चकौड़ी
सन्त आश्रम में व्यासपूजा का पर्व मनाने के पश्चात् आप स्थान गरेला
(सिन्ध) पधारे। यहां दीपावलि का शुभ पर्व मनाया तथा इसके पश्चात् अक्टूबर
1939 के अन्तिम सप्ताह में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी स्थान डेलाचट्ठा
ज़िला गुजरांवाला में विराजमान थे। पंजाब में काफ़ी सगंत वहां श्री दर्शन
के लिए आई। यहां पर आपने प्रेमियों को फ़रमाया कि पंजाब छोड़ने की कोशिश
करो। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने यहां कुछ दिन विराजमान रह कर श्री
आनन्दपुर की ओर प्रस्थान किया। संगतों के लिए लंगर का सामान, बर्तन, तम्बू
(Tent) और कुछ बिस्तर आदि सन्त आश्रम चकौड़ी से मंगवाये थे। यह सब सामान
स्थान चकौड़ी वापस भेजने की अपेक्षा श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने श्री
आनन्दपुर साथ ले जाने की मौज प्रकट की। महात्मा अखण्ड प्रकाशानन्द जी ने
श्री चरणों में विनय की कि प्रभो! इस सामान की श्री आनन्दपुर साथ ले जाने
की क्या ज़रूरत है? ले जाने और फिर वापस लाने की मेहनत ही है। वहां की
ज़रूरत उधर से सामान मंगवाकर पूरी कर ली जावेगी। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
ने फ़रमाया कि यहां किसने लौटना है। यह सब सामान साथ ले चलो। इसके
अतिरिक्त और भी कोई सामान जो उनके पास पड़ा हो, श्री आनन्दपुर भेज दो।
श्री
आज्ञानुसार सब सामान साथ रख लिया गया। श्री आनन्दपुर आते समय रास्ते में
ग्वालियर के पार्क होटल में महात्मा रोशनानन्द जी को सायं समय एकान्त में
फ़रमाया कि इस समय देश की परिस्थितियां कुछ बदल रही हैं। इसलिए हम पुनः
पंजाब नहीं जाएंगे और तुम्हें भी श्री आनन्दपुर में रखना चाहते हैं। अब तुम
सत्संग का कार्य न करो। महात्मा जी ने विनय की कि प्रभो! जैसी श्री मौज
हो, वही सेवा की जायेगी।
श्री आनन्दपुर पहुँचने पर सब सामान काम में लाया गया। श्री सद्गुरुदेव
महाराज जी ने अपनी मौज सब पर प्रकट की कि यहां (श्री आनन्दपुर में) बहुत सा
काम करवाना है। इसलिए जब तक यहां स्थायी रूप से निवास न होगा, सब काम
पूरा न हो सकेगा। परन्तु देश-विभाजन के विषय में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
ने जानते हुए भी किसी पर यह रहस्य प्रकट न किया। सन् 1947 में देश विभाजन
होने पर यह रहस्य सब पर प्रकट हो गया कि किसलिए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
ने सारा सामान लाने को कहा था। प्रकृति के रहस्य तो केवल प्रकृति के नायक
पूर्ण सद्गुरु ही जान सकते हैं।
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