ, मुझे सबसे बड़ा दर्जा मिले, मेरी सबसे अधिक इज़्जत हो और मैं सुखी रहूँ। लगभग इस किस्म की इच्छाएँ हर मनुष्य में हुआ करती हैं।
      अब सोचना यह है कि सबसे ऊँचा व बड़ा पद कौन सा है! सबसे उत्तम व श्रेष्ठ वस्तु कौनसी है जिसके मिलने से यह जीव सुख का अनुभव कर सकता है, क्योंकि प्रत्येक जीव अपने इस निशाने को ध्यान में रखता है और दृढ़-संकल्प से उस चीज़ को प्राप्त भी कर लेता है। यदि मनुष्य की इच्छा हो कि मैं धनवान बनूँ, विद्या ग्रहण करूँ, डॉक्टर बनूँ या कोई और गुण ग्रहण करूँ, परन्तु यदि इच्छा के साथ दृढ़-संकल्प नहीं है तो सफलता प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात् विचारों में दृढ़ता होने से ही सफलता प्राप्त हो सकती है।
      सिकन्दर बादशाह का संकल्प समस्त विश्व को विजय करने का था। अब विचार किया जाये कि सिकन्दर  में और आम मनुष्यों के शरीर में देखने में कोई अन्तर नहीं था। अन्तर था तो केवल विचारों का, दृढ़-संकल्प का। अपने विचारों की प्रबलता से और दृढ़-संकल्प से ही वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सका था।
      अब प्रश्न यह है कि कौन-से काम की सफलता में सुख है और कौन-से काम की सफलता में दुःख, चिन्ता और कल्पना है? कौन-से काम मनुष्य को शान्ति पहुँचा सकते हैं और कौन-से काम जीव को दुःखदायी बना सकते हैं?कौन-से काम के लिए दृढ़-संकल्प करके मनुष्य को उसे प्राप्त करना चाहिए? यदि एक चोर चोरी करता है तो दृढ़ संकल्प से ही अपने काम में सफलता प्राप्त करता है। यदि दूसरे आदमी ने ईश्वर-प्राप्ति की कोशिश की तो वह अपने दढ़ संकल्प से अपने मनोरथ में सफल हो गया। अब सोचना इस बात को है कि अपने दढ़ संकल्प से, अपनी विचार शक्ति से किस काम को किया जाये जिससे मनुष्य को सुख का अनुभव हो। क्योंकि मालिक की प्राप्ति और चोरी दोनों कामों में सफलता तो दृढ़ संकल्प से मिल गई, परन्तु परिणाम दोनों का भिन्न-भिन्न है। भक्त और चोर में कितना अन्तर है? भक्त का नाम तो सब पसन्त करते हैं, परन्तु कोई भी अपने को चोर कहलवाना पसन्द नहीं करता। जितना अन्तर अर्जुन व दुर्योधन में है, उतना ही मालिक की प्राप्ति और सांसारिक वस्तुओं में है। मालिक की प्राप्ति से मनुष्य जन्म-मरण से छुटकारा पा सकता है और माया के पदार्थों एवं सांसारिक इच्छाओं से दुःख कलपना और अशान्ति खरीद सकता है। परिणाम दोनों का अलग-अलग है। यह तो कोई नहीं चाहता कि मैं दुःखी रहूँ। सब कोई सुखी होना चाहता है, मगर सुख है मालिक के नाम में, मालिक की भक्ति में, इस सुख के लिए ही दृढ़-संकल्प होना चाहिए।
।। दोहा ।।
धनवन्ते सब ही दुखी, निर्धन हैं दुख रूप ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ भेद अनूप ।।
(सन्त सहजो बाई जी)
महाभारत के युद्ध से पहले भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी से अर्जुन ने भगवान को मांगा और दुर्योधन ने भगवान से युद्ध का सामान मांगा, परन्तु महाभारत के युद्ध में विजय अर्जुन की हुई। मांगने को अर्जुन भी युद्ध का सामान मांग सकता था, परन्तु जिसको भगवान की प्राप्ति हो जाए उसे किस बात की कमी रहेगी। भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी ने युद्ध में समय-समय पर अर्जुन की रक्षा की। इसी प्रकार से मनुष्य को भी चाहिये कि वह अपने दृढ़-संकल्प को ईश्वर प्राप्ति में लगाए, तभी वह सुखरूप बन सकता है। इसलिए अपने दृढ़-संकल्प को मालिक के भजन-ध्यान की ओर लगाकर मनुष्य जन्म के ध्येय को प्राप्त करो।

