Sunday, July 31, 2016

30.07.2016

सन्तन का स्वभाव यह, परोपकार पथ अपनाए ।
जैसे सूरज के तेज से, सकल विश्व चमकाए ।।
कमल कुमुदिनी का नेह, गगन में सूरज व चन्दा ।
पाकर निज निज इष्ट, होत हिय अति आनन्दा ।।
अपने ही स्वभाव से, बादल मेंह बरसावे ।
पाकर स्वाँति बूँद, पपीहा प्यास बुझावे ।।
ऐसे सन्त जन जगत की, करैं सदा भलाई ।
ज्योति अनामी लोक की, अर्शों से उतर कर आई ।।
अर्थ- सत्पुरुषों का यह सहज ही स्वभाव है कि वे परोपकार के लिए ही प्रकट होते हैं। वे समान भाव से सबकी भलाई करते हैं। सूर्य अपनी रोशनी हर घर, हर स्थान पर फैलाता है और चन्द्रमा शीतलता प्रदान करता है। दोनों का अपने समय पर उदय होने से सारे संसार में प्रकाश फैल जाता है। सूर्य के उदय होने से कमल-पुष्प खिल उठता है, चन्द्रमा की शीतलता से कुमुदिनी खिल उठती है। सूर्य और चन्द्रमा से रोशनी मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ती और नही उनसे यह कहा जाता है कि अपनी किरणें इस भूमि पर फेंको, शीतलता प्रदान करो, अपितु वे स्वयं ही यह सब कुछ करते हैं। चातक मेघों से बरसने के लिए याचना करे या न करे, मेघ अपने उदार स्वभाव से जल बरसाता है। इससे चाहे कोई प्यास बुझाए, खेती करे अथवा अन्य किसी उपयोग में लगाये यह सब की अपनी इच्छा पर निर्भर है। इसी प्रकार ही सन्त महापुरुष भी सहज स्वभाव से ही परोपकार करते हैं। उन्हें इस पथ पर चलते हुए अपने पर आने वाले कष्टों की चिंता नहीं होती। वे अनवरत (लगातार) परिश्रम से जन-जन तक दिव्य ज्योति को फैलाने का भरसक प्रयत्न करते हैं। इसी पथ को स्वीकार किया हुआ था श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने। उस अमर ज्योति का प्रकाश घट-घट में जगाने के लिए उन्होंने स्थान-स्थान पर आश्रम तैयार करवाए तथा उपदेशक महात्मा भी भेजे। स्वयं भी आश्रमों का निर्माण करवाकर इस ज्योति का प्रकाश सर्वत्र फैलाया।
      आपने मुख्य केन्द्र श्री आनन्दपुर को बनाया जो युग-युगान्तरों तक सर्व प्रेमियों का मुख्य केन्द्र बना रहेगा। स्वयं भी जहां कहीं आश्रम की स्थापना करते अथवा परमार्थ के लिए जाते पुनः श्री आनन्दपुर  में ही लौट आते। समय समय पर श्री सन्त नगर पधारकर इसका निर्माण कार्य कराते। यहां पर सन् 1962 में श्री मौज अनुसार रेतीले प्रदेश में अंगूरों की बेलें लगवाईं तथा सन्तरे, पपीते आदि के बगीचे भी लगवाये। जहां तहां लम्पे (कांटे) आदि थे वहां आपने उन कांटो को साफ करवाकर निवास के लिए स्थान बढ़ाया और अंगूरों का पार्क भी बना दिया। परन्तु यहां पर परमार्थ लाभ अर्थात प्रवचनामृत  की धारा तथा श्री दर्शन का सुलभ अवसर प्रेमियों को अधिक प्रदान किये। । यह स्थान अभी भी निर्माणाधीन है, जिसे अब वर्तमान युक सम्राट श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी समय-समय पर जाकर उस कार्य की पूर्ति कर रहे हैं।

Saturday, July 30, 2016

29.07.2016

श्री सन्त नगर
उठी जब मौज परमार्थ की, नई दुनिया बसाने को ।
जन्मों से भटकी रूहों को, भक्ति मग दर्शाने को ।।
अमर ज्योति की किरणें दिव्य, घट घट में जगाने को ।
चले सम्राट आनन्दपुर के, बिछुड़ी रूहें मिलाने को ।।
      चले धरती की पुकार सुनकर, एक वन में आ पहुँचे ।
आए हैं राहनुमा बनकर, राह दिखाने आ पहुँचे ।।
अहो! यह कितना शान्त स्थल, कुदरत ने बनाया है ।
करुणा कर प्रभु ने यहाँ, श्री सन्त नगर बसाया है ।।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सन् 1946 में महात्मा सत विचारानन्द जी को अपनी मौज बताकर सब जगह पर इस अमर ज्योति का प्रकाश फैलाने के लिए उनके साथ राजस्थान में पदार्पण किया। यहां पर सब स्थानों अर्थात ज़िला धौलपुर से आगे सब ज़मीन कार पर घूमकर देखी, लेकिन सन्त महापुरुष तो सचखंड से उतरे हुए नक्शे को ही ढूँढते हैं। अतः घूमते-घूमते तहसील बाड़ी के समीप ही उन्होंने सलीमाबाद स्थान को संसार की झिलमिल से दूर शान्त एकान्त वातावरण को अपने परमार्थ का उचित स्थान समझा। तब जन कल्याण हेतु इसे खरीदने के लिए सेवकों को आज्ञा प्रदान की। श्री आज्ञानुसार सेवकों ने 3 अगस्त 1946 को इसे ख़रीद लिया। यहां पर दो-चार मकान केलव आरम्भिक निवास के लिए बनवाए और यहां आश्रम की स्थापना कर इसका शुभ नाम श्री सन्त नगर रखा। इससे राजस्थान, यू.पी., दिल्ली, पंजाब के समीप रहने वाले जिज्ञासुओं व प्रेमियों को श्री दर्शन रूपी अमृत का पान करने में सुविधा हो गई। श्री आनन्दपुर निवास इसे 'नई दुनिया' के नाम से पुकारते थे कि अब श्री सद्गुरुदेव जी महाराज 'नई दुनिया' बसाने के लिए, अपनी बिछुड़ी रूहों को मिलाने के लिए गए हुए हैं।
      यहां पर आप समय-समय पर पधार कर श्री पावन वचनामृत से सर्वसाधारण को कृतार्थ करते। सत्संग उपदेश के साथ-साथ आपने इस आश्रम में संगतों के निवास के लिए उचित स्थान (कमरे), भोजनालय (लंगर), सत्संग हाल का निर्माण करवाया जिससे दर्शनार्थी यात्रियों को असुविधा न हो। कितनी कृपालुता है सन्त महापुरुषों की कि घर बैठे ही नाम की संजीवनी तथा श्री दर्शन का अमृत जाम पिलाते हैं- हम कलियुगी जीवों को! जिस मालिक की प्राप्ति के लिए सत्ययुग, त्रेता, द्वापर में लोग हज़ारों वर्ष तपस्या करते थे परन्तु दीदार नहीं कर पाते थे, वही मालिक सन्त स्वरूप में इसी कलि के जीवों का उद्धार करने हेतु स्थान-स्थान पर ही दर्शन देकर कृतार्थ करते हैं। सन्त महापुरुषों के परोपकारों का किस प्रकार वर्णन किया जाए? सत्पुरुषों की महानता का वर्णन महाराज भर्तृहरि जी ने इस श्लोक में इस प्रकार किया है-
।। श्लेक ।।
पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति,
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम् ।
नाभ्यर्थितो जलधरोपि जलं ददाति,
सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः ।।
                        (नीतिशतक 74)

Friday, July 29, 2016

28.07.2016

एक बार 1944 में कुछ संगत श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री दर्शन के लिए आई। उनमें एक भक्त जो ऑफ़िसर था, श्री दर्शन के लिए पंजाब से आया। उस भक्त ने महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी को कहा कि मैं अपने साथ नौकर नहीं ला सका। एक नौकर का प्रबन्ध मुझे कर देवें। महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी ने कहा नौकरों का तो यहां कोई प्रबन्ध नहीं है। हम अपने शरणागतों में से एक लड़का आपकी सेवा में लगा देते हैं जो आपकी हर प्रकार की सेवा करेगा। आपको किसी प्रकार का कष्ट न होगा। यह बात होने पर महात्मा जी ने एक लड़का  उस ऑफ़िसर की सेवा में लगा दिया। वह भक्त आठ दिन श्री आनन्दपुर में रहा और वह लड़का उस भक्त का सब काम करता रहा।
      जब वह भक्त जाने लगा तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के चरणों में उपस्थित होकर काफ़ी लोगों के सामने उसने विनय की कि भगवन्! हम घर में नौकरों से काम लेते हैं, परन्तु जितनी हमें उनसे सिरदर्दी करनी पड़ती है उतना नौकर काम नहीं करते। वे वेतन भी लेते हैं फिर भी सिरदर्दी बहुत करनी पड़ती है तब कहीं उनसे काम कराते हैं। मगर यहां जिस लड़के ने आठ दिन मेरे पास काम किया है, केवल पहले दिन मैंने उसे समझा दिया कि मेरा यह काम इस समय करना है। उसके बाद प्रत्येक वस्तु मुझे तैयार मिलती रही। कमरा साफ़ करना, चाय-पानी पिलाना, बर्तन साफ़ करना, लंगर से भोजन लाना और जो काम था किसी काम के लिए मुझे दोबारा नहीं कहना पड़ा और विशेष बात यह है कि इन बच्चों के हृदय में किसी प्रकार का लोभ नहीं है। बिना स्वार्थ के काम करना ऐसा नज़ारा अपने जीवन में मुझे पहली बार देखने को मिला है। चाहे मैं ऑफ़िसर हूँ, मुझे घर में व दफ़्तर में भी नौकरों से काम करवाना पड़ता है, परन्तु पूरा वेतन लेते हुए भी वे ठीक काम नहीं करते और यहां जब एक बच्चे के अन्दर ऐसी काम करने की उमंग है तो बड़ों के विचार कितने उच्च होंगे। गीता में मैने कईं बार पढ़ा है कि भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी महाराज ने अर्जुन को निष्काम कर्म करने का उपदेश दिया है- मैं दिल में सोचता था कि इस उपदेश पर आचरण कैसे होता होगा। अब प्रत्यक्ष मैंने अपनी आँखों से देखा कि निष्काम कर्म करने का साक्षात प्रमाण यहां श्री आनन्दपुर दरबार में मिलता है। यहां सब आदमी बिना किसी सकामता के अपनी ज़िम्मेवारी को निभा रहे हैं। ऐसी ऊँची शिक्षा जो आपने यहां कि निवासियों को दी है, उससे सबके जीवन धन्य हो गए हैं। और मैंने भी इन आठ दिनों में जो बातें देखी हैं सब प्रशंसनीय हैं। सब लोग अपने कर्तव्य का पालन बहुत ही अच्छी तरह से करते हैं। एक विशेष बात यह है कि बच्चे से बूढ़े तक कोई भी निष्क्रिय (निकम्मा) नहीं रहता। किसी के कहे बिना सब अपने-अपने काम पर पहुँच जाते हैं। व्यवहार का काम करते हुए भी सबके मन में शान्ति हैं।
      इस प्रकार श्री आनन्दपुर में सन् 1939 से सन् 1946 तक आपने प्रेमी, गुरुमुख व शरणागतों में नया साहस भर कर कंटीली झाड़ियों से युक्त श्री आनन्दपुर के कुछ भाग साफ़ करवाए, निवास के लिए सुरक्षित स्थान तैयार करवाए तथा कुछ उपज भी अधिक आरम्भ हो गई। पानी की असुविधा बावलियों से कुछ सीमा तक कम हो गई। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सेव-भक्ति तथा श्री दर्शन की मस्ती में प्रेमियों को ऐसे रंग दिया कि वे अब एक क्षण भी प्राणेश प्रभु से अलग नहीं होना चाहते थे। उनका जीवन, उनके प्राण, उनके सर्वस्व, हृदय सम्राट तो आप ही बन चुके थे। आपने तो सर्व सृष्टि में परमार्थ-भक्ति का सन्देश देना था। इसीलिए आपने प्रेमियों को फ़रमाया कि हमने कुछ दिन के लिए किसी स्थान की खोज में जाना है, हम शीघ्र लौट आयेंगे। शरणागत प्रेमी इस आज्ञा को सुनकर कुछ उदास हो गये। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सबको धैर्य दिया और परमार्थ एवं भक्ति के निमित्त सर्वसाधारण के कल्याण के लिए उस भूमि की खोज के लिए प्रस्थान किया जो उन्हें आतुर स्वर से पुकार रही थी।

