साथ
में आये हुए सेवादार एक दो बार पहाड़ों पर घूमने गये और उन्होंने इन मनोरम
दृश्यों को देखा। दो-चार महात्मा-जनों को वहां अधिक सर्दी लग गई जिसके
कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। दो तीन महात्मा तो शीघ्र ही स्वस्थ हो गये,
परन्तु महात्मा सन्तोषानन्द जी अत्यधिक अस्वस्थ हो गए। अतः श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी ने 15 जून 1939 को श्रीनगर से चकौड़ी सन्त आश्रम के
लिए प्रस्थान किया। मार्ग में गुलमर्ग, खिलमर्ग होते हुए रात्रि समय
बारामूला ठहरे। 3 दिन यहां कृपा की, पुनः बारामूला से दुमेल होते हुए 19
जून को कोहमरी पहुँचे। यहां पर महात्मा धर्मात्मानन्द जी सत्संग करते थे।
इन्हें दो दिन पहले ही श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के शुभ आगमन के विषय में
विदित हुआ। ये रावलपिण्डी की काफ़ी सगत को साथ लिए मार्ग में सड़क पर खड़े
हुए थे। यहां पर भक्तों ने विश्राम तथा भोजनादि की पूर्ण व्यवस्था कर दी
थी। रावलपिण्डी के भक्तों ने अत्यधिक आग्रह किया, परन्तु व्यासपूजा में
थोड़े दिन होने के कारण आपने फ़रमाया कि फिर कभी यहां कृपा करेंगे, अब सभी
प्रेमीजन हमारे साथ ही चकौड़ी सन्त आश्रम चलें। कुछ भक्तजन जैसे वहां खड़े
थे वैसे ही आप के साथ में आई हुई महात्मा तथा भक्तजनों की बस में आ गए। इस
प्रकार मार्ग में सब प्रेमियों को कृतार्थ करते हुए 24 जून 1939 को एक मास
पश्चात चकौड़ी सन्त आश्रम में लौट आए।
यहां
व्यासपूजा का पर्व मनाना था। महात्मा सन्तोषानन्द जी की दशा अति शोचनीय
थी। व्यासपूजा से एक-दो दिन पहले जबकि महात्मा संतोष आनन्द जी के बचने की
कोई आशा न रही, तो रात्रि समय महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी ने श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी के चरणों में श्री दर्शन देने के लिए विनय की। उस समय
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी चकौड़ी आश्रम में चौबारे पर विराजमान ते। वहां
से नीचे आए। महात्मा जी को श्री दर्शन दिये। महात्मा जी ने काँपते हुए केवल
इतने ही शब्द कहे कि "अभी तो मेरी सेवा करने की इच्छा थी।" श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी ने स्वाभाविक ही फ़रमाया कि तुम तो ठीक हो रहे हो।
स्वस्थ होकर सेवा ही तो करनी है। सब देखकर हैरान हो रहे थे कि इस समय तो
इनका बचना भी मुश्किल है, सेवा कैसे करेंगे? श्री सद्गुरुदेव महाराज जी तो
श्री दर्शन देकर ऊपर चले गये। इधर महात्मा जी रात्रि भर तो शोचनीय अवस्था
में पड़े रहे। प्रातः होने तक उन्होंने अपने आपको कुछ स्वस्थ पाया और
धीरे-धीरे स्वस्थ होकर श्री दरबार की सेवा में संलग्न हो गये और अन्तिम
स्वांस तक पावन श्री दरबार की सेवा करते रहे।
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