कुछ
सेवक तो आपका आश्रय लोकर अपने-अपने चकों पर श्री आज्ञानुसार चल दिए। कुछ
एक ने विनय की कि प्रभो! इतने घने वन में हिंस्न पशुओं से हमें भय लगता है।
कभी-कभी जब उन पशुओं के दहाड़ने की आवाज़ आती है, तो मन दहल उठता है।
भय-भंजन श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया- "जिस के पास सद्गुरु का
शब्द है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं है। जब भी जहां भय होने लगे श्री
सद्गुरुदेव जी का ध्यान करो। वे आपके सदा अंग-संग हैं। श्री परमहंस दयाल जी
की शक्ति आपके साथ है, घबराने की कोई ज़रूरत नहीं। निर्भय होकर कार्य करो।
सद्गुरु सदा अंग-संग हैं।" श्री आज्ञा पाकर सभी सेवक अपनी-अपनी सेवा में
जुट गये।
एक बार चक तासबावली (हरिनगर) पर महात्मा गोपाल श्रद्धानन्द जी, महात्मा
ज्ञान अमरानन्द जी तथा कुछ अन्य एक दो सेवक श्री आज्ञानुसार सेवा कर रहे
थे। वे दिन के समय तो वहां सेवा करते और रात्रि के समय शान्तपुर लौट आते।
कुछ दिन तो उन्होंने ऐसे ही किया। सात-आठ दिनों के पश्चात वे परस्पर
परामर्श कर वहीं रहने लगे। रात्रि के समय चारों ओर टांचियों का गोल घेरा
बनाकर बीच में आग सुलगा कर उसके किनारे सो जाते। एक बार रात को जब सब को
नींद आ गई तो आग भी सुलगते सुलगते बुझ गई। एक सिंह उस घेरे में घुस आया,
जिसके आने की किसी को भी आहट न हुई। वह सिंह एकदम महात्मा ज्ञान अमरानन्द
जी के वक्षःस्थल (छाती) पर खड़ा हो गया। अचानक उनकी चीख़ निकली। चीख़ को
सुनकर महात्मा गोपाल श्रद्धानन्द जी (जो पास ही सोए हुए थे) उठे और सिंह को
एक मुक्का दे मारा। भय के मारे वह सिंह भाग खड़ा हुआ। कोई जन-हानि तो न
हुई, परन्तु पंजे का निशान उनके वक्षःस्थल पर छप गया।
अब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की कृपा की ओर ध्यान दिया जाए तो क्या उनसे
कोई उऋण हो सकता है? सोचने की बात है कि क्या सिंह भी कभी एक मुक्के से
डरा? यह तो उस प्रभु की असीम कृपा थी। वे पूर्ण सद्गुरु के सेवक थे।
आज्ञापालन करने में जो सुख है, वह अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकता। परमसन्त
कबीर साहिब जी भी फ़रमाते हैं-
।। दोहा ।।
गुरु को सिर पर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं ।
कहै कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहिं ।।
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