Thursday, July 28, 2016

26.06.2016

श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी से
श्री स्वामी जी श्री पंचम पादशाही जी का मिलाप
सन् 1942 में आप (श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी) श्री परमहंस अद्वैत मत की विराट् रूप-रेखा तैयार करने में निमग्न थे। इसी वर्ष वैशाखी के शुभ पर्व पर श्री महात्मा दयानन्द जी (जो गंधोवाल ज़िला शेखूपुरा के सत्संग आश्रम में रहते थे) के साथ श्री स्वामी जी श्री पंचम पदशाही जी महाराज प्रथम बार श्री आनन्दपुर में श्री दर्शन के लिए आए। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने आपको निहारते ही पहचान लिया तथा अपने ध्येय की पूर्ति होते देख अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। मानो आज आपकी विराट् रूपरेखा का अति महत्वपूर्ण भाग पूर्ण हो गया। आपने अपने ही तदरूप सर्वगुण-सम्पन्न शिष्य को अपने सम्मुख बिठाकर भजनाभ्यास की समस्त युक्तियां अर्थात सहज-समाधि, अजपा-जाप, अनाहत-शब्द (सुरत-शब्द-योग) की युक्तियां बताईं एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।
      जिस प्रकार नदियां समुद्र से मिलकर विश्राम पाती हैं, इसी प्रकार श्री पंचम पादशाही जी महाराज ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही जी) को प्राप्त कर अपूर्व आनन्द अनुभव किया।
      श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के पावन श्री दर्शनों की चाह आपको हर समय उन्मत्त बनाये रखती। आप समय-समय पर श्री आनन्दपुर आकर श्री दर्शन और पावन सेवा का लाभ उठाते। आपके हार्दिक प्रेम-भक्ति, दृढ़निष्ठा और सेवा को देखकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही जी) अत्यन्त प्रसन्न होते। आपकी जीवन झलकियां आगे आपके जीवन-चरित में दी गई हैं।
      सन् 1942 में व्यासपूजा पर्व पर पंजाब, सिन्ध तथा सीमाप्रान्त की काफ़ी संगत श्री दर्शन के लिए श्री आनन्दपुर आई। श्री दर्शनों पर आई हुई संगत ने श्री चरणों में विनय की-" भगवन! वहां की शेष संगत जो किसी कारणवश यहां नहीं आ सकती- जैसे पानी के बिना खेती सूख जाती है, ऐसे ही वहां की संगत आपके श्री दर्शन व श्री अमृत वचनों के बिना सूखती व कुम्हलाती जा रही है।" इसपर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने मुसकुराते हुए फ़रमाया कि जो संगत यहां आई है, वह यहां से हरी-भरी (प्रसन्न) होकर जा रही है। जो संगतें यहां नहीं आ सकतीं, उनकी सुरति हमारी ओर लगी हुई है और अपनी रूहानी ख़ुराक यहां से ले रही है। वे रूहें कुम्हलाती नहीं हैं, अपितु हरी-भरी हो रही हैं अर्थात उन्हें अधिक लाभ पहुँच रहा है, क्योंकि उनका ध्यान हमारी ओर लगा हुआ है।
      जिसकी सुरति का लगाव जिस ओर अधिक हो, उसे वह वस्तु अवश्य ही प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार वे अपनी सुरति की तार को सद्गुरु के श्री ध्यान में विलीन कर ख़ुराक प्राप्त करते हैं। इस प्रकार दोनों को रूहानी भोजन मिल रहा है। अर्थात श्री सद्गुरुदेव महाराज जी गुप्त रहस्य से दर्शा रहे थे कि सद्गुरु के भी दो रूप होते हैं। एक स्थूल दूसरा सूक्ष्म। स्थूल रूप तो नर-देह को धारण कर वे हमारे सम्मुख प्रकट होते हैं और सूक्ष्म रूप से जहां भी उन्हें स्मरण किया जाए वे सदा साथ रहते हैं, अंग-संग हैं। एक क्षण भी विलग नहीं हो सकते। इस प्रकार से वे अपने प्रेमियों की प्यास गुप्त तथा प्रकट दोनों रूपों से बुझाते हैं। वह संगत प्रवचन श्रवण कर कृत्यकृत्य हो गई। इस पर्व के कुछ दिन पश्चात समस्त संगत श्री आज्ञानुसार अपने-अपने स्थानों पर लौट गई।

Tuesday, July 26, 2016

25.06.2016

आपने श्री आनन्दपुर के शरणागतों के हृदय में निष्काम-कर्म की भावना कूट-कूट कर भर दी। कई जिज्ञासू श्री दर्शन के लिए आते तो यहां के शरणागतों के कर्मण्य जीवन को देखकर दंग रह जाते। सभी प्रेमी शरणागत श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की श्री आज्ञा उनकी प्रसन्नता का पात्र बनने के निमित्त निष्काम-भाव से सेवा करते। ऐसा ही चकित कर देनेवाला कार्य राजस्व मन्त्री ने भी देखा जिसका वृतान्त यों है-
1941 में ग्वालियर राज्य की ओर से एक राजस्व मन्त्री (Revenue Minister) चक श्री आनन्दपुर, चक शान्तपुर तथा चक दयालपुर के निरीक्षण के लिए आये। श्री सद्गुरुदेव जी ने जहां तक रास्ता साफ़ था, कार पर जाने का प्रबन्ध कराया। जहां रास्ता ऊबड़-खाबड़ था, वहां पर बैलगाड़ी द्वारा जाने का प्रबन्ध किया। जब राजस्व मन्त्री आये तो महात्मा पूर्ण श्रद्धानन्द जी कार में मन्त्री महोदय को बैठाकर वहां तक ले गये, जहां तक कार जा सकती थी। खराब रास्ते तक पहुँचकर कार को रोक दिया गया। वहां बैलगाड़ी खड़ी थी। मन्त्री महोदय कार से उतर कर बैलगाड़ी में बैठ गये। महात्मा पूर्ण श्रद्धानन्द जी बैलगाड़ी चलाने लगे। जब मन्त्री महोदय ने देखा कि वही कार चालक बैलगाड़ी चलाने लग गया है तो उनके आश्चर्य की कोई सीमा न रही। वह चुपचाप चकों का निरीक्षण करते रहे।
      चकों का निरीक्षण करने के बाद मन्त्री महोदय ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री दर्शन की इच्छा प्रकट की। सेवकों ने आपके श्री चरणों में विनय की। विनय स्वीकार हुई। मन्त्री महोदय जब हुज़ूरी में उपस्थित हुए तो उन्होंने अपनी हैरानी को प्रकट किया कि आज मुझे एक ऐसी नई बात देखने में आई है जो मैने अपने जीवन में नहीं देखी। हम प्रायः यह देखते हैं कि अफ़सरों के जो कार ड्राइवर होते हैं, वे कार चलाने के अतिरिक्त कार की सफ़ाई तक हाथ से नहीं करते। कार को झाड़ने-पोंछने के लिए उन्हे अलग से एक नौकर देना पड़ता है और आपका ड्राइवर पहले कार चला रहा था और फिर वही आदमी बैलगाड़ी चलाने लगा। इतनी ऊँची शिक्षा विश्व भर में कहीं देखने या सुनने में नहीं आई है। कार का चालक हो और उसके दिल में तनिक भी अभिमान न हो, यह मेरे लिए बहुत हैरानी की बात है।
श्री आनन्दपुर से विदा होने के बाद वही मन्त्री साहिब ग्वालियर राज्य में पहुँचे तो ग्वालियर राज्य के सब मन्त्रियों की मीटिंग में उन्होंने यह बात सबको बताई कि श्री आनन्दपुर वालों के दिल में सब प्रकार के कार्यों के लिए समभाव है। यही निष्काम-भावना हमारे देश के सब लोगों में आ जाये तो देश की काया ही पलट जाये। हमारे नौकर तो बिना कहने के किसी काम को करते ही नहीं, फिर कार का ड्राइवर दूसरे काम को कब करने लगा है। और श्री आनन्दपुर में तो कार के ड्राइवर के लिए कार चलाना और बैलगाड़ी चलाना एक बराबर है। इस बात की ग्वालियर राज्य में काफ़ी दिनों तक चर्चा होती रही।
      राजस्व मन्त्री के प्रस्थान करने के बाद श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सब सेवकों को इस विषय में श्री प्रवचन फ़रमाये- "गुरुदरबार में सेवक को समभाव से सेवा करनी चाहिए। ऊँचे पद का कोई काम हो, चाहे बर्तन साफ़ करने या झाड़ू लगाने की सेवा हो, मन में किसी प्रकार का ख़्याल नहीं आना चाहिये। तब सेवा करने का लाभ है। अपने मन पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है और दूसरे पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है। राज्सव मन्त्री का प्रमाण देते हुए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया कि मन्त्री साहिब कितने अच्छे ख़्याल यहां से लेकर गए है। सेवक की सब कामों में समानता होनी चाहिये। किसी प्रकार की भी सेवा करने से मन में अहंकार नहीं आता। गुरु दरबार में सब सेवा बराबर हुआ करती हैं। किसी सेवा को अच्छा समझना, किसी सेवा को छोटा समझना- यब सब मन का धोखा है। इस मन के धोखे से ही तुमको बचना है। इसमें तुम्हारा भी लाभ है और देखेने-सुनने वालों का भी। जिस सेवा को करने के लिए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की आज्ञा हो, उसे करने के लिए सहर्ष और निःसंकोच तत्पर रहना चाहिए।"

