Wednesday, July 13, 2016

13.07.2016

इस प्रकार जब अमृत वचन हुए तो सबके हृदय शीतल हो गये। सब गुरुमुखों में भक्ति के लिए एक नया उत्साह भर गया। सब गुरुमुखों ने इस अमृत को जी भर कर पिया और अन्त में जयकारों की ध्वनि से आकाश को गुँजा दिया।
      आपने सेवा का भण्डार खोल दिया। जो शरणागत प्रेमी तथा दर्शनार्थ संगतें आई थीं, उनको सेवा का शुभ अवसर प्रदान किया। जहां सेवा का कार्य आरम्भ होता, वहां पर आप पलंग अथवा आसन पर विराजमान हो जाते। इससे सेवकों में नया साहस आ जाता और सभी सेवा में मन-चित्त लगाकर जुट जाते।
      सीमाप्रान्त, पंजाब तथा सिन्ध से आई हुई संगतों ने श्री चरणों में अपने-अपने प्रान्तों में पुनः चरण-स्पर्श करने के लिए विनय की। आपने फ़रमाया- ''अब सयम बदलने वाला है। तुम्हें भी अपना उद्योग-धन्धा (कारोबार) मध्यप्रदेश, राजस्थान अथवा उत्तर प्रदेश में करने में लाभ है। हमने अब श्री आनन्दपुर में बहुत सा काम करना है। इसलिए हमारा उधर जाने का विचार नहीं।" आई हुई संगतों में से कुछ लोग तो निराश होकर लौट गये। कुछ एक आज्ञानुसार मौज देखकर मध्यप्रदेश में ही रोज़गार करने लगे। चार-पाँच वर्ष बीतने पर जब देश में कोई परिवर्तन न हुआ तो लोग वापस पंजाब तथा सीमाप्रान्त की ओर जाने को तैयार हो गये। शारीरिक सुख जितना उनको पंजाब व सीमाप्रान्त में मिलता था, इस प्रान्त (मध्य प्रदेश) में न मिल सका। उद्योग-धन्धों में भी उन्नति न हुई। कुछ लोगों को मध्य प्रदेश का जलवायु अनुकूल न आया। इसलिए कुछ थोड़े से परिवारों के सिवाय सब के सब परिवार वापस जाने लगे। इनमें भक्त मोहन लाल मखीजा मुलतान निवासी भी थे। भक्त मोहन लाल मखिजा पहले तो मध्य प्रदेश में रहे, परन्तु 1945 में वापस लौट गये।    
      एक प्रसिद्ध ज्योतिषी जो भक्त मोहन लाल मखीजा का हार्दिक मित्र था, उसने भक्त जी को कहा कि तुम इस तरफ क्यों लौट आये? तुम्हारा मध्य प्रदेश जाने का समय तो अब ही था। फिर उसने खुले शब्दों में कहा - "तुम्हें अपने इष्टदेव के वचनों पर विश्वास रखकर अब वापस नहीं आना चाहिए था।" वे इस रहस्य को फिर भी न समझ सके और न ही किसी अन्य ने उस समय श्री वचनों के रहस्य को समझा। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने देश-विभाजन के विषय में जो वचन किए थे, वे विभाजन होने पर पुनः स्मरण हो आये।
      उसके बाद 1947 में जो घटना हुई, वह सबके सामने प्रत्यक्ष है। जिन-जिन कठिनाइयों व आपत्तियों का सामना उधर के लोगों को करना पड़ा, वह किसी से छुपा हुआ नहीं।
      वे लोग सब सम्पत्ति, मकान, जायदाद आदि लुटवाकर खाली हाथ जान बचाकर भारत लौट आये। जब वही लोग 1947 के बाद श्री दर्शन के लिए श्री आनन्दपुर आये तो श्री चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और विनय की- प्रभो! हमने आपके वचनों पर विश्वास न किया जिसके कारण हमें अपने किए हुए कर्मों की सज़ा मिल चुकी है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया-
जा के मन बिस्वास है, सदा गुरू हैं संग ।
कोटि काल झक झोलही, तऊ न ह्वै चित भंग ।।
                              परमसंत श्री कबीर साहिब जी
सद्गुरु के वचनों पर विश्वास करना ही गुरुमुख की पूँजी है। हमने तो आपके लाभ के लिए कहा था, जिन्होंने वचनों पर विश्वास किया उन्होंने लाभ उठा लिया। यह भी ईश्वर का धन्यवाद करो कि तुम्हारी जीन बच गई ।

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