Tuesday, August 2, 2016

01.08.2016

आम लोग इस लाभ-हानि को नहीं समझ सकते। इसको समझने वाले बहुत कम लोग होते हैं। इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि परमार्थ और भक्ति को समझने वाले होते तो बहुत कम हैं, परन्तु उनकी कदर व कीमत सांसारिक लोगों की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। जैसे लोहे की अपेक्षा सोना कम मिलता है, परन्तु कीमत सोने की अधिक है। जिन मनष्यों के शुभ संस्कार व क्रियमाण कर्म प्रबल होते हैं उनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। वे अपना भी सुधार कर लेते हैं और दूसरे भी उनके जीवन से लाभ उठाते हैं, जिनमें श्री पलटूदास जी, श्री चरनदास जी, श्री दादू दयाल जी, श्री रज्जब साहिब जी व सन्त सहजोबाई जी आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। इसी श्रेणी के और भी कई महात्मा और भक्त हुए हैं। इन लोगों ने भक्ति व परमार्थ के गूढ़ रहस्य को समझकर स्वयं को उस पथ पर दृढ़ किया। अब उनके इतिहास से अनेकों जीव लाभ उठा रहे हैं। यह ठीक है कि उनकी संख्या कम है, परन्तु उनकी महानता बहुत अधिक होती है। उनके नाम व काम की सब सराहना करते हैं, क्योंकि उन लोगों ने भक्ति व परमार्थ के गूढ़ तत्त्व को समझा और उसपर आचरण किया।
      समय के पूर्ण सन्त सद्गुरु ही जीव को भक्ति व परमार्थ के सार तत्त्व को समझाते हैं और उसपर अमल करने का आदेश देते हैं। गुरुमुख पुरुष ही भक्ति के गूढ़ ज्ञान को समझते हैं और उसपर अमल करते हुए अपने मनुष्य जन्म को सफल बनाते हैं। जिनको ऐसा स्वर्ण अवसर मिल जाये, वे भाग्यशाली हैं। इस मार्ग पर चलते समय माया व मन से ज़बरदस्त सामना करना पड़ता है। काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार आदि भी मन के साथी हैं। ये जीव को अपनी तरफ़ खींचते हैं। माया भी जीव को अपने झिलमिल रूप में फंसाती है, परन्तु गुरुमुख पुरुष माया के धोखे में नहीं आते ।
      ।। दोहा ।।
तीर तुपक से जो लड़ै, सो तो सूर न होय ।
माया तजि भक्ति करै, सूर कहावै सोय ।।
                              परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
उन मनुष्यों का जीवन धन्य है जिन्होंने मन-माया को जीतकर परमार्थ और भक्ति के मार्ग पर दृढ़ता से आगे की ओर कदम बढ़ाया है। यही मनुष्य जन्म का लाभ है जिसे गुरुमुख ही प्राप्त कर सकते हैं। समय के पूर्ण सद्गुरु का संसार में अवतार धारण करने का अभिप्राय भी यही होता है कि यह जीव जो काम-क्रोध-मोह-लोभ-अहंकार, मन व माया की गुलामी में जकड़ा हुआ है, इनसे छुटकारा प्राप्त करे। इसका नाम ही वास्तव में मुक्ति है। इसका दूसरा नाम गुरुमुखता है और इसी का नाम ही परमार्थ व भक्ति है। अपनी सुरति को विषय-विकारों से स्वतन्त्र कराना ही सबसे बड़ा परमार्थ है। इसलिए सन्त-महापुरुष फ़रमाते हैं कि ऐ जीव! पहले अपना परमार्थ सिद्ध करो। स्वयं को काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार के बन्धन से स्वतन्त्र कराओ। अपनी सुरति को विषय-विकारों से छुड़ाओ। तृष्णा, ईर्ष्या ने जो तुम्हें घेर रखा है, इनसे अपना पीछा छुड़ाओ। यही सबसे बड़ा परमार्थ है। परमार्थ और भक्ति पथ पर चलने वाले जिज्ञासू को मन और माया की उलझनों से बचने के लिए सन्त सद्गुरु की सहायता की बहुत अवश्यकता है। सन्त सहजोबाई जी ने गुरु की आवश्यकता के विषय में कथन किया है-
।। दोहा ।।
बार बार नाते मिलै, लख चौरासी माहिं।
सहजो सतगुरु न मिलैं, पकड़ निकासैं बाहिं ।।
सहजो कारज जगत के, गुरु बिन पूरे नाहिं ।
हरि तो गुरु बिन क्यों मिलैं, समझ देख मन माहिं ।।
सांसारिक सम्बन्ध तो पुशु योनियों में भी मिल सकते हैं, किन्तु सद्गुरु की प्राप्ति मनुष्य-जन्म में ही हो सकती है, जो इस जीव को मोह-माया के बन्धन से स्वतन्त्र कराकर जीव की आत्मा को परमात्मा से मिलने का मार्ग बताते हैं। इसीका नाम ही भक्ति है और इसे ही परमार्थ कहते हैं।
      इस प्रकार आपने श्री अमृत प्रवचनों द्वारा जन-जन को लाभान्वित किया। आई हुई संगतें श्री अमृत प्रवचन सुनने के लिए सदा उत्सुक रहती थीं। आप भी उनकी आत्मि प्यास बुझाने के लिए समयानुसार श्री अमृत प्रवचन फ़रमाते ही रहते थे। एक बार पुनः आपने यहां कृपा की और पर्व के दिन ये प्रवचन फ़रमाए-