Monday, July 25, 2016

24.07.2016

जिस प्रकार ऊँची नीची घाटियों, कंटीली झाड़ियों से युक्त असम भूमि पर चलकर मंज़िल को पाना समतल भूमि पर चलकर प्राप्त करने की अपेक्षा कठिन है, इसी प्रकार गुरु-सेवा बिना मन को शुद्ध करना कठिन है। गुरु-सेवा एक समतल पगडंडी है जिसपर चलकर जीव अपने लक्ष्य को सरलता से प्राप्त कर सकता है। इस सेवा के साथ-साथ दोनों समय प्रातः व सायं 'नाम' का अभ्यास करवाना आपका नियम था। कितनी करुणा होती है सन्त-महापुरुषों के दिल में हम जीवों के प्रति। परोपकारिता के स्वरूप होते हैं महापुरुष। इसका अनुमान लगाना जीव की बुद्धि से परे की बात है। नाम है गुरु-सेवा, कल्याण है हमारा। श्री आनन्दपुर की रचना क्या केवल उन्होंने अपने लिए की? नहीं, इस आलीशान उच्च दरबार की रचना उन्होंने हम जैसे अधम जीवों को सन्मार्ग पर लगाने के लिए की ताकि युग-युगों तक माया में भटके प्राणी यहां से रोशनी प्राप्त कर अपने ध्येय को प्राप्त कर सकें। उन्होंने अनेकों कष्ट सहे तो केवल इसीलिए कि प्राणिमात्र का कल्याण हो सकें। अनामी लोक को छोड़कर आए तो केवल इसीलिए कि वे अपनी रूहों को कुपथ पर जाते हुए नहीं देख सकते थे। उन्होंने जीवों की करुण और आतुर पुकारों को सुनने के लिए यह रचना रचाई। देखो! कैसी धरती के भाग्य जगाए जहां पानी भी सुलभ नहीं था। यदि वर्षा होती तो झोंपड़ों को बहाकर ले जाती। यदि गर्मी की ऋतु आती तो पीने के लिए पानी मिलना भी दूभर हो जाता।
      मई सन् 1941 में एक बार महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी, महात्मा योग आत्मानन्द जी, महात्मा अखण्ड प्रकाशानन्द जी, महात्मा योग प्रकाशानन्द जी, महात्मा रोशनानन्द जी व कुछ अन्य भक्तजन कुएँ पर स्नान के लिए गए। कुएँ से पानी निकालने लगे तो कुएँ को बिल्कुल सूखा हुआ पाया। कन्धे पर कपड़े रख कर घर की राह ली। पीछे से आप (श्री सद्गुरु दीन दयाल जी) की कार आ गई। आपने कार रुकवा कर पूछा- क्यों किधर से आ रहे हो? महात्माओं ने विनय की- करुणेश! स्नान के लिए गए थे, पानी न होने से लौट आये हैं। श्री वचन हुए- "घबराने की ज़रूरत नहीं, यहां तो एक दिन ऐसा आएगा जब घर घर में नल व टोंटियां होगी। सरकारी नल तो समयानुसार पानी देते हैं, यहां चौबीस घण्टे पानी नलों में आएगा। यहां पानी इतना होगा कि गर्मी की ऋतु में भी कुएँ और तालाब भरे हुए दिखाई देंगे।" यह सब कुछ उस समय स्वपन की तरह लगता था। इस मनोहर वचनों में खोए-खोए प्रेमी उस समय की बाट जोहते कि कब ये श्री वचन अपना रंग लाएँगे। आज वे वचन साकार रूप में सबके सम्मुख प्रकट हैं। यह सब कुछ हम जीवों के कल्याण के लिए नहीं हुआ तो और किसलिए किया गया?

Sunday, July 24, 2016

23.07.2016

जब वे श्री आनन्दपुर में आये तो श्री चरणों में विनय की । श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया-" जीव ने जो पिछले जन्म में कर्म किए हैं, उनका फल तो भुगतना ही है। अन्तर केवल यही है कि सन्त-महापुरुषों की चरण-शरण लेने से वे कर्म सूली का कांटा बन जाते हैं व सन्त महापुरुषों की संगति से निष्काम कर्म किये जाते हैं ताकि अगले जन्म में पुनः इन कष्टों को सहन न करना पड़े।"
श्री आनन्दपुर में महात्मा ज्ञान अमरानन्द जी की मरहम पट्टी की गई। कुछ लोगों ने उन्हें पुनः तासबावली जाने के लिए मना किया। महात्मा जी का दिल दुबिधा में पड़ गया कि क्या किया जाय। वे इसी सोच में थे कि उसी दिन रात्रि के समय निज मौज के अनुसार आपने प्रवचन फ़रमाये-
" प्रत्येक काम नेकनीयत, सच्चाई और खैरख्वाही के साथ किया जाये। सेवक सेवा करता जाये और परिणाम को न देखे। कोई कष्ट, दुःख अथवा हानि हो तो घबराना नहीं। सुख और दुःख दोनों हालातों में समान रहे। यानि इन्सान को दुःख और सुख दोनों का मुकाबला करना पड़ता है। सुख के समय उसमें फँसने की अपेक्षा आगे बढ़ता जाए और दुःख में घबराहट से दूर रहे।
      पूर्ण विश्वास से सेवा करता चले। दुःख और सुख दोनों परीक्षाएँ हैं। जितने दर्जे की भक्ति होगी उतनी सख़्त परीक्षा होगी यानी उतना अधिक कष्टों का सामना करना पड़ेगा। सेवक को हर्ष-शोक, निन्दा-स्तुति, दुःख-सुख सबमें बराबर रहना चाहिए।
      पुनः फ़रमाया कि सद्गुरु तो सबको दात बख़्शते हैं, आगे अपने पात्र पर निर्भर है। जितना जिसका पात्र होगा उतना वह प्राप्त करेगा। जैसे तेल की एक बूँद जल में डालने से वह फैल कर कई प्रकार के रंग पैदा करती है, इसी प्रकार ऐसा पात्र यानी बुद्धि जितनी भी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के वचनों पर आचरण कर वचनों को ग्रहण करेगी उतना अधिक लाभ प्राप्त कर सकने में समर्थ होगी। इसलिए नेकनीयत-सच्चाई के साथ कर्म करो। दुःख-सुख, निन्दा-स्तुति में सम रहना सेवक का धर्म है।
आपने ये प्रवचन अपनी मौज में फ़रमाए। प्रेमियों गुरुमुखों के हृदय इन वचनों को श्रवण कर शीतल शान्त हो गए। महात्मा ज्ञान अमरानन्द जी श्री चरणों में वन्दना कर तासबावली की सेवा के लिए आज्ञानुसार चल दिये। नए उत्साह से सेवा में जुट गए।
इसका अर्थ यह नहीं कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने केवल श्री आनन्दपुर की बंजर भूमि को आबाद करना, घने वनों को साफ़ कर उद्यान बनाना, भव्य भवनों का निर्माण करना ही गुरु-भक्ति का लक्ष्य बताया, अपितु उन्होंने एक अनोखे ढंग की गुरु-भक्ति की धारा प्रवाहित की। उन्होंने तो निष्काम-कर्मयोग का पाठ पढ़ाया। जैसे प्यासे को पानी, अत्यन्त भूखे को भोजन, अत्यन्त थके हुए शरीर को पत्थरों पर निद्रा करने का आनन्द आता है, उसी प्रकार जन्म-जन्मांतरों से माया के पंजे में आए हुए मन को गुरु सेवा से शुद्ध कर 'शब्द' रूपी आनन्द प्रदान किया। सेवा से मन शुद्ध होकर जब उसे भजन पर बिठाया तो मन अपने आप ही उस आनन्द में डूब गया, जिसका अनुभव केवल वही प्रेमीजन ही कर सकते हैं जिन्होंने इस मार्ग को अपनाया।

Saturday, July 23, 2016

22.07.2016

कुछ सेवक तो आपका आश्रय लोकर अपने-अपने चकों पर श्री आज्ञानुसार चल दिए। कुछ एक ने विनय की कि प्रभो! इतने घने वन में हिंस्न पशुओं से हमें भय लगता है। कभी-कभी जब उन पशुओं के दहाड़ने की आवाज़ आती है, तो मन दहल उठता है। भय-भंजन श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया- "जिस के पास सद्गुरु का शब्द है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं है। जब भी जहां भय होने लगे श्री सद्गुरुदेव जी का ध्यान करो। वे आपके सदा अंग-संग हैं। श्री परमहंस दयाल जी की शक्ति आपके साथ है, घबराने की कोई ज़रूरत नहीं। निर्भय होकर कार्य करो। सद्गुरु सदा अंग-संग हैं।" श्री आज्ञा पाकर सभी सेवक अपनी-अपनी सेवा में जुट गये।
      एक बार चक तासबावली (हरिनगर) पर महात्मा गोपाल श्रद्धानन्द जी, महात्मा ज्ञान अमरानन्द जी तथा कुछ अन्य एक दो सेवक श्री आज्ञानुसार सेवा कर रहे थे। वे दिन के समय तो वहां सेवा करते और रात्रि के समय शान्तपुर लौट आते। कुछ दिन तो उन्होंने ऐसे ही किया। सात-आठ दिनों के पश्चात वे परस्पर परामर्श कर वहीं रहने लगे। रात्रि के समय चारों ओर टांचियों का गोल घेरा बनाकर बीच में आग सुलगा कर उसके किनारे सो जाते। एक बार रात को जब सब को नींद आ गई तो आग भी सुलगते सुलगते बुझ गई। एक सिंह उस घेरे में घुस आया, जिसके आने की किसी को भी आहट न हुई। वह सिंह एकदम महात्मा ज्ञान अमरानन्द जी के वक्षःस्थल (छाती) पर खड़ा हो गया। अचानक उनकी चीख़ निकली। चीख़ को सुनकर महात्मा गोपाल श्रद्धानन्द जी (जो पास ही सोए हुए थे) उठे और सिंह को एक मुक्का दे मारा। भय के मारे वह सिंह भाग खड़ा हुआ। कोई जन-हानि तो न हुई, परन्तु पंजे का निशान उनके वक्षःस्थल पर छप गया।
      अब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की कृपा की ओर ध्यान दिया जाए तो क्या उनसे कोई उऋण हो सकता है? सोचने की बात है कि क्या सिंह भी कभी एक मुक्के से डरा? यह तो उस प्रभु की असीम कृपा थी। वे पूर्ण सद्गुरु के सेवक थे। आज्ञापालन करने में जो सुख है, वह अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता। परमसन्त कबीर साहिब जी भी फ़रमाते हैं-
।। दोहा ।।
गुरु को सिर पर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं ।
कहै कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहिं ।।

Friday, July 22, 2016

21.07.2016

एक भक्त था। उसने एक बार श्री मुख से ये वचन सुने कि जो कोई गुरु को प्रसन्न करना चाहता है, वह दिल-जान से सेवा करे। ऋद्धियां-सिद्धियां उसके चरणों में स्वयं भागती हुई आती हैं। शारीरिक भरण-पोषण की उसे चिन्ता ही क्या? उसका भार तो गुरु-दरबार ने आरम्भ से ही अपने पर ले लिया है। बस फिर क्या था, वह सेवा में ऐसा जुटा कि उसे यदि कोई बुलाता तो वह उत्तर देता मेरे पास समय नहीं है। यदि उसे कोई आराम करने के लिए कहता तो यही उत्तर मिलता कि मेरे पास समय नहीं है। एक दिन अचानक श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कार लेकर दोपहर के समय वहां गए। सभी प्रेमी भोजन कर के तनिक विश्राम के लिए छुट्टी किए बैठे ते। उसने भी भोजन खाया और पुनः सेवा में जुट गया।
      आपने वहां पहुँच कर सबको भोग प्रसाद दिया। तब भक्त जी को भी आवाज़ लगाई। उसे सेवा में यह पता ही न चला कि कौन आवाज़ लगा रहा है। उसने वही उत्तर दिया- "मेरे पास समय नहीं है।" आप सेवा में उसकी ऐसी तल्लीनता को देखकर अतयन्त प्रसन्न हुए और स्वयं वहां उसके पास प्रसाद भेज दिया। उसकी इस श्रद्धा, निष्ठा तथा सेवा को देखकर आपने फ़रमाया-" जो व्यक्ति हित-चित्त से, श्रद्धा से गुरु-दरबार की सेवा करता है, वह अपनी मंज़िल को शीघ्र ही प्राप्त कर सकता है।" पुनः उसे समीप बुलाकर खूब प्रसाद दिया और फ़रमाया- ठीक है। मानव जन्म के इस सुदर्लभ अवसर से पूर्ण लाभ ले लेना चाहिए। सेवक के लिए गुरु-सेवा ही अपनी निजी पूँजी है जितनी चाहे एकत्र कर ले। एक मिनट भी व्यर्थ नहीं गँवाना। हर समय अपनी सुरति को गुरु-शब्द में तथा शरीर को गुरु-सेवा में लगाये रहने से ही चित्तवृत्तियां एकाग्र होकर ध्येयको प्राप्त करती हैं। यही गुरुमुख का आपना काम है। वह भक्त प्रसाद लेकर व श्री वचन श्रवण कर नत-मस्तक हो पुनः अपनी सेवा पर लौट गया।
      अब जो परिवार 1936 के पश्चात् श्री चरणों में शरणागत हुए, उनमें भक्त लोगों ने श्री चरणों में साधुवेष के लिए विनय की। आपने अधिकारी गुरुमुखों को साधु वेष दिया। जिस दिन भी जिस गुरुमुख को साधु वेष दिया जाता उनके समस्त परिवार की खुशी की सीमा न होती। आप स्वयं भी अत्यधिक प्रसन्न होते, क्योंकि आप अपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री दूसरी पादशाही जी) की मौज को साकार रूप में देखकर प्रसन्न होते। कुछ समय तो नए शरणागतों को इकट्ठा एक स्थान पर रखकर उनको सहयोग, सुमति, निष्काम सेवा तथा भक्ति का पाठ पढ़ाया, पुनः जब उन्हें इन सब गुणों पर आचरण करते हुए देखा तो प्रत्येक चक पर दो-तीन महात्मा भेज कर प्रत्येक स्थान की सुव्यवस्था आरम्भ करवाई ।

