एक
भक्त था। उसने एक बार श्री मुख से ये वचन सुने कि जो कोई गुरु को प्रसन्न
करना चाहता है, वह दिल-जान से सेवा करे। ऋद्धियां-सिद्धियां उसके चरणों में
स्वयं भागती हुई आती हैं। शारीरिक भरण-पोषण की उसे चिन्ता ही क्या? उसका
भार तो गुरु-दरबार ने आरम्भ से ही अपने पर ले लिया है। बस फिर क्या था, वह
सेवा में ऐसा जुटा कि उसे यदि कोई बुलाता तो वह उत्तर देता मेरे पास समय
नहीं है। यदि उसे कोई आराम करने के लिए कहता तो यही उत्तर मिलता कि मेरे
पास समय नहीं है। एक दिन अचानक श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कार लेकर दोपहर
के समय वहां गए। सभी प्रेमी भोजन कर के तनिक विश्राम के लिए छुट्टी किए
बैठे ते। उसने भी भोजन खाया और पुनः सेवा में जुट गया।
आपने वहां पहुँच कर सबको भोग प्रसाद दिया। तब भक्त जी को भी आवाज़ लगाई।
उसे सेवा में यह पता ही न चला कि कौन आवाज़ लगा रहा है। उसने वही उत्तर
दिया- "मेरे पास समय नहीं है।" आप सेवा में उसकी ऐसी तल्लीनता को देखकर
अतयन्त प्रसन्न हुए और स्वयं वहां उसके पास प्रसाद भेज दिया। उसकी इस
श्रद्धा, निष्ठा तथा सेवा को देखकर आपने फ़रमाया-" जो व्यक्ति हित-चित्त
से, श्रद्धा से गुरु-दरबार की सेवा करता है, वह अपनी मंज़िल को शीघ्र ही
प्राप्त कर सकता है।" पुनः उसे समीप बुलाकर खूब प्रसाद दिया और फ़रमाया-
ठीक है। मानव जन्म के इस सुदर्लभ अवसर से पूर्ण लाभ ले लेना चाहिए। सेवक के
लिए गुरु-सेवा ही अपनी निजी पूँजी है जितनी चाहे एकत्र कर ले। एक मिनट भी
व्यर्थ नहीं गँवाना। हर समय अपनी सुरति को गुरु-शब्द में तथा शरीर को
गुरु-सेवा में लगाये रहने से ही चित्तवृत्तियां एकाग्र होकर ध्येयको
प्राप्त करती हैं। यही गुरुमुख का आपना काम है। वह भक्त प्रसाद लेकर व श्री
वचन श्रवण कर नत-मस्तक हो पुनः अपनी सेवा पर लौट गया।
अब जो परिवार 1936 के पश्चात् श्री चरणों में शरणागत हुए, उनमें भक्त
लोगों ने श्री चरणों में साधुवेष के लिए विनय की। आपने अधिकारी गुरुमुखों
को साधु वेष दिया। जिस दिन भी जिस गुरुमुख को साधु वेष दिया जाता उनके
समस्त परिवार की खुशी की सीमा न होती। आप स्वयं भी अत्यधिक प्रसन्न होते,
क्योंकि आप अपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री दूसरी पादशाही जी) की
मौज को साकार रूप में देखकर प्रसन्न होते। कुछ समय तो नए शरणागतों को
इकट्ठा एक स्थान पर रखकर उनको सहयोग, सुमति, निष्काम सेवा तथा भक्ति का पाठ
पढ़ाया, पुनः जब उन्हें इन सब गुणों पर आचरण करते हुए देखा तो प्रत्येक चक
पर दो-तीन महात्मा भेज कर प्रत्येक स्थान की सुव्यवस्था आरम्भ करवाई ।
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