Monday, August 1, 2016

31.07.2016

जिस स्थान पर सन्त-महापुरुष चरण-स्पर्श करते हैं, वहां की रज भी पूजनीय बन जाती है। जहां स्वयं मालिक अपनी मौज के अनुसार पावन लीलाएं करते हैं, वे स्थान स्मारक (यादगार) के रूप में सदा उनकी याद बनाए रखने के लिए प्रतीक (चिन्ह) होते हैं। यहां पर श्री दर्शन खुलने वाले कमरे के पीछे की ओर दो-तीन टाहलियों के (शीशम के) वृक्ष थे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पादशाही जी) कई बार श्री मुख से फ़रमाते थे कि जिनका सम्पर्क जिस रूप में है, सबका सद्गुरु से नाता जन्म-जन्मों से चला आता है। हम सबको पहचानते हैं, परन्तु हमें कोई नहीं पहचान सकता। इस प्रकार इन दो-तीन टाहली वृक्षों में से एक टाहली वृक्ष के नीचे सांय समय जाप करवाते तथा दोपहर समय श्री दर्शन का सौभाग्य देकर व अनुपम लीलाएँ कर दिलों को बरबस खींचते थे। प्रेमी, गुरुमुखों को श्री दर्शन करके जन्म-जन्मान्तरों के मलिन मन को धोने का सुअवसर मिल जाता और आप सेवा में होने वाली शारीरिक थकावट को अपनी अनुपम लीला दिखाकर दूर कर देते। इस प्रकार सन् 1946 से 1963 तक आप (श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी) समय-समय पर श्री सन्त नगर में कृपा करते रहे तथा इस टाहली के नीचे अनेकों बार श्री मुख से प्रवचन फ़रमाए, जिन में से केवल दो तीन सत्संग उपदेश ही यहां दिए जा रहे हैं।
      एक बार जबकि श्री सन्तनगर ख़रीदा ही था उसके कुछ समय उपरान्त यहां पर संगतें श्री दर्शन के लिए आईं। आपने प्रथम बार टाहली के नीचे विराजमान होकर श्री वचन फ़रमाए-
      "भक्ति और परमार्थ एक ऐसी वस्तु है जिसको सर्वसाधारण लोग नहीं समझ सकते। भक्ति और परमार्थ सार वस्तु है। इस सार वस्तु की परख बहुत कम मनुष्यों को है। संसार में सब लोग माया के पदार्थों, इन्द्रियों के सुखों में फँसे हुए हैं। इसलिए सुरति पर माया के पर्दे चढ़े हुए हैं और यह जीव बिल्कुल माया का रूप बन गया है। स्त्री से सम्बन्ध, बच्चों का मोह, धन एकत्र करने का विचार इस तरफ़ तो सब खुशी व रुचि से काम करते हैं और वे यह समझते हैं कि हम ठीक मार्ग पर चल रहे हैं। परन्तु वे परमार्थ की दृष्टि से वास्तविकता से दूर पड़े होते हैं। क्या परिवार के साथ सम्बन्ध व धन एकत्र करने का नाम परमार्थ है? परमार्थ की समझ व परख अथवा सार वस्तु की प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य को नहीं होती और न ही प्रत्येक मनुष्य भक्ति और परमार्थ के वास्तविक रहस्य को समझ सकता है। एक मनुष्य संसार में बहुत बुद्धिमान है, यदि उसकी सुरति धन, स्त्री-पुत्र व मान-बडाई की तरफ़ लगी हुई है तो वह परमार्थ के अभिप्राय को समझने से बिल्कुल कोरा है। मृत्यु के पश्चात ऐसे बुद्धिमान द्वारा एकत्र की हुई ये वस्तुएँ क्या उसकी सहायता कर सकती हैं या आजतक इन चीज़ों ने किसी की सहायता की है? यदि नहीं तो इनपर किसी प्रकार की आशा रखना भारी भूल है।