Thursday, July 21, 2016

16.07.2016

आपने श्री आनन्दपुर की रूपरेखा श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) के वचनानुसार बनाई कि सारे वन को काट कर फलदार वृक्ष, लहलहाते खेत, पुष्प-सुरभित उद्यान एवं भव्य भवन होने चाहियें। गुरुमुख प्रेमी व नये शरणागत भक्ति व आज्ञा की सीढ़ी पर कदम रख चुके थे। वे श्री आज्ञा के लिए सदा तत्पर रहते। आपने भी सम्पूर्ण ध्यान श्री आनन्दपुर के निर्माण में केन्द्रित कर लिया। अब झोंपड़ियों के स्थान पर पत्थरों के मकानों की रचना आरम्भ हो गई। साथ ही साथ भूमि साफ़ कर शरणागतों की आवश्यकता पूर्ति के लिए अन्न बोया जाने लगा। प्रथम खेती बैलों द्वारा हल चलाकर की जाने लगी। धीरे-धीरे सब साधनों में विकास होता गया। सब सुख के साधन यहां सुलभ होने लगे।
      सर्वप्रथम यहां पानी की कमी अनुभव हुई। यहां एक सरकारी कुआं था जो गर्मियों में सूख जाता था। इस कमी को पूरा करने के लिए पानी दो-तीन मील पर स्थित कुलवार चक तथा शान्तपुर चक से टंकियों द्वारा लाया जाता था। बाल्टियों व मटकों से पौधों को पानी दिया जाता। इस विचित्र लीला को देखकर प्रेमी दंग थे कि कैसे यहां जीवन के साधन सुगम हो सकते हैं। उस समय शारीरिक भरण-पौषण की आवश्यक सामग्री यहां से तीन मील की दूरी पर स्थित ईसागढ़ से लाई जाती थी। अब अपने यहां (श्री आनन्दपुर में) ही उपज आरम्भ कर दी गई। कभी-कभी सेवक यदि बंजर और पथरीली भूमि को खोदने से घबरा जाते तो आप उनको उपदेश देकर उत्साह बढ़ाते ।
।। दोहा ।।
अलट राज महाराज का, जा में अटक बहाय ।
जाके मन में अटक है, वो ही अटक रह जाय ।।
      इस प्रकार से सेवक प्रेमी गुरुमुख व शरणागत सेवा में जुट जाते। इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में निवास स्थान, उपज व उद्यानों के लिए भूमि साफ़ हो गई। चारों और पक्की चारदीवारी (कोट) बन गई। अब झोंपड़ियों के स्थान पर चिनखारी व ईंटों के मकान दिखाई देने लगे। कुछ-कुछ हरियाली के चिन्ह झलकने लगे। उस समय शरणागतों की संख्या भी गिनी चुनी ही थी। मध्य प्रदेश में आना सिन्ध व पंजाब के लोगों को ऐसे मालूम होता था जैसे विदेश। फिर भी श्री दर्शन के लिए अत्यधिक श्रद्धालु तथा प्रेमीजन आते ही थे। यहां  आरम्भ में केवल श्री व्यासपूजा का एक ही पर्व मनाया जाता था। यहां के शरणागतों का जीवन देखने में चाहे साधारण व कठिन था, लेकिन ऐसा जीवन तो किसी भाग्यशाली को ही प्राप्त होता था। कितना आनन्दमय जीवन था उनका, कितने भाग्य थे उन जीवों के जो उस समय शरण में आए। त्रिलोकीनाथ, हृदय सम्राट, श्री सद्गुरुदेव जी सन्त रूप में साथ रहते, अनुपम लीलाएँ करते, निज कर-कमलों से भोग-प्रसाद हर सयम खिलाते, समीप बैठा कर श्री दर्शन से आनन्दित करते। जहां-जहां प्रेमी सेवा करते वहीं स्वयं चल कर जाते। जिन योग-योगीश्वर को योगी-तपस्वी जंगल में, पानी में खड़े होकर, उलटे लटक कर प्राप्त करना चाहते हैं, वे कृपा-सागर प्रभु प्रेमियों के पाश में बँधे हुए यहां विराजमान होकर श्री दर्शन से कृतार्थ करते।

Saturday, July 16, 2016

15.07.2016

अब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही जी) ने शरणागति का मार्ग खोल दिया। आपने जन-जन में इन अमृत वचनों का प्रभाव भर दिया तथा श्री कृष्णचन्द्र जी महाराज व श्री रामचन्द्र जी के सिद्धान्त व नियमों को पुनः दोहराया। आप स्वयं निज मुख से फ़रमाया करते थे- "जो जीव एक बार पूर्ण गुरु की शरण में आ जाता है, उसे काल व माया धोखे में नहीं डाल सकते; उसे धर्मराज व यमदूत का भय नहीं रहता।
श्रीरामचन्द्र जी महाराज ने भी फ़रमाया है-
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ।।
(वाल्मीकि रामायाण) 06/18/33
मेरी शरण में आने के लिए जो एक बार दिल से यह कह देता है कि हे नाथ! मैं आपका हूँ तो मैं उसे सर्व भूतों से निर्भय कर देता हूँ।
श्री कृष्णचन्द्र महाराज जी ने परम सखा अर्जुन को भी यही उपदेश दिया है-
।। शेअर ।।
दिल से तू मेरे ह्वाले कर तमाम अफ़आल को ।
बे-ख़तर और बे-तमन्ना जंग में मश्ग़ूल हो ।।
मेरी इस तल्क़ीन के जो बे-तअस्सुब आदमी ।
दिल से पैरो है उन्हें हासिल है दायम मख्लसी ।।
मख़्ज़ने-असरार 3/30-31
हे अर्जुन! तू अपने सभी कर्मों को मेरे हवाले करके निर्भय और कामना-रहित होकर संग्राम में भाग ले, क्योंकि जो पक्षपातरहित होकर मेरे इन वचनों को दिल से मानकर उसपर अमल करता है, वह सदा कालचक्र से मुक्त रहता है।
यहां श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने माया तथा भक्ति के संघर्ष से जूझने के लिए यही उपदेश दिया कि यदि सब इच्छाओं का त्यागकर शुद्ध मन से शरण ग्रहण करो तो सद्गुरु तुम्हें समस्त चिंताओं से विमुक्त कर देंगे। दूसरे शब्दों में- "मन की साधना और वैराग्य- दोनों शरणागति के अभिन्न अंग हैं।" मन को साधने के लिए आपने गुरु-आज्ञा और गुरु-सेवा को आवश्यक बताया जिसका नाम गुरु-भक्ति है और आत्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए आन्तरिक शब्द की कमाई अर्थात् भजन-अभ्यास दोनों पर बल दिया है। सत्पुरुषों के वचन हैं-
मोटे बन्धन जगत के, गुरु भक्ति से काट ।
झीने बन्धन चित्त के, कटैं नाम परताप ।।
कई प्रेमी जो इस भक्ति के इच्छुक थे, श्री अमृत प्रवचनों को श्रवण करते ही तथा श्री दर्शन की मनोहारी छटा को निहारते ही प्रेमी बन गये। वे श्रीचरणों में सर्वस्व समर्पण करने के लिए विनय करने लगे। आपने उनकी विनय स्वीकार कर श्री चरणों में स्थान दिया। इस प्रकार से कुछ परिवारों ने आपके श्री चरणों में सर्वस्व समर्पित कर शरणागति प्राप्त की तथा श्री दरबार में रहकर हित-चित्त से सेवा करने लगे।

Friday, July 15, 2016

14.07.2016

सन् 1936 में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने श्री आनन्दपुर में निवास करने वाली बाइयों (स्त्रियां साधु वेष में) को चकौड़ी सन्त आश्रम में बुलाकर विभिन्न स्थानों पर सत्संग-प्रचार के लिए भेज दिया था। अब सन् 1940 में जबकि आप श्री आनन्दपुर में विराजमान थे तो एक प्रेमी ने आपके श्री चरणों में विनय की- "प्रभो! क्या इस देश में हम फिर साधु मण्डली को इन आँखों से देख पाएँगे? आपने फ़रमाया- "ऐसी क्या बात है। यहां तो एक समय ऐसा आयेगा, जबकि सबके नाम के (अर्थात जड़ तथा चेतन के नाम के) अन्त में 'आनन्द होगा अर्थात चेतन (मनुष्य रूप में) सभी साधु होंगे था यहां की प्रत्येक जड़ वस्तु अर्थात पाठशाला, प्रेस आदि सबके साथ आनन्द होगा। यहां पर बहुत रौनक होगी।" वह प्रेमी यह सब सुनकर हैरान हो गया कि कौन संसार की झिलमिल को छोड़कर इस सूनेपन को स्वीकार करेगा। उसे क्या मालूम कि मायापति जिधर भी संकेत करें, माया की रचना सब पीछे-पीछे चली आती है। यह तो उनके लिए साधारण-सा काम है।
      सचमुच आज ये सब कुछ हमारे सामने प्रकट रूप में है। जिस प्रेमी गुरुमुख को श्री सद्गुरुदेव जी साधु-वेष प्रदान करते हैं, उसके नाम के अन्त में 'आनन्द' अवश्य होता है। श्री आनन्दपुर में अन्य नाम जैसे आनन्द माध्यमिक विद्यालय, आनन्द धाम, श्री आनन्दसर, आनन्द प्रिंटिंग प्रेसादि सब वस्तुओं के नाम भी 'आनन्द' पर रखे जाते हैं। ठीक ही तो है जहां हर समय आनन्द बरस रहा हो, वहां आनन्द के अतिरिक्त और नाम आयेगा भी कहां से?

