Friday, July 15, 2016

14.07.2016

सन् 1936 में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने श्री आनन्दपुर में निवास करने वाली बाइयों (स्त्रियां साधु वेष में) को चकौड़ी सन्त आश्रम में बुलाकर विभिन्न स्थानों पर सत्संग-प्रचार के लिए भेज दिया था। अब सन् 1940 में जबकि आप श्री आनन्दपुर में विराजमान थे तो एक प्रेमी ने आपके श्री चरणों में विनय की- "प्रभो! क्या इस देश में हम फिर साधु मण्डली को इन आँखों से देख पाएँगे? आपने फ़रमाया- "ऐसी क्या बात है। यहां तो एक समय ऐसा आयेगा, जबकि सबके नाम के (अर्थात जड़ तथा चेतन के नाम के) अन्त में 'आनन्द होगा अर्थात चेतन (मनुष्य रूप में) सभी साधु होंगे था यहां की प्रत्येक जड़ वस्तु अर्थात पाठशाला, प्रेस आदि सबके साथ आनन्द होगा। यहां पर बहुत रौनक होगी।" वह प्रेमी यह सब सुनकर हैरान हो गया कि कौन संसार की झिलमिल को छोड़कर इस सूनेपन को स्वीकार करेगा। उसे क्या मालूम कि मायापति जिधर भी संकेत करें, माया की रचना सब पीछे-पीछे चली आती है। यह तो उनके लिए साधारण-सा काम है।
      सचमुच आज ये सब कुछ हमारे सामने प्रकट रूप में है। जिस प्रेमी गुरुमुख को श्री सद्गुरुदेव जी साधु-वेष प्रदान करते हैं, उसके नाम के अन्त में 'आनन्द' अवश्य होता है। श्री आनन्दपुर में अन्य नाम जैसे आनन्द माध्यमिक विद्यालय, आनन्द धाम, श्री आनन्दसर, आनन्द प्रिंटिंग प्रेसादि सब वस्तुओं के नाम भी 'आनन्द' पर रखे जाते हैं। ठीक ही तो है जहां हर समय आनन्द बरस रहा हो, वहां आनन्द के अतिरिक्त और नाम आयेगा भी कहां से?

No comments:

Post a Comment