Thursday, July 14, 2016

13.07.2016

सन्त महापुरुषों की श्री मौज को समझना जीव-बुद्धि से परे है। जब तक कि वह स्वयं किसी भी रहस्य को जीव पर प्रकट न करें, जीव अपनी विचार शक्ति से उसे नहीं समझ सकता। उनकी प्रत्येक मौज में कोई न कोई गुप्त भेद छुपा हुआ होता है। इस तरह से देश-विभाजन के सम्बन्ध में तीन-चार बार ऐसे रहस्य भरे संकेत श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने किये थे, परन्तु उनको कोई भी समझ नहीं सका। आपने स्थान लक्खी ज़िला सक्खर (सिन्ध) में एक स्थान बहुत पहले बनवाया था। उसके साथ ही कुछ भाग 1937 में बढ़ाया गया। जब आपने नवम्बर 1939 में श्री आनन्दपुर में कृपा की तो उस समय पकी श्री मौज यह हुई कि लक्खी में जो आश्रम का भाग अभी-अभी बनवाया है, उसका सब सामान दरवाज़े, खिड़कियां, गार्डर इत्यादि श्री आनन्दपुर लाया जावे। सन् 1940 में महात्मा योग रोशनानन्द जी को श्री सद्गुरुदेव महाराज जी किसी काम से सिन्ध भेज रहे थे। आपने महात्मा जी को फ़रमाया कि नये मकान का सब सामान यहां (श्री आनन्दपुर) लाना है। महात्मा योग रोशना नन्द जी लक्खी जाकर महात्मा भक्ति ध्यानानन्द जी को यह श्री आज्ञा सुनाकर श्री आनन्दपुर लौट आये। जब महात्मा भक्ति ध्यानानन्द जी, महात्मा अमर प्रेमानन्द जी व लक्खी निवासी भक्तों ने यह बात सुनी तो बहुत हैरान हुए कि अभी तो इस मकान को बने तीन साल भी नहीं हुए, इस मकान को गिराने की क्यों श्री मौज हुई। परन्तु श्री आज्ञा शिरोधार्य कर उस मकान को गिराकर लोहे व लकड़ी का सब सामान रेलगाड़ी द्वारा श्री आनन्दपुर भेज दिया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी इस गुप्त भेद को जानते थे कि कौन-सा कार्य किस समय से सम्बन्ध रखता है। एक-दो सेवकों ने इस मकान के विषय में श्री चरणों में विनय करके पूछा, परन्तु श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने कोई भी उत्तर न दिया। यह रहस्य देश-विभाजन को बाद  सबको पता लगा कि इस सामान के यहां मंगवाने की क्यों श्री मौज हुई। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी का यह अभिप्राय था कि  जो कुछ भी परमार्थ हेतु लग जाए वही अच्छा है। परन्तु उस समय सन् 1940 में सब हैरान थे। सत्य है कि जीव अपनी बुद्धी से उनके किसी रहस्य को भी नहीं समझ सकता।
1930 से 1939 तक श्री आनन्दपुर में शरणागत परिवारों ने निवास के लिए केवल थोड़ा-सा टुकड़ा साफ़ कर झोपड़ियाँ बनाई थीं। स्थान-स्थान पर आक, तेन्दू, ढाक, पलास, कीकर आदि के घने वन थे व साथ में पथरीली धरती तथा ऊँचे-ऊँचे ढोंगे। आपने सर्वप्रथम सन् 1939 में यहां विराजमान होकर निवास स्थान का क्षेत्र बढ़ाने के लिए कँटीली झाड़ियों और आक-तेन्दू आदि के पौधों तथा वृक्षों को कटवाना प्रारम्भ किया। सभी लोग यह देखकर हैरान थे कि इस जंगल को कैसे आबाद किया जाएगा। धीर-धीरे सब की रुचि बढ़ती गई और सबने इस सेवा में भाग लिया। शरणागत परिवार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को पाकर अत्यन्त प्रसन्न थे। वे इस घने जंगल में श्री आज्ञानुसार रहकर सोचा करते थे कि क्या कभी यहां भी लोग आते-जाते दिखाई देंगे या केवल हम लोग ही यहां रहेंगे।

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