Thursday, July 14, 2016

13.07.2016

सन्त महापुरुषों की श्री मौज को समझना जीव-बुद्धि से परे है। जब तक कि वह स्वयं किसी भी रहस्य को जीव पर प्रकट न करें, जीव अपनी विचार शक्ति से उसे नहीं समझ सकता। उनकी प्रत्येक मौज में कोई न कोई गुप्त भेद छुपा हुआ होता है। इस तरह से देश-विभाजन के सम्बन्ध में तीन-चार बार ऐसे रहस्य भरे संकेत श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने किये थे, परन्तु उनको कोई भी समझ नहीं सका। आपने स्थान लक्खी ज़िला सक्खर (सिन्ध) में एक स्थान बहुत पहले बनवाया था। उसके साथ ही कुछ भाग 1937 में बढ़ाया गया। जब आपने नवम्बर 1939 में श्री आनन्दपुर में कृपा की तो उस समय पकी श्री मौज यह हुई कि लक्खी में जो आश्रम का भाग अभी-अभी बनवाया है, उसका सब सामान दरवाज़े, खिड़कियां, गार्डर इत्यादि श्री आनन्दपुर लाया जावे। सन् 1940 में महात्मा योग रोशनानन्द जी को श्री सद्गुरुदेव महाराज जी किसी काम से सिन्ध भेज रहे थे। आपने महात्मा जी को फ़रमाया कि नये मकान का सब सामान यहां (श्री आनन्दपुर) लाना है। महात्मा योग रोशना नन्द जी लक्खी जाकर महात्मा भक्ति ध्यानानन्द जी को यह श्री आज्ञा सुनाकर श्री आनन्दपुर लौट आये। जब महात्मा भक्ति ध्यानानन्द जी, महात्मा अमर प्रेमानन्द जी व लक्खी निवासी भक्तों ने यह बात सुनी तो बहुत हैरान हुए कि अभी तो इस मकान को बने तीन साल भी नहीं हुए, इस मकान को गिराने की क्यों श्री मौज हुई। परन्तु श्री आज्ञा शिरोधार्य कर उस मकान को गिराकर लोहे व लकड़ी का सब सामान रेलगाड़ी द्वारा श्री आनन्दपुर भेज दिया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी इस गुप्त भेद को जानते थे कि कौन-सा कार्य किस समय से सम्बन्ध रखता है। एक-दो सेवकों ने इस मकान के विषय में श्री चरणों में विनय करके पूछा, परन्तु श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने कोई भी उत्तर न दिया। यह रहस्य देश-विभाजन को बाद  सबको पता लगा कि इस सामान के यहां मंगवाने की क्यों श्री मौज हुई। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी का यह अभिप्राय था कि  जो कुछ भी परमार्थ हेतु लग जाए वही अच्छा है। परन्तु उस समय सन् 1940 में सब हैरान थे। सत्य है कि जीव अपनी बुद्धी से उनके किसी रहस्य को भी नहीं समझ सकता।
1930 से 1939 तक श्री आनन्दपुर में शरणागत परिवारों ने निवास के लिए केवल थोड़ा-सा टुकड़ा साफ़ कर झोपड़ियाँ बनाई थीं। स्थान-स्थान पर आक, तेन्दू, ढाक, पलास, कीकर आदि के घने वन थे व साथ में पथरीली धरती तथा ऊँचे-ऊँचे ढोंगे। आपने सर्वप्रथम सन् 1939 में यहां विराजमान होकर निवास स्थान का क्षेत्र बढ़ाने के लिए कँटीली झाड़ियों और आक-तेन्दू आदि के पौधों तथा वृक्षों को कटवाना प्रारम्भ किया। सभी लोग यह देखकर हैरान थे कि इस जंगल को कैसे आबाद किया जाएगा। धीर-धीरे सब की रुचि बढ़ती गई और सबने इस सेवा में भाग लिया। शरणागत परिवार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को पाकर अत्यन्त प्रसन्न थे। वे इस घने जंगल में श्री आज्ञानुसार रहकर सोचा करते थे कि क्या कभी यहां भी लोग आते-जाते दिखाई देंगे या केवल हम लोग ही यहां रहेंगे।

Wednesday, July 13, 2016

13.07.2016

इस प्रकार जब अमृत वचन हुए तो सबके हृदय शीतल हो गये। सब गुरुमुखों में भक्ति के लिए एक नया उत्साह भर गया। सब गुरुमुखों ने इस अमृत को जी भर कर पिया और अन्त में जयकारों की ध्वनि से आकाश को गुँजा दिया।
      आपने सेवा का भण्डार खोल दिया। जो शरणागत प्रेमी तथा दर्शनार्थ संगतें आई थीं, उनको सेवा का शुभ अवसर प्रदान किया। जहां सेवा का कार्य आरम्भ होता, वहां पर आप पलंग अथवा आसन पर विराजमान हो जाते। इससे सेवकों में नया साहस आ जाता और सभी सेवा में मन-चित्त लगाकर जुट जाते।
      सीमाप्रान्त, पंजाब तथा सिन्ध से आई हुई संगतों ने श्री चरणों में अपने-अपने प्रान्तों में पुनः चरण-स्पर्श करने के लिए विनय की। आपने फ़रमाया- ''अब सयम बदलने वाला है। तुम्हें भी अपना उद्योग-धन्धा (कारोबार) मध्यप्रदेश, राजस्थान अथवा उत्तर प्रदेश में करने में लाभ है। हमने अब श्री आनन्दपुर में बहुत सा काम करना है। इसलिए हमारा उधर जाने का विचार नहीं।" आई हुई संगतों में से कुछ लोग तो निराश होकर लौट गये। कुछ एक आज्ञानुसार मौज देखकर मध्यप्रदेश में ही रोज़गार करने लगे। चार-पाँच वर्ष बीतने पर जब देश में कोई परिवर्तन न हुआ तो लोग वापस पंजाब तथा सीमाप्रान्त की ओर जाने को तैयार हो गये। शारीरिक सुख जितना उनको पंजाब व सीमाप्रान्त में मिलता था, इस प्रान्त (मध्य प्रदेश) में न मिल सका। उद्योग-धन्धों में भी उन्नति न हुई। कुछ लोगों को मध्य प्रदेश का जलवायु अनुकूल न आया। इसलिए कुछ थोड़े से परिवारों के सिवाय सब के सब परिवार वापस जाने लगे। इनमें भक्त मोहन लाल मखीजा मुलतान निवासी भी थे। भक्त मोहन लाल मखिजा पहले तो मध्य प्रदेश में रहे, परन्तु 1945 में वापस लौट गये।    
      एक प्रसिद्ध ज्योतिषी जो भक्त मोहन लाल मखीजा का हार्दिक मित्र था, उसने भक्त जी को कहा कि तुम इस तरफ क्यों लौट आये? तुम्हारा मध्य प्रदेश जाने का समय तो अब ही था। फिर उसने खुले शब्दों में कहा - "तुम्हें अपने इष्टदेव के वचनों पर विश्वास रखकर अब वापस नहीं आना चाहिए था।" वे इस रहस्य को फिर भी न समझ सके और न ही किसी अन्य ने उस समय श्री वचनों के रहस्य को समझा। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने देश-विभाजन के विषय में जो वचन किए थे, वे विभाजन होने पर पुनः स्मरण हो आये।
      उसके बाद 1947 में जो घटना हुई, वह सबके सामने प्रत्यक्ष है। जिन-जिन कठिनाइयों व आपत्तियों का सामना उधर के लोगों को करना पड़ा, वह किसी से छुपा हुआ नहीं।
      वे लोग सब सम्पत्ति, मकान, जायदाद आदि लुटवाकर खाली हाथ जान बचाकर भारत लौट आये। जब वही लोग 1947 के बाद श्री दर्शन के लिए श्री आनन्दपुर आये तो श्री चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और विनय की- प्रभो! हमने आपके वचनों पर विश्वास न किया जिसके कारण हमें अपने किए हुए कर्मों की सज़ा मिल चुकी है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया-
जा के मन बिस्वास है, सदा गुरू हैं संग ।
कोटि काल झक झोलही, तऊ न ह्वै चित भंग ।।
                              परमसंत श्री कबीर साहिब जी
सद्गुरु के वचनों पर विश्वास करना ही गुरुमुख की पूँजी है। हमने तो आपके लाभ के लिए कहा था, जिन्होंने वचनों पर विश्वास किया उन्होंने लाभ उठा लिया। यह भी ईश्वर का धन्यवाद करो कि तुम्हारी जीन बच गई ।

Tuesday, July 12, 2016

12.07.2016

यदि माया में शान्ति होती, तो सन्त महापुरुष आपको कुछ न कहते। यदि थोड़ा-बहुत नुकसान होता, तो भी न कहते। लेकिन यह जन्म-जन्मांतरों का धोखा है। करोड़ों जन्मों के पुण्यों से इस मनुष्य जन्म का संयोग मिला है। धनी धर्मदास जी भी कहते हैं-
।। दोहा ।।
भक्ति प्रभाव मिटी सकल, धर्मदास की पीर ।
कोटि जन्म के पुण्य से, सतगुरु मिले कबीर ।।
हम आपको धन-माया, माल-परिवार से अलग नहीं करते, किन्तु इनके मोह से छुड़ाते हैं, क्योंकि ये सब सम्बन्ध दुःखदायी हैं। हम इसके बदले में आपको भक्ति देना चाहते हैं, जो शान्ति तथा आनन्द का भण्डार है। जिन्होंने माया का सब भार सद्गुरु को अर्पित किया है, सद्गुरु उनके ज़िम्मेवार बनते हैं।
किसी भी प्राणी से जिसके पास माया अधिक हो पूछ लीजिए कि क्या वह सुखी है? माया से न किसी को सुख मिला है न मिलेगा। अब आप लोग माया चाहते हैं या भक्ति? सबने भक्ति की मांग प्रकट की। आपने फ़रमाया कि जो भक्ति चाहता है, उसे सत्पुरुषों के आदेशानुसार चलना होगा। यदि आप सभी भक्ति के ग्राहक हैं तो ऐसी सच्ची भावना पर सत्पुरुषों को प्रसन्नता है।
गुरुमुख को मन-माया के धोखे में नहीं आना चाहिए। मोह-माया, कुटुम्ब-परिवार की संगति में वही मिलेगा जो उनके पास होगा। उनके पास सिवाय दुःख व अशान्ति के और कुछ भी नहीं मिलेगा। सन्त महापुरुषों का काम तो आपको माया से छुड़ाना और भक्ति देना है। यह कोई छुपी हुई बात नहीं कि सद्गुरु माया के बन्धनों से छुड़वाकर भक्ति देते हैं। यह सीधी सच्ची बात है। महापुरुष तो बार-बार यही कहेंगे कि जो मन-माया की तरफ तुम्हारा ख्याल दिलवाये, उसके धोखे में मत आओ। सत्पुरुष तो यही कहते हैं कि माया के मोह को छोड़ो, भक्ति के प्यार को ग्रहण करो।
      सन्त महापुरुषों के वचनों पर चलो। सन्त महापुरुष कहते हैं कि तुम माया के मुकाबले में डटे रहो, मुकाबले पर डटने वाला सूरमा कहलाता है। तुम सूरमा हो, कायर मत बनो। संकल्प भी माया के न उठाओ। माया के संकल्प में अशान्ति है। यदि सन्त महापुरुषों के वचनों को भूल गये तो हानि होगी, तुम माया के गुलाम बन जाओगे। सन्त महापुरुष कहते हैं कि माया के गुलाम न बनकर माया के मालिक बनो। दुनिया तो माया की गुलामी में खुश होती है। गुलाम और मालिक में कितना अन्तर है! सन्त महापुरुष आपको मालिक बनाते हैं। आप सब गुरुमुख हैं। आपको माया के धोखे में नहीं पड़ना चाहिए। आप भक्ति करो। कायर न बनो, सूरमा बनो।
सन्त महापुरुषों की आज्ञा मानो। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की प्रसन्नता प्राप्त कर उन्हीं का रूप बन जाओ। यही भक्ति का परिणाम है। यही जीव की अपनी पूँजी है।

