एक
बार 1944 में कुछ संगत श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री दर्शन के लिए आई।
उनमें एक भक्त जो ऑफ़िसर था, श्री दर्शन के लिए पंजाब से आया। उस भक्त ने
महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी को कहा कि मैं अपने साथ नौकर नहीं ला सका। एक
नौकर का प्रबन्ध मुझे कर देवें। महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी ने कहा नौकरों
का तो यहां कोई प्रबन्ध नहीं है। हम अपने शरणागतों में से एक लड़का आपकी
सेवा में लगा देते हैं जो आपकी हर प्रकार की सेवा करेगा। आपको किसी प्रकार
का कष्ट न होगा। यह बात होने पर महात्मा जी ने एक लड़का उस ऑफ़िसर की सेवा
में लगा दिया। वह भक्त आठ दिन श्री आनन्दपुर में रहा और वह लड़का उस भक्त
का सब काम करता रहा।
जब वह भक्त जाने लगा तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के चरणों में उपस्थित
होकर काफ़ी लोगों के सामने उसने विनय की कि भगवन्! हम घर में नौकरों से काम
लेते हैं, परन्तु जितनी हमें उनसे सिरदर्दी करनी पड़ती है उतना नौकर काम
नहीं करते। वे वेतन भी लेते हैं फिर भी सिरदर्दी बहुत करनी पड़ती है तब
कहीं उनसे काम कराते हैं। मगर यहां जिस लड़के ने आठ दिन मेरे पास काम किया
है, केवल पहले दिन मैंने उसे समझा दिया कि मेरा यह काम इस समय करना है।
उसके बाद प्रत्येक वस्तु मुझे तैयार मिलती रही। कमरा साफ़ करना, चाय-पानी
पिलाना, बर्तन साफ़ करना, लंगर से भोजन लाना और जो काम था किसी काम के लिए
मुझे दोबारा नहीं कहना पड़ा और विशेष बात यह है कि इन बच्चों के हृदय में
किसी प्रकार का लोभ नहीं है। बिना स्वार्थ के काम करना ऐसा नज़ारा अपने
जीवन में मुझे पहली बार देखने को मिला है। चाहे मैं ऑफ़िसर हूँ, मुझे घर
में व दफ़्तर में भी नौकरों से काम करवाना पड़ता है, परन्तु पूरा वेतन लेते
हुए भी वे ठीक काम नहीं करते और यहां जब एक बच्चे के अन्दर ऐसी काम करने
की उमंग है तो बड़ों के विचार कितने उच्च होंगे। गीता में मैने कईं बार
पढ़ा है कि भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी महाराज ने अर्जुन को निष्काम कर्म
करने का उपदेश दिया है- मैं दिल में सोचता था कि इस उपदेश पर आचरण कैसे
होता होगा। अब प्रत्यक्ष मैंने अपनी आँखों से देखा कि निष्काम कर्म करने का
साक्षात प्रमाण यहां श्री आनन्दपुर दरबार में मिलता है। यहां सब आदमी बिना
किसी सकामता के अपनी ज़िम्मेवारी को निभा रहे हैं। ऐसी ऊँची शिक्षा जो
आपने यहां कि निवासियों को दी है, उससे सबके जीवन धन्य हो गए हैं। और मैंने
भी इन आठ दिनों में जो बातें देखी हैं सब प्रशंसनीय हैं। सब लोग अपने
कर्तव्य का पालन बहुत ही अच्छी तरह से करते हैं। एक विशेष बात यह है कि
बच्चे से बूढ़े तक कोई भी निष्क्रिय (निकम्मा) नहीं रहता। किसी के कहे बिना
सब अपने-अपने काम पर पहुँच जाते हैं। व्यवहार का काम करते हुए भी सबके मन
में शान्ति हैं।
इस प्रकार श्री आनन्दपुर में सन् 1939 से सन् 1946 तक आपने प्रेमी,
गुरुमुख व शरणागतों में नया साहस भर कर कंटीली झाड़ियों से युक्त श्री
आनन्दपुर के कुछ भाग साफ़ करवाए, निवास के लिए सुरक्षित स्थान तैयार करवाए
तथा कुछ उपज भी अधिक आरम्भ हो गई। पानी की असुविधा बावलियों से कुछ सीमा तक
कम हो गई। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सेव-भक्ति तथा श्री दर्शन की
मस्ती में प्रेमियों को ऐसे रंग दिया कि वे अब एक क्षण भी प्राणेश प्रभु से
अलग नहीं होना चाहते थे। उनका जीवन, उनके प्राण, उनके सर्वस्व, हृदय
सम्राट तो आप ही बन चुके थे। आपने तो सर्व सृष्टि में परमार्थ-भक्ति का
सन्देश देना था। इसीलिए आपने प्रेमियों को फ़रमाया कि हमने कुछ दिन के लिए
किसी स्थान की खोज में जाना है, हम शीघ्र लौट आयेंगे। शरणागत प्रेमी इस
आज्ञा को सुनकर कुछ उदास हो गये। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सबको धैर्य
दिया और परमार्थ एवं भक्ति के निमित्त सर्वसाधारण के कल्याण के लिए उस भूमि
की खोज के लिए प्रस्थान किया जो उन्हें आतुर स्वर से पुकार रही थी।
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