Thursday, July 21, 2016

16.07.2016

आपने श्री आनन्दपुर की रूपरेखा श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) के वचनानुसार बनाई कि सारे वन को काट कर फलदार वृक्ष, लहलहाते खेत, पुष्प-सुरभित उद्यान एवं भव्य भवन होने चाहियें। गुरुमुख प्रेमी व नये शरणागत भक्ति व आज्ञा की सीढ़ी पर कदम रख चुके थे। वे श्री आज्ञा के लिए सदा तत्पर रहते। आपने भी सम्पूर्ण ध्यान श्री आनन्दपुर के निर्माण में केन्द्रित कर लिया। अब झोंपड़ियों के स्थान पर पत्थरों के मकानों की रचना आरम्भ हो गई। साथ ही साथ भूमि साफ़ कर शरणागतों की आवश्यकता पूर्ति के लिए अन्न बोया जाने लगा। प्रथम खेती बैलों द्वारा हल चलाकर की जाने लगी। धीरे-धीरे सब साधनों में विकास होता गया। सब सुख के साधन यहां सुलभ होने लगे।
      सर्वप्रथम यहां पानी की कमी अनुभव हुई। यहां एक सरकारी कुआं था जो गर्मियों में सूख जाता था। इस कमी को पूरा करने के लिए पानी दो-तीन मील पर स्थित कुलवार चक तथा शान्तपुर चक से टंकियों द्वारा लाया जाता था। बाल्टियों व मटकों से पौधों को पानी दिया जाता। इस विचित्र लीला को देखकर प्रेमी दंग थे कि कैसे यहां जीवन के साधन सुगम हो सकते हैं। उस समय शारीरिक भरण-पौषण की आवश्यक सामग्री यहां से तीन मील की दूरी पर स्थित ईसागढ़ से लाई जाती थी। अब अपने यहां (श्री आनन्दपुर में) ही उपज आरम्भ कर दी गई। कभी-कभी सेवक यदि बंजर और पथरीली भूमि को खोदने से घबरा जाते तो आप उनको उपदेश देकर उत्साह बढ़ाते ।
।। दोहा ।।
अलट राज महाराज का, जा में अटक बहाय ।
जाके मन में अटक है, वो ही अटक रह जाय ।।
      इस प्रकार से सेवक प्रेमी गुरुमुख व शरणागत सेवा में जुट जाते। इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में निवास स्थान, उपज व उद्यानों के लिए भूमि साफ़ हो गई। चारों और पक्की चारदीवारी (कोट) बन गई। अब झोंपड़ियों के स्थान पर चिनखारी व ईंटों के मकान दिखाई देने लगे। कुछ-कुछ हरियाली के चिन्ह झलकने लगे। उस समय शरणागतों की संख्या भी गिनी चुनी ही थी। मध्य प्रदेश में आना सिन्ध व पंजाब के लोगों को ऐसे मालूम होता था जैसे विदेश। फिर भी श्री दर्शन के लिए अत्यधिक श्रद्धालु तथा प्रेमीजन आते ही थे। यहां  आरम्भ में केवल श्री व्यासपूजा का एक ही पर्व मनाया जाता था। यहां के शरणागतों का जीवन देखने में चाहे साधारण व कठिन था, लेकिन ऐसा जीवन तो किसी भाग्यशाली को ही प्राप्त होता था। कितना आनन्दमय जीवन था उनका, कितने भाग्य थे उन जीवों के जो उस समय शरण में आए। त्रिलोकीनाथ, हृदय सम्राट, श्री सद्गुरुदेव जी सन्त रूप में साथ रहते, अनुपम लीलाएँ करते, निज कर-कमलों से भोग-प्रसाद हर सयम खिलाते, समीप बैठा कर श्री दर्शन से आनन्दित करते। जहां-जहां प्रेमी सेवा करते वहीं स्वयं चल कर जाते। जिन योग-योगीश्वर को योगी-तपस्वी जंगल में, पानी में खड़े होकर, उलटे लटक कर प्राप्त करना चाहते हैं, वे कृपा-सागर प्रभु प्रेमियों के पाश में बँधे हुए यहां विराजमान होकर श्री दर्शन से कृतार्थ करते।

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