यदि
माया में शान्ति होती, तो सन्त महापुरुष आपको कुछ न कहते। यदि थोड़ा-बहुत
नुकसान होता, तो भी न कहते। लेकिन यह जन्म-जन्मांतरों का धोखा है। करोड़ों
जन्मों के पुण्यों से इस मनुष्य जन्म का संयोग मिला है। धनी धर्मदास जी भी
कहते हैं-
।। दोहा ।।
भक्ति प्रभाव मिटी सकल, धर्मदास की पीर ।
कोटि जन्म के पुण्य से, सतगुरु मिले कबीर ।।
हम
आपको धन-माया, माल-परिवार से अलग नहीं करते, किन्तु इनके मोह से छुड़ाते
हैं, क्योंकि ये सब सम्बन्ध दुःखदायी हैं। हम इसके बदले में आपको भक्ति
देना चाहते हैं, जो शान्ति तथा आनन्द का भण्डार है। जिन्होंने माया का सब
भार सद्गुरु को अर्पित किया है, सद्गुरु उनके ज़िम्मेवार बनते हैं।
किसी
भी प्राणी से जिसके पास माया अधिक हो पूछ लीजिए कि क्या वह सुखी है? माया
से न किसी को सुख मिला है न मिलेगा। अब आप लोग माया चाहते हैं या भक्ति?
सबने भक्ति की मांग प्रकट की। आपने फ़रमाया कि जो भक्ति चाहता है, उसे
सत्पुरुषों के आदेशानुसार चलना होगा। यदि आप सभी भक्ति के ग्राहक हैं तो
ऐसी सच्ची भावना पर सत्पुरुषों को प्रसन्नता है।
गुरुमुख
को मन-माया के धोखे में नहीं आना चाहिए। मोह-माया, कुटुम्ब-परिवार की
संगति में वही मिलेगा जो उनके पास होगा। उनके पास सिवाय दुःख व अशान्ति के
और कुछ भी नहीं मिलेगा। सन्त महापुरुषों का काम तो आपको माया से छुड़ाना और
भक्ति देना है। यह कोई छुपी हुई बात नहीं कि सद्गुरु माया के बन्धनों से
छुड़वाकर भक्ति देते हैं। यह सीधी सच्ची बात है। महापुरुष तो बार-बार यही
कहेंगे कि जो मन-माया की तरफ तुम्हारा ख्याल दिलवाये, उसके धोखे में मत आओ।
सत्पुरुष तो यही कहते हैं कि माया के मोह को छोड़ो, भक्ति के प्यार को
ग्रहण करो।
सन्त महापुरुषों के वचनों पर चलो। सन्त महापुरुष कहते हैं कि तुम माया के
मुकाबले में डटे रहो, मुकाबले पर डटने वाला सूरमा कहलाता है। तुम सूरमा हो,
कायर मत बनो। संकल्प भी माया के न उठाओ। माया के संकल्प में अशान्ति है।
यदि सन्त महापुरुषों के वचनों को भूल गये तो हानि होगी, तुम माया के गुलाम
बन जाओगे। सन्त महापुरुष कहते हैं कि माया के गुलाम न बनकर माया के मालिक
बनो। दुनिया तो माया की गुलामी में खुश होती है। गुलाम और मालिक में कितना
अन्तर है! सन्त महापुरुष आपको मालिक बनाते हैं। आप सब गुरुमुख हैं। आपको
माया के धोखे में नहीं पड़ना चाहिए। आप भक्ति करो। कायर न बनो, सूरमा बनो।
सन्त
महापुरुषों की आज्ञा मानो। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की प्रसन्नता
प्राप्त कर उन्हीं का रूप बन जाओ। यही भक्ति का परिणाम है। यही जीव की अपनी
पूँजी है।
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