Monday, July 11, 2016

10.07.2016

श्री आनन्दपुर में
श्री आनन्दपुर की भूमि ने आप ( श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी) के आगमन के लिए करुण पुकार की। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी उस करुण पुकार को सुनकर इस भूमि को कृपा-वृष्टि से सिंचित करने के लिए आये। श्री चकौड़ी सन्त आश्रम में रूहानी अभिषेक के लगभग तीन वर्ष पश्चात एकाएक आपकी मौज श्री आनन्दपुर में स्थायी निवास करने की उठी। इधर श्री  आनन्दपुर प्रेम की प्यास को आकुलता से व्यक्त कर रहा था, उधर सिन्ध अपने प्रेम-पाश में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को जकड़े हुए था। सन् 1939 में आपने दीपावलि का पर्व सिन्ध में मनाया। यह सिन्ध में आपकी अन्तिम दीपावलि थी। आपने श्री आनन्दपुर में कृपा-पत्र भेजा कि हम दीपावलि के पश्चात् श्री आनन्दपुर आएंगे। श्री आनन्दपुर निवासी गुरुमुखजन व श्री आनन्दपुर का कण-कण प्रसन्नता से झूम उठा। जब और जिस समय सन्त महापुरुष जहां भी चरण रखें, वह समय पर्व से भी बढ़कर होता है, क्योंकि-
।।दोहा।।
सन्त दीवाली नित करें, सत्य लोक के माहिं ।
और मते हैं काल के, ऐवें धूल उड़ाहिं ।।
इसी श्री आनन्दपुर में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) के सुनहरी वचनर संजोये हुए थे। उन वचनों को साकार रूप देने के लिए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी प्रेम-त्याग-सेवा का पाठ पढ़ाने के लिए नवम्बर 1939 में श्री आनन्दपुर पधारे। आपके आगमन से प्रेमियों के हृदय प्रफुल्लित हो उठे। वृक्षों, पत्तों व चट्टानों ने भी अभिनन्दन के गीत गाये। युगों से सुनसान, घने जंगल में प्रेम-प्यासी धरती की सोई हुई किस्मत जाग उठी।
सन् 1940 में श्री गुरु-पूजा का प्रथम पर्व यहां मनाया गया। सीमाप्रान्त, पंजाब, सिन्ध, उत्तरप्रदेश आदि स्थानों संगतें आईं। आपने त्यौहार के शुभ दिन ये अमृत वचन फ़रमाये-
बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ।
गुरुवाणी
तुम्हारे अनेकों जन्म संसार में काल-माया की भेंट हुए हैं। जहां इतने जन्म व्यर्थ गंवा दिये, वहां यह एक जन्म ही सन्त महापुरुषों की सेवा व संगति में लगा कर देखो तो सही।
।।दोहा।।
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुरु मिलें, तौ भी सस्ता जान ।।
                              परमसन्त श्री कबीर साहिब जी

Sunday, July 10, 2016

09.07.2016

चकौड़ी सन्त आश्रम में व्यासपूजा का पर्व मनाने के पश्चात् आप स्थान गरेला (सिन्ध) पधारे। यहां दीपावलि का शुभ पर्व मनाया तथा इसके पश्चात् अक्टूबर 1939 के अन्तिम सप्ताह में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी स्थान डेलाचट्ठा ज़िला गुजरांवाला में विराजमान थे। पंजाब में काफ़ी सगंत वहां श्री दर्शन के लिए आई। यहां पर आपने प्रेमियों को फ़रमाया कि पंजाब छोड़ने की कोशिश करो। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने यहां कुछ दिन विराजमान रह कर श्री आनन्दपुर की ओर प्रस्थान किया। संगतों के लिए लंगर का सामान, बर्तन, तम्बू (Tent) और कुछ बिस्तर आदि सन्त आश्रम चकौड़ी से मंगवाये थे। यह सब सामान स्थान चकौड़ी वापस भेजने की अपेक्षा श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने श्री आनन्दपुर साथ ले जाने की मौज प्रकट की। महात्मा अखण्ड प्रकाशानन्द जी ने श्री चरणों में विनय की कि प्रभो! इस सामान की श्री आनन्दपुर साथ ले जाने की क्या ज़रूरत है? ले जाने और फिर वापस लाने की मेहनत ही है। वहां की ज़रूरत उधर से सामान मंगवाकर पूरी कर ली जावेगी। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया कि यहां किसने लौटना है। यह सब सामान साथ ले चलो। इसके अतिरिक्त और भी कोई सामान जो उनके पास पड़ा हो, श्री आनन्दपुर भेज दो।
श्री आज्ञानुसार सब सामान साथ रख लिया गया। श्री आनन्दपुर आते समय रास्ते में ग्वालियर के पार्क होटल में महात्मा रोशनानन्द जी को सायं समय एकान्त में फ़रमाया कि इस समय देश की परिस्थितियां कुछ बदल रही हैं। इसलिए हम पुनः पंजाब नहीं जाएंगे और तुम्हें भी श्री आनन्दपुर में रखना चाहते हैं। अब तुम सत्संग का कार्य न करो। महात्मा जी ने विनय की कि प्रभो! जैसी श्री मौज हो, वही सेवा की जायेगी।
      श्री आनन्दपुर पहुँचने पर सब सामान काम में लाया गया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने अपनी मौज सब पर प्रकट की कि यहां (श्री आनन्दपुर में) बहुत सा काम करवाना है। इसलिए जब तक  यहां स्थायी रूप से निवास न होगा, सब काम पूरा न हो सकेगा। परन्तु देश-विभाजन के विषय में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने जानते हुए भी किसी पर यह रहस्य प्रकट न किया। सन् 1947 में देश विभाजन होने पर यह रहस्य सब पर प्रकट हो गया कि किसलिए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सारा सामान लाने को कहा था। प्रकृति के रहस्य तो केवल प्रकृति के नायक पूर्ण सद्गुरु ही जान सकते हैं।

Saturday, July 9, 2016

08.07.2016

साथ में आये हुए सेवादार एक दो बार पहाड़ों पर घूमने गये और उन्होंने इन मनोरम दृश्यों को देखा। दो-चार महात्मा-जनों को वहां अधिक सर्दी लग गई जिसके कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। दो तीन महात्मा तो शीघ्र ही स्वस्थ हो गये, परन्तु महात्मा सन्तोषानन्द जी अत्यधिक अस्वस्थ हो गए। अतः श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने 15 जून 1939 को श्रीनगर से चकौड़ी सन्त आश्रम के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में गुलमर्ग, खिलमर्ग होते हुए रात्रि समय बारामूला ठहरे। 3 दिन यहां कृपा की, पुनः बारामूला से दुमेल होते हुए 19 जून को कोहमरी पहुँचे। यहां पर महात्मा धर्मात्मानन्द जी सत्संग करते थे। इन्हें दो दिन पहले ही श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के शुभ आगमन के विषय में विदित हुआ। ये रावलपिण्डी की काफ़ी सगत को साथ लिए मार्ग में सड़क पर खड़े हुए थे। यहां पर भक्तों ने विश्राम तथा भोजनादि की पूर्ण व्यवस्था कर दी थी। रावलपिण्डी के भक्तों ने अत्यधिक आग्रह किया, परन्तु व्यासपूजा में थोड़े दिन होने के कारण आपने फ़रमाया कि फिर कभी यहां कृपा करेंगे, अब सभी प्रेमीजन हमारे साथ ही चकौड़ी सन्त आश्रम चलें। कुछ भक्तजन जैसे वहां खड़े थे वैसे ही आप के साथ में आई हुई महात्मा तथा भक्तजनों की बस में आ गए। इस प्रकार मार्ग में सब प्रेमियों को कृतार्थ करते हुए 24 जून 1939 को एक मास पश्चात चकौड़ी सन्त आश्रम में लौट आए।
यहां व्यासपूजा का पर्व मनाना था। महात्मा सन्तोषानन्द जी की दशा अति शोचनीय थी। व्यासपूजा से एक-दो दिन पहले जबकि महात्मा संतोष आनन्द जी के बचने की कोई आशा न रही, तो रात्रि समय महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के चरणों में श्री दर्शन देने के लिए विनय की। उस समय श्री सद्गुरुदेव महाराज जी चकौड़ी आश्रम में चौबारे पर विराजमान ते। वहां से नीचे आए। महात्मा जी को श्री दर्शन दिये। महात्मा जी ने काँपते हुए केवल इतने ही शब्द कहे कि "अभी तो मेरी सेवा करने की इच्छा थी।" श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने स्वाभाविक ही फ़रमाया कि तुम तो ठीक हो रहे हो। स्वस्थ होकर सेवा ही तो करनी है। सब देखकर हैरान हो रहे थे कि इस समय तो इनका बचना भी मुश्किल है, सेवा कैसे करेंगे? श्री सद्गुरुदेव महाराज जी तो श्री दर्शन देकर ऊपर चले गये। इधर महात्मा जी रात्रि भर तो शोचनीय अवस्था में पड़े रहे। प्रातः होने तक उन्होंने अपने आपको कुछ स्वस्थ पाया और धीरे-धीरे स्वस्थ होकर श्री दरबार की सेवा में संलग्न हो गये और अन्तिम स्वांस तक पावन श्री दरबार की सेवा करते रहे।

Friday, July 8, 2016

07.07.2016

एक बार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी पीर पंचाल पर्वत पर भ्रमण करने के लिए गए। गर्मी की ऋतु थी, फिर भी कई पहाड़ बर्फ़ से ढके हुए थे जिनसे पानी पिघल-पिघल कर पहाड़ों से नीचे छोटी-छोटी धाराओं में बहकर तलहटी की ओर जा रहा था। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने पीर पंचाल पहाड़ के समीप विराजमान होकर भक्तों एवं महात्माजनों को प्रवचन फ़रमाए- "देखो! पहाड़ों पर पानी का क्या रूप है? नदियों में कैसा होगा? और यह पानी कहां से आता है पुनः कहां जाता है? यह पानी का रूप ही बर्फ है। जब यह बर्फ़ पिघलकर छोटी-छोटी धाराओं में बहती है तो यहां इनका पानी कितना स्वच्छ है। फिर ये छोटी धाराएँ ही पर्वत से नीचे उतरते समय इकट्ठी होकर नदी का रूप धारण करती हैं, जब यह मैदानी भागों में जाती है तो इसमें मिट्टी आदि मिलकर पानी को गंदला कर देते हैं। इस प्रकार नदी सैकड़ो मील चट्टानों, पत्थरों, टीलों को पार करती हुई समुद्र में जा मिलती है। अथाह समुद्र के जल में मिलकर ही जल विश्राम पाता है और फिर वही स्वच्छ रूप में दिखाई देता है। परन्तु जिस नदी का रुख़ सीधा समुद्र की ओर नहीं होता उसका पानी रास्ते में किसी गड्ढे-खाई व नीची जगहों में रुक जाता है, तो वह समुद्र में नहीं मिल सकता। इसी प्रकार जीवात्मा भी उस परमात्मा का अंश है, परन्तु जब यह आत्मा किसी मानव रूप को धारण कर जन्म लेती है तो इसपर माया अपने आवरण डालती है। जो मनुष्य तो सद्गुरु की पावन संगति प्राप्तकर सीधा परमात्मा से मिलने की अभिलाषा से इस मार्ग में आने वाली मायावी कठिनाइयों को पार कर लेता है, वह परमात्मा से मिलकर शान्ति प्राप्त कर लेता है। परन्तु जिस मनुष्य का रुझान माया की ओर होता है, वह जन्म-जन्मान्तरों तक दुःखी तथा अशान्त रहता है। इसीलिए प्रत्येक गुरुमुख का कर्तव्य है कि अपना रुख़, अपने विचारों का झुकाव सद्गुरु की आज्ञानुसार अपने लक्ष्य पर रखता हुआ अपनी मंज़िल पर पहुँचने का प्रयत्न करे।" इस प्रकार श्री प्रवचन फ़रमा कर कुछ देर उस क्षेत्र में घुमकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी वहां से लौट आये।

