एक
बार कुछ ब्राह्मणों ने मिलकर आपको अपने गृह पवित्र कराने के लिए अत्यधिक
आग्रह किया। आप उनकी प्रबल श्रद्धा एवं अनुरोध से उनके घर पधारे। उन्होंने
मीठे तेल से स्वादिष्ट भोजन बनाया। जब उन्होंने भोजन करवाया तो वे (पंड़ित)
प्रेम में इतने दीवाने हो गए कि तेल को गर्म करके सब्ज़ियों के ऊपर डालने
लगे। सबने इस भोजन को बड़े आनन्द से खाया। आप वहां पर दो-तीन घण्टे ठहर कर
पुनः बंगले पर लौट आये।
रात्रि समय जब वे पंडित सत्संग तथा श्री दर्शन के लिए आये तो अकस्मात किसी
भक्त ने उनसे पूछा कि यहां पर घी किस भाव मिलता है। आपने तो आज सब्ज़ियों
को खूब तर कर दिया। उन्होंने उत्तर दिया कि हमारे यहां तेल से सब वस्तुएँ
बनाने की प्रथा है। अतः हमने तेल से ही सब व्यंजन बनाए थे तथा ऊपर से भी
तेल ही डाला था। यह सुनकर भक्तजन चकित हुए कि किसी को भी तेल व घी का अन्तर
विदित न हुआ। उन भक्तजनों ने इस विषय में आपके श्री चरणों में भी विनय की।
आपने फ़रमाया कि उत्कट प्रेम और श्रद्धा की विशेषता ही यही है। आज यदि तेल
के स्थान पर पानी भी डाला जाता तो भी विदित न होता। केवल हार्दिक श्रद्धा
भावना ही सत्पुरुषों को प्रिय है। इस प्रकार से श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
उनके प्रेम की सराहना निज मुख से करने लगे।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी लगभग 20-22 दिन श्रीनगर में विराजमान रहे।
सैक्रेटरी साहिब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को भ्रमण के लिए महात्माजनों
सहित प्रसिद्ध स्थानों अर्थात चश्मा शाही, निसात बाग़, शालीमार गार्डन,
हार्वन लेक, डल झील आदि स्थानों पर ले गये तथा प्राकृतिक सुषमा में श्री
वचनामृत तथा श्री दर्शनों का भी लाभ प्राप्त करते रहे।
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