सत्संग
सुनकर मनुष्य के मन में नाम की प्राप्ति की लगन बढ़ जाती है। जब लगन बढ़ती
है तो प्रकृति भी सहायता करती है और उसका मिलाप सन्त-सद्गुरु से हो जाता
है। भाग्यशाली जीव सन्त-सद्गुरु से नाम की प्राप्ति कर उसका अभ्यास करके
जन्म-मरण के दुःखों से छुटकारा पाकर सच्चा सुख प्राप्त कर लेता है। यही
मनुष्य-जन्म का वास्तविक लाभ है।
जब संगत चली गई तो महात्मा परम विवेकानन्द जी से ( जो भक्त वेष में थे)
आपने पूछा- क्या यहां सत्संग सदा होता है? महात्मा जी ने विनय की- प्रभो!
यहां कोई सत्संग नहीं होता। आपने फ़रमाया-" वह भी कोई शहर है जहां सत्संग
नहीं होता। तुम यहां सत्संग करना आरम्भ कर दो।" महात्मा जी का कहना है कि
सत्संग करना तो मैं जानता नहीं था, परन्तु यह विश्वास था कि जिन्होंने श्री
आज्ञा प्रदान की है वह कार्य करने की शक्ति भी स्वयं प्रदान करेंगे।
महात्मा जी ने शहर के कुछ व्यक्तियों से सत्संग आरम्भ करने की बात कही।
उन्होंने कहा कि यहां पहले बड़े-बड़े महात्मा सत्संग करने का प्रयत्न कर
चुके हैं, सफलता नहीं मिली। यहां की धरती भी पथरीली है और मनुष्यों के दिल
भी पत्थर जैसे हैं। महात्मा जी ने यह सब वृत्तान्त श्री सद्गुरुदेव महाराज
जी के श्री चरणों में सुनाया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया- "
अमूल्य हीरे-लाल भी पत्थरों में दबे हुए होते हैं। हीरे-लालों की उत्पत्ति
भी पत्थरों में से होती है। वे परिश्रम करने से ही निकलते हैं।"
श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने पुनः कहीं अन्यत्र कृपा की।
उनके पधारने के बाद महात्मा जी ने सत्संग का कार्य श्री वचनानुसार आरम्भ
किया। धीरे-धीरे संस्कारी रूहें श्री दरबार की महिमा सुनकर मोह-माया रूपी
पत्थरों को हटाकर बाहर निकलती आईं। भाव यह कि भक्तों की संख्या बढ़ गई और
सत्संग का कार्य अच्छा चलने लगा। सत्संग के लिए एक आश्रम बनवाया गया जहां
सैकड़ों भक्त लोग सत्संग से लाभ उठाने लगे। झंपीयर शहर के लोग कहने लगे कि
जो काम पहले किसी से न हो सका, वह कार्य श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के
संकेतमात्र से हो गया। निस्सन्देह श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कोई अद्वितीय
शक्ति है। झंपीयर शहर और उसके आसपास के क्षेत्र से कितने ही व्यक्ति शरण
में आए और श्री दरबार की सेवा करते-करते बाद में साधु बन गये। उमें से
महात्मा अमर सत्यानन्द जी व महात्मा अमर सुखानन्द जी मुख्य थे। उन्होंने
श्री गुरुदरबार की सेवा के साथ अनेक जीवों को परमार्थ-पथ दर्शाया।
श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी त्रिकालदर्शी हैं, जिन्होंने आरम्भ में ही यह फ़रमा
दिया कि परिश्रम करने से पहाड़ों में से अनमोल रत्न भी निकल आते हैं। वे
अपनी संस्कारी रूहों को स्वयं जानते थे, इसलिए अपने साथ उन्हें मिलाने का
कोई न कोई कारण बन ही गया। झंपीयर में सत्संग का कार्य आरम्भ कराने का यही
उनका तात्पर्य था। महापुरुषों की महिमा का कोई पार नहीं पा सकता।
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