सन्तन का स्वभाव यह, परोपकार पथ अपनाए ।
जैसे सूरज के तेज से, सकल विश्व चमकाए ।।
कमल कुमुदिनी का नेह, गगन में सूरज व चन्दा ।
पाकर निज निज इष्ट, होत हिय अति आनन्दा ।।
अपने ही स्वभाव से, बादल मेंह बरसावे ।
पाकर स्वाँति बूँद, पपीहा प्यास बुझावे ।।
ऐसे सन्त जन जगत की, करैं सदा भलाई ।
ज्योति अनामी लोक की, अर्शों से उतर कर आई ।।
अर्थ-
सत्पुरुषों का यह सहज ही स्वभाव है कि वे परोपकार के लिए ही प्रकट होते
हैं। वे समान भाव से सबकी भलाई करते हैं। सूर्य अपनी रोशनी हर घर, हर स्थान
पर फैलाता है और चन्द्रमा शीतलता प्रदान करता है। दोनों का अपने समय पर
उदय होने से सारे संसार में प्रकाश फैल जाता है। सूर्य के उदय होने से
कमल-पुष्प खिल उठता है, चन्द्रमा की शीतलता से कुमुदिनी खिल उठती है। सूर्य
और चन्द्रमा से रोशनी मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ती और नही उनसे यह कहा
जाता है कि अपनी किरणें इस भूमि पर फेंको, शीतलता प्रदान करो, अपितु वे
स्वयं ही यह सब कुछ करते हैं। चातक मेघों से बरसने के लिए याचना करे या न
करे, मेघ अपने उदार स्वभाव से जल बरसाता है। इससे चाहे कोई प्यास बुझाए,
खेती करे अथवा अन्य किसी उपयोग में लगाये यह सब की अपनी इच्छा पर निर्भर
है। इसी प्रकार ही सन्त महापुरुष भी सहज स्वभाव से ही परोपकार करते हैं।
उन्हें इस पथ पर चलते हुए अपने पर आने वाले कष्टों की चिंता नहीं होती। वे
अनवरत (लगातार) परिश्रम से जन-जन तक दिव्य ज्योति को फैलाने का भरसक
प्रयत्न करते हैं। इसी पथ को स्वीकार किया हुआ था श्री सद्गुरुदेव महाराज
जी श्री तीसरी पादशाही जी ने। उस अमर ज्योति का प्रकाश घट-घट में जगाने के
लिए उन्होंने स्थान-स्थान पर आश्रम तैयार करवाए तथा उपदेशक महात्मा भी
भेजे। स्वयं भी आश्रमों का निर्माण करवाकर इस ज्योति का प्रकाश सर्वत्र
फैलाया।
आपने मुख्य केन्द्र श्री आनन्दपुर को बनाया जो युग-युगान्तरों तक सर्व
प्रेमियों का मुख्य केन्द्र बना रहेगा। स्वयं भी जहां कहीं आश्रम की
स्थापना करते अथवा परमार्थ के लिए जाते पुनः श्री आनन्दपुर में ही लौट
आते। समय समय पर श्री सन्त नगर पधारकर इसका निर्माण कार्य कराते। यहां पर
सन् 1962 में श्री मौज अनुसार रेतीले प्रदेश में अंगूरों की बेलें लगवाईं
तथा सन्तरे, पपीते आदि के बगीचे भी लगवाये। जहां तहां लम्पे (कांटे) आदि थे
वहां आपने उन कांटो को साफ करवाकर निवास के लिए स्थान बढ़ाया और अंगूरों
का पार्क भी बना दिया। परन्तु यहां पर परमार्थ लाभ अर्थात प्रवचनामृत की
धारा तथा श्री दर्शन का सुलभ अवसर प्रेमियों को अधिक प्रदान किये। । यह
स्थान अभी भी निर्माणाधीन है, जिसे अब वर्तमान युक सम्राट श्री श्री 108
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी समय-समय पर जाकर उस कार्य
की पूर्ति कर रहे हैं।