Thursday, July 7, 2016

06.07.2016

एक बार कुछ ब्राह्मणों ने मिलकर आपको अपने गृह पवित्र कराने के लिए अत्यधिक आग्रह किया। आप उनकी प्रबल श्रद्धा एवं अनुरोध से उनके घर पधारे। उन्होंने मीठे तेल से स्वादिष्ट भोजन बनाया। जब उन्होंने भोजन करवाया तो वे (पंड़ित) प्रेम में इतने दीवाने हो गए कि तेल को गर्म करके सब्ज़ियों के ऊपर डालने लगे। सबने इस भोजन को बड़े आनन्द से खाया। आप वहां पर दो-तीन घण्टे ठहर कर पुनः बंगले पर लौट आये।
      रात्रि समय जब वे पंडित सत्संग तथा श्री दर्शन के लिए आये तो अकस्मात किसी भक्त ने उनसे पूछा कि यहां पर घी किस भाव मिलता है। आपने तो आज सब्ज़ियों को खूब तर कर दिया। उन्होंने उत्तर दिया कि हमारे यहां तेल से सब वस्तुएँ बनाने की प्रथा है। अतः हमने तेल से ही सब व्यंजन बनाए थे तथा ऊपर से भी तेल ही डाला था। यह सुनकर भक्तजन चकित हुए कि किसी को भी तेल व घी का अन्तर विदित न हुआ। उन भक्तजनों ने इस विषय में आपके श्री चरणों में भी विनय की। आपने फ़रमाया कि उत्कट प्रेम और श्रद्धा की विशेषता ही यही है। आज यदि तेल के स्थान पर पानी भी डाला जाता तो भी विदित न होता। केवल हार्दिक श्रद्धा भावना ही सत्पुरुषों को प्रिय है। इस प्रकार से श्री सद्गुरुदेव महाराज जी उनके प्रेम की सराहना निज मुख से करने लगे।
      श्री सद्गुरुदेव महाराज जी लगभग 20-22 दिन श्रीनगर में विराजमान रहे। सैक्रेटरी साहिब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को भ्रमण के लिए महात्माजनों सहित प्रसिद्ध स्थानों अर्थात चश्मा शाही, निसात बाग़, शालीमार गार्डन, हार्वन लेक, डल झील आदि स्थानों पर ले गये तथा प्राकृतिक सुषमा में श्री वचनामृत तथा श्री दर्शनों का भी लाभ प्राप्त करते रहे।

Wednesday, July 6, 2016

05.07.2016

इसके पश्चात 14 मई सन् 1939 को श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने हकल ज़िला जम्मू में कृपा की। वहां पर कुछ दिन अमृत-प्रवचनों से संस्कारी आत्माओं को लाभान्वित कर आपने श्रीनगर की ओर प्रस्थान किया। उस समय एक बस महात्मा जनों की साथ थी तथा आप कार में विराजमान होकर यात्रा कर रहे थे। जम्मू से लगभग 15-20 मील की दूरी पर जाकर अचानक ही कार का अक्ष (Axle) टूट गया। आप कार से उतरकर बस में विराजमान हो गये। कार ठीक होने के लिए जम्मू भेज दी गई। कार का अक्ष ठीक करवाने में दो-तीन दिन लग गये। आप दो-तीन दिन तक कटड़ा में विराजमान रहे। वहां सत्संग उपदेश से सबको कृतार्थ करते रहे। यहां पर आपके पावन वचनामृत का पान करके तथा देदीप्यमान छवि को निहारकर सब मंत्र मुग्ध हो गए। सत्संग श्रवण कर वे अपने भाग्यों की सराहना करने लगे और कहने लगे कि सन्त महापुरुष वास्तव में ही जीवों को सन्मार्ग पर लगाने के लिए इस धराधाम पर अवतरित होते हैं। कई प्रेमियों ने आपसे नाम की दीक्षा भी ली।
      तीन दिन पश्चात जम्मू से कार ठीक होकर आ गई और कार पर विराजमान होकर आपने वहां से प्रस्थान किया। कटड़ा से चलकर बटोत और कुद में एक-एक रात ठहरकर वैरीनाग सरोवर पहुँचे। इस झील से जेहलम दरिया निकलता है। इस स्थान के रमणीक दृश्य सब महात्माजनों को दिखलाते हुए आप अनन्त नाग पहुँचे। काश्मीरी भाषा में 'नाग' चश्मे (छोटी झील) को कहा जाता है, इसलिए यहां पर कई शहरों के साथ 'नाग' शब्द आता है। अनन्त नाग में दो-तीन दिन सत्संग प्रवाह चलता रहा। इसी मध्य एक बार दिन के समय पहलगाम में भी कृपा की। पुनःरात्रि समय अनन्तनाग लौट आये। अनन्त नाग में कुछ एक सज्जन भक्त बन गए तथा आपको वहीं कुछ दिन ठहरने के लिए विनय करने लगे। आप भी उनकी विनय स्वीकार कर एक दो दिन वहां ठहरे और पुनः आपने श्री नगर में कृपा की।
      श्री नगर में कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की बादामी बाग में कोठियां व बंगले बने हुए थे। महात्मा सत विचारानन्द जी तथा महात्मा योग प्रकाशानन्द जी महाराज के महल में गए, परन्तु वे कहीं अन्यत्र गए हुए थे। वहां महात्माजनों की भेंट उनके सचिव महोदय से हुई। वे अत्यंत श्रद्धालु और साधु-सेवी थे। अतः वे महात्मा जनों के साथ श्री दर्शन के लिए आए और श्री दर्शन कर कृत्य कृत्य हो गए। सचिव महोदय ने एक बंगला आवास के लिए दे दिया जिसमें उसने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के लिए ऊपरी भाग (चौबारा) तथा नीचे के भाग में महात्माजनों के निवास के लिए व्यवस्था कर दी। इसके साथ ही काश्मीर राज्य की ओर से भेजनादि का सारा प्रबन्ध करवा कर तीन-चार ब्राह्मण भी भोजन बनाने की सेवा में नियुक्त कर दिये।
      रात्रि समय नित्यप्रति सत्संगादि का कार्यक्रम होता। सैक्रेटरी साहिब अपने साथ बड़े बड़े उच्च पदाधिकारियों को साथ लाते, सभी श्री दर्शन तथा सत्संग का लाभ प्राप्त करते और श्री दर्शन कर कृत्यकृत्य हो जाते तथा मुक्त कण्ठ से आपके गुणानुवादों को गाते। उनमें से कइयों ने नामोपदेश भी लिया। वहां पर कई ब्राह्मण आपको अपना गृह पवित्र करने के लिए विनय करते, परन्तु आप उन्हें फ़रमाते कि वे यहां आकर अपनी श्रद्धा-भावना पूर्ण कर लिया करें।

Tuesday, July 5, 2016

04.07.2016

सत्संग सुनकर मनुष्य के मन में नाम की प्राप्ति की लगन बढ़ जाती है। जब लगन बढ़ती है तो प्रकृति भी सहायता करती है और उसका मिलाप सन्त-सद्गुरु से हो जाता है। भाग्यशाली जीव सन्त-सद्गुरु से नाम की प्राप्ति कर उसका अभ्यास करके जन्म-मरण के दुःखों से छुटकारा पाकर सच्चा सुख प्राप्त कर लेता है। यही मनुष्य-जन्म का वास्तविक लाभ है।
      जब संगत चली गई तो महात्मा परम विवेकानन्द जी से ( जो भक्त वेष में थे) आपने पूछा- क्या यहां सत्संग सदा होता है? महात्मा जी ने विनय की- प्रभो! यहां कोई सत्संग नहीं होता। आपने फ़रमाया-" वह भी कोई शहर है जहां सत्संग नहीं होता। तुम यहां सत्संग करना आरम्भ कर दो।" महात्मा जी का कहना है कि सत्संग करना तो मैं जानता नहीं था, परन्तु यह विश्वास था कि जिन्होंने श्री आज्ञा प्रदान की है वह कार्य करने की शक्ति भी स्वयं प्रदान करेंगे।
      महात्मा जी ने शहर के कुछ व्यक्तियों से सत्संग आरम्भ करने की बात कही। उन्होंने कहा कि यहां पहले बड़े-बड़े महात्मा सत्संग करने का प्रयत्न कर चुके हैं, सफलता नहीं मिली। यहां की धरती भी पथरीली है और मनुष्यों के दिल भी पत्थर जैसे हैं। महात्मा जी ने यह सब वृत्तान्त श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री चरणों में सुनाया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया- " अमूल्य हीरे-लाल भी पत्थरों में दबे हुए होते हैं। हीरे-लालों की उत्पत्ति भी पत्थरों में से होती है। वे परिश्रम करने से ही निकलते हैं।" श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने पुनः कहीं अन्यत्र कृपा की।
      उनके पधारने के बाद महात्मा जी ने सत्संग का कार्य श्री वचनानुसार आरम्भ किया। धीरे-धीरे संस्कारी रूहें श्री दरबार की महिमा सुनकर मोह-माया रूपी पत्थरों को हटाकर बाहर निकलती आईं। भाव यह कि भक्तों की संख्या बढ़ गई और सत्संग का कार्य अच्छा चलने लगा। सत्संग के लिए एक आश्रम बनवाया गया जहां सैकड़ों भक्त लोग सत्संग से लाभ उठाने लगे। झंपीयर शहर के लोग कहने लगे कि जो काम पहले किसी से न हो सका, वह कार्य श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के संकेतमात्र से हो गया। निस्सन्देह श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कोई अद्वितीय शक्ति है। झंपीयर शहर और उसके आसपास के क्षेत्र से कितने ही व्यक्ति शरण में आए और श्री दरबार की सेवा करते-करते बाद में साधु बन गये। उमें से महात्मा अमर सत्यानन्द जी व महात्मा अमर सुखानन्द जी मुख्य थे। उन्होंने श्री गुरुदरबार की सेवा के साथ अनेक जीवों को परमार्थ-पथ दर्शाया।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी त्रिकालदर्शी हैं, जिन्होंने आरम्भ में ही यह फ़रमा दिया कि परिश्रम करने से पहाड़ों में से अनमोल रत्न भी निकल आते हैं। वे अपनी संस्कारी रूहों को स्वयं जानते थे, इसलिए अपने साथ उन्हें मिलाने का कोई न कोई कारण बन ही गया। झंपीयर में सत्संग का कार्य आरम्भ कराने का यही उनका तात्पर्य था। महापुरुषों की महिमा का कोई पार नहीं पा सकता।

