श्री सन्त नगर
उठी जब मौज परमार्थ की, नई दुनिया बसाने को ।
जन्मों से भटकी रूहों को, भक्ति मग दर्शाने को ।।
अमर ज्योति की किरणें दिव्य, घट घट में जगाने को ।
चले सम्राट आनन्दपुर के, बिछुड़ी रूहें मिलाने को ।।
चले धरती की पुकार सुनकर, एक वन में आ पहुँचे ।
आए हैं राहनुमा बनकर, राह दिखाने आ पहुँचे ।।
अहो! यह कितना शान्त स्थल, कुदरत ने बनाया है ।
करुणा कर प्रभु ने यहाँ, श्री सन्त नगर बसाया है ।।
श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी ने सन् 1946 में महात्मा सत विचारानन्द जी को अपनी
मौज बताकर सब जगह पर इस अमर ज्योति का प्रकाश फैलाने के लिए उनके साथ
राजस्थान में पदार्पण किया। यहां पर सब स्थानों अर्थात ज़िला धौलपुर से आगे
सब ज़मीन कार पर घूमकर देखी, लेकिन सन्त महापुरुष तो सचखंड से उतरे हुए
नक्शे को ही ढूँढते हैं। अतः घूमते-घूमते तहसील बाड़ी के समीप ही उन्होंने
सलीमाबाद स्थान को संसार की झिलमिल से दूर शान्त एकान्त वातावरण को अपने
परमार्थ का उचित स्थान समझा। तब जन कल्याण हेतु इसे खरीदने के लिए सेवकों
को आज्ञा प्रदान की। श्री आज्ञानुसार सेवकों ने 3 अगस्त 1946 को इसे ख़रीद
लिया। यहां पर दो-चार मकान केलव आरम्भिक निवास के लिए बनवाए और यहां आश्रम
की स्थापना कर इसका शुभ नाम श्री सन्त नगर रखा। इससे राजस्थान, यू.पी.,
दिल्ली, पंजाब के समीप रहने वाले जिज्ञासुओं व प्रेमियों को श्री दर्शन
रूपी अमृत का पान करने में सुविधा हो गई। श्री आनन्दपुर निवास इसे 'नई
दुनिया' के नाम से पुकारते थे कि अब श्री सद्गुरुदेव जी महाराज 'नई दुनिया'
बसाने के लिए, अपनी बिछुड़ी रूहों को मिलाने के लिए गए हुए हैं।
यहां पर आप समय-समय पर पधार कर श्री पावन वचनामृत से सर्वसाधारण को
कृतार्थ करते। सत्संग उपदेश के साथ-साथ आपने इस आश्रम में संगतों के निवास
के लिए उचित स्थान (कमरे), भोजनालय (लंगर), सत्संग हाल का निर्माण करवाया
जिससे दर्शनार्थी यात्रियों को असुविधा न हो। कितनी कृपालुता है सन्त
महापुरुषों की कि घर बैठे ही नाम की संजीवनी तथा श्री दर्शन का अमृत जाम
पिलाते हैं- हम कलियुगी जीवों को! जिस मालिक की प्राप्ति के लिए सत्ययुग,
त्रेता, द्वापर में लोग हज़ारों वर्ष तपस्या करते थे परन्तु दीदार नहीं कर
पाते थे, वही मालिक सन्त स्वरूप में इसी कलि के जीवों का उद्धार करने हेतु
स्थान-स्थान पर ही दर्शन देकर कृतार्थ करते हैं। सन्त महापुरुषों के
परोपकारों का किस प्रकार वर्णन किया जाए? सत्पुरुषों की महानता का वर्णन
महाराज भर्तृहरि जी ने इस श्लोक में इस प्रकार किया है-
।। श्लेक ।।
पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति,
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम् ।
नाभ्यर्थितो जलधरोपि जलं ददाति,
सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः ।।
(नीतिशतक 74)
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