अब
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही जी) ने शरणागति का मार्ग
खोल दिया। आपने जन-जन में इन अमृत वचनों का प्रभाव भर दिया तथा श्री
कृष्णचन्द्र जी महाराज व श्री रामचन्द्र जी के सिद्धान्त व नियमों को पुनः
दोहराया। आप स्वयं निज मुख से फ़रमाया करते थे- "जो जीव एक बार पूर्ण गुरु
की शरण में आ जाता है, उसे काल व माया धोखे में नहीं डाल सकते; उसे धर्मराज
व यमदूत का भय नहीं रहता।
श्रीरामचन्द्र जी महाराज ने भी फ़रमाया है-
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ।।
(वाल्मीकि रामायाण) 06/18/33
मेरी शरण में आने के लिए जो एक बार दिल से यह कह देता है कि हे नाथ! मैं आपका हूँ तो मैं उसे सर्व भूतों से निर्भय कर देता हूँ।
श्री कृष्णचन्द्र महाराज जी ने परम सखा अर्जुन को भी यही उपदेश दिया है-
।। शेअर ।।
दिल से तू मेरे ह्वाले कर तमाम अफ़आल को ।
बे-ख़तर और बे-तमन्ना जंग में मश्ग़ूल हो ।।
मेरी इस तल्क़ीन के जो बे-तअस्सुब आदमी ।
दिल से पैरो है उन्हें हासिल है दायम मख्लसी ।।
मख़्ज़ने-असरार 3/30-31
हे
अर्जुन! तू अपने सभी कर्मों को मेरे हवाले करके निर्भय और कामना-रहित होकर
संग्राम में भाग ले, क्योंकि जो पक्षपातरहित होकर मेरे इन वचनों को दिल से
मानकर उसपर अमल करता है, वह सदा कालचक्र से मुक्त रहता है।
यहां
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने माया तथा भक्ति के संघर्ष से जूझने के लिए
यही उपदेश दिया कि यदि सब इच्छाओं का त्यागकर शुद्ध मन से शरण ग्रहण करो तो
सद्गुरु तुम्हें समस्त चिंताओं से विमुक्त कर देंगे। दूसरे शब्दों में-
"मन की साधना और वैराग्य- दोनों शरणागति के अभिन्न अंग हैं।" मन को साधने
के लिए आपने गुरु-आज्ञा और गुरु-सेवा को आवश्यक बताया जिसका नाम गुरु-भक्ति
है और आत्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए आन्तरिक शब्द की कमाई अर्थात्
भजन-अभ्यास दोनों पर बल दिया है। सत्पुरुषों के वचन हैं-
मोटे बन्धन जगत के, गुरु भक्ति से काट ।
झीने बन्धन चित्त के, कटैं नाम परताप ।।
कई
प्रेमी जो इस भक्ति के इच्छुक थे, श्री अमृत प्रवचनों को श्रवण करते ही
तथा श्री दर्शन की मनोहारी छटा को निहारते ही प्रेमी बन गये। वे श्रीचरणों
में सर्वस्व समर्पण करने के लिए विनय करने लगे। आपने उनकी विनय स्वीकार कर
श्री चरणों में स्थान दिया। इस प्रकार से कुछ परिवारों ने आपके श्री चरणों
में सर्वस्व समर्पित कर शरणागति प्राप्त की तथा श्री दरबार में रहकर
हित-चित्त से सेवा करने लगे।
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