Monday, July 4, 2016

03.07.2016

आप ( श्री तीसरी पादशाही जी) ने दिन-रात एक करके श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री वचनों को साकार रूप दिया। 1936 से लेकर 1939 तक आपने पंजाब, सिन्ध, सीमाप्रान्त, उत्तरप्रदेश के प्रान्तों में जहां कहीं अपने सत्संग आश्रम थे, सत्संगी महात्माओं व भक्तों की विनती करने पर सब स्थानों को अपनी पवित्र चरण-रज से पुनीत किया। टेरी, डेराइस्माइलखां (सीमाप्रान्त), लक्खी, गरेला, गोघारा, नसीराबाद (सिन्ध) चकौड़ी सन्त आश्रम, भाबड़ा, पिपलभुट्टा, पगाला, भूरेकी, गन्धोवाल, डेला-चट्ठा, हरनौली, मुलतान, वहोआ, कोटली मुहम्मदसदीक, गोंदल आदि (पश्चिमी पंजाब) इन स्थानों पर अपना अमूल्य समय देकर सबकी भावनाओं को पूरा किया। अब ये सभी स्थान पाकिस्तान में हैं।
      एक बार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी नसीराबाद में विराजमान थे। कुछ दिन पश्चात् आपने महात्मा परम विवेकानन्द जी को श्री आज्ञा दी कि तुम झंपियर ज़िला कराची सिन्ध में जाकर रहो। श्री आज्ञा पाकर वे झंपीयर चले गए। इसके कुछ समय बाद एक बार आप कराची से आ रहे थे, तो महात्मा परम विवेकानन्द जी की विनय पर दो दिन के लिए आपने झंपीयर भी कृपा की। वहां रात को सत्संग हुआ। काफ़ी संगत आई हुई थी। वहां की संगत को सम्बोधित करते हुए आपने फ़रमाया-
      गुरुमुखो! पानी का अपना कोई रंग-रूप नहीं होता। जैसा रंग इसमें डालो, वैसा ही उसका रंग हो जाता है। उदाहरणतया उसमें पीला रंग डालने से पानी का रंग भी पीला हो जायेगा और लाल रंग डालने से पानी भी लाल हो जायेगा। वैसे ही मन का भी कोई रंग रूप नहीं होता। उसको भी जैसा संग मिले वैसा ही रंग उस पर चढ़ जाता है। कुसंग से मन मैला हो जाता है और सत्संग से मन निर्मल हो जाता है। निर्मल मन में ही ईश्वर का प्रेम निवास करता है। ईश्वर का प्रेम मन में होने से लोक-परलोक के कार्य सहज में ही सिद्ध हो जाते हैं। चूंकि प्रत्येक मनुष्य सब कार्यों की सिद्धि चाहता है, इसलिए प्रत्येक मनुष्य को सत्संग में जाकर अपने मन को शुद्ध करने का यत्न करना चाहिए। मन ईश्वर के नाम से शुद्ध होता है और ईश्वर का नाम सत्संग से प्राप्त होता है। सत्संग की महिमा गुरुवाणी में इस प्रकार की गई है-
सतसंगति कैसी जाणिऐ । जिथै एको नामु वखाणीऐ।।
एको नामु हुकमु है नानक सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ।।

Sunday, July 3, 2016

रूहानी जानशीनी


2 मास 24 दिन के बाद चकौड़ी सन्त आश्रम में प्रथम महात्मा सत विचारानन्द जी ने अर्शाद नामा (श्री आज्ञा) सर्व संगत को सुनाया। अतएव पुरातन मर्यादा अनुसार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री स्वामी वैराग्य आनन्द जी महाराज 3 जुलाई सन् 1936 ई. तदनुसार 20 आषाढ़ संवत् 1993 वि. आषाढ़ सुदी चौदस शुक्रवार के शुभ दिन इस सम्प्रदाय के तृतीय महाराजाधिराज के रूप में पारमार्थिक राज्यसिंहासन पर विराजमान हुए। विधिवत् केसर का तिलक लगाया गया, तदुपरन्त श्री आरती उतारी गई। उसी दिन ही श्री दूसरी पादशाही जी की पुण्य समृति में भंडारा किया गया तथा अगले दिन 21 आषाढ़ संवत् 1993 वि. अर्थात 4 जुलाई सन् 1936 ई. आषाढ़ सुदी पूर्णमासी शनिवार को व्यासपूजा का शुभ पर्व मनाया गया।
      आप (श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) के परमार्थ पथ पर सिंहासनारूढ़ होते ही आकुल हृदयों ने शान्ति की सांस ली। दो महीने चौबीस दिन प्रेमी गुरुमुख शोक-सागर में डूबे रहे। प्रेमियों के हृदय एक तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी की याद में व्याकुल थे, दूसरा उन्हें कोई आगे आश्रय न दिखाई देने से वे मझदार में हिचकोले खा रहे थे। अब आश्रय पाकर उनके हृदय में आशा की एक नई किरण ने धैर्य भर दिया। श्री सद्गुरुदेव जी महाराज श्री तीसरी पादशाही जी ने भी यह अवधि श्री नंगली साहिब में ही बिताई। आप स्वयं श्री सद्गुरु-प्रेम में सदा आकुल रहते जिससे कोई भी इस रहस्य को न समझ सका।
      सन् 1936 में परमार्थ के सिंहासन पर विराजमान होकर आपने सत्संग-उपदेश को विशाल रूप दिया। आप प्रथम दो वर्ष पंजाब तथा सिन्ध को कृतार्थ करते रहे। श्री चकौड़ी सन्त आश्रम में श्री व्यासपूजा का पर्व मनाया जाता, पुनः सिन्ध तथा पंजाब को कृतार्थ करते। इसी बीच श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने पंजाब के प्रत्येक आश्रम को पावन चरणारविन्दों से अनुगृहीत किया। कितना सौभाग्य है इन स्थानों का जहां पर स्वयं कुल मालिक सन्त स्वरूप में इन्हें पवित्र करने आए। कितना विचित्र ढंग अपनाया इन महान् विभूतियों ने कि श्री परमहंस दयाल जी श्री पहली पदशाही जी ने बिहार की पुण्य भूमि पर अवतार लेकर सीमाप्रान्त में स्थित टेरी स्थान को अपने अमृत-प्रवचनों एवं सत्संग उपदेश का उचित क्षेत्र बनाया। यही टेरी क्षेत्र श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी का जन्म स्थान बना। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी ) ने टेरी में अवतार लेकर सत्संग-उपदेश का प्रमुख केन्द्र लक्की मरवत् को बनाया। इसी लक्की मरवत् में इस सम्प्रदाय की दो महान् विभूतियां श्री स्वामी जी श्री तीसरी पादशाही जी महाराज व श्री स्वामी जी श्री चौथी पादशाही जी महाराज अवतरित हुईं। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने पंजाब को सत्संग-उपदेश का केन्द्र बनाया तथा श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी कुछ समय यहां विराजमान रहे तो इसी पंजाब की पुण्य भूमि में इस सम्प्रदाय के श्री पंचम पादशाही जी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी प्रकट हुए।

Saturday, July 2, 2016

01.07.2016

श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी जनवरी सन् 1936 में दिल्ली में विराजमान थे। श्री परम पवित्र मौज के अनुसार आप ( श्री तीसरी पादशाही जी) को सिन्ध से बुलवाया। आपके आने पर एक-दो दिन लगातार एकान्त स्थान में प्रवचन होते रहे। दो दिन पश्चात महात्मा सत् विचारानन्द जी को (जो वहीं पर थे) अपने उत्तराधिकारी के सम्बन्ध में हुकुमनामा लिखवाया और यह फ़रमाया - "हमारे रूहानी जानशीन ( श्री स्वामी वैराग्य आनन्द जी की ओर संकेत कर) ये होंगे। यह गुप्त भेद समय पर इनके परामर्श से दरबार के सब महात्मा, बाइयां, भक्त, भक्तानियां एवं सम्पूर्ण गुरुमुख संगत पर प्रकट कर देना। हर तरह से इनकी आज्ञा मानना। वैसे तो हमने चकौड़ी सन्त आश्रम पर सब महात्मों की मण्डली में इनके सम्बन्ध में काफ़ी कुछ कह दिया है, परन्तु प्रकट रूप से आपने सब पर प्रकट करना है। हमारी ओर से सबको दुआ-आशीर्वाद।" 
      महात्मा सत विचारानन्द जी ने साष्टांग दण्डवत् वन्दना की और क्षमा मांगी कि स्वामिन्। हम नादान जीवों के अपराधों को क्षमा कर दो। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने क्षमा करते हुए फ़रमाया- "हम आपकी सच्ची श्रद्धा-भावना और प्रेम-भक्ति से बहुत प्रसन्न हैं। इसी प्रकार हित-चित्त से गुरु-दरबार की सेवा करते हुए जीवन सफल करना।"
      अपने परम प्रिय शिष्य को सर्व प्रकार से परिपूर्ण, गुणसम्पन्न, तत्त्वनिष्ठ जानकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने सम्पूर्ण रूहानी ताकत अर्थात आध्यात्मिक शक्ति उन्हें समर्पित कर दी और स्वयं निश्चिन्त हो गए। इसके पश्चात् श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) 9 अप्रैल सन् 1936 ईस्वी तदनुसार 28 चैत्र संवत् 1993 विक्रमी वीरवार को नंगली साहिब में निज स्वरूप में लीन हुए।

Friday, July 1, 2016

30.06.2016

श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी सिन्ध लौट आए। यहां पर गाँव गाँव में आप आत्म-ज्योति को दर्शाने हेतु अनवरत परमार्थ-पथ पर आरूढ़ रहे। आपने श्री चकौड़ी सन्त आश्रम में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री दूसरी पादशाही जी) के श्री चरणों में सिंध में कृपा करने के लिए विनय की। आपकी विनय स्वीकार कर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी सन् 1934 में अन्तिम बार लक्खी (सिन्ध) पधारे। वे आपको प्रथम दृष्टि में ही पहचान चुके थे कि आपका अवतार भी परमार्थ के कार्य को चलाने के लिए हुआ है, इसीलिए तो उन्होंने आपको साधु वेष प्रदान करते ही आपके अपने नाम पर ही उपदेश देने की आज्ञा दी थी। अब इस रहस्य को सबके सामने सांकेतिक भाषा में प्रकट करने लगे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) लक्खी (सिंध) में शहर के स्थान के चौबारे पर विराजमान थे और सप्ताह में एक बार संगत को नीचे आकर श्री दर्शन देने की कृपा करते थे। थोड़ी से देर संगत को श्री दर्शन देकर फिर बाहर घूमने के लिए चल देते थे। दूर-दूर से संगत श्री दर्शन के लिए आई हुई थी। एक दिन सारी संगत ने मिलकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री चरणों में विनय की कि आज वे अपने मुखारविन्द से प्रवचनामृत की वृष्टि करें। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने मुसकरा कर फ़रमाया- "संसार में जिसका बेटा समझदार और काम करने के योग्य हो जाता है, वह सारा कार्य अपने सुपुत्र को सौंपकर निश्चिन्त हो जाता है। स्वयं आराम करता है। अब हमारा यह प्रिय शिष्य (श्री स्वामी जी श्री तीसरी पादशाही जी की ओर संकेत करते हुए) कबीर (अर्थात बड़ा) हो चुका है। अब तुम लोगों को ये सत्संग सुनाएँगे और हम विश्राम करेंगे। जो इनके श्री वचनों पर चलेगा तथा उनपर आचरण करेगा वह हमारे आशिर्वाद का पात्र होगा।"
      महापुरुषों के रहस्य को कौन समझ सकता है कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कौन से आराम फ़रमाने के सम्बन्ध में वचन फ़रमा रहे थे। जब सन् 1936 में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी निजस्वरूप में लीन हो गए, तब उनका यह रहस्य सबपर प्रकट हुआ। यहां सिन्ध में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने सन् 1934 का दीपावलि पर्व मनाया। इसके पश्चात वे अन्य स्थानों में सत्संग-उपदेश करते हुए चकौड़ी सत्संग आश्रम में विराजमान हुए। 1934 की दीपावलि के पश्चात सब महात्माजनों को चकौड़ी सन्त आश्रम में बुलवाकर रूहानी उत्तराधिकारी के विषय में रहस्य प्रकट किया, जिसमें आपको (श्री स्वामी जी श्री तीसरी पादशाही जी महाराज को) रूहानी उत्तराधिकारी बनने के विषय में सबके सम्मुख वचन किये। पुनीत निर्देश श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के जीवन-चरित्र में आ चुके हैं।