Sunday, July 3, 2016

रूहानी जानशीनी


2 मास 24 दिन के बाद चकौड़ी सन्त आश्रम में प्रथम महात्मा सत विचारानन्द जी ने अर्शाद नामा (श्री आज्ञा) सर्व संगत को सुनाया। अतएव पुरातन मर्यादा अनुसार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री स्वामी वैराग्य आनन्द जी महाराज 3 जुलाई सन् 1936 ई. तदनुसार 20 आषाढ़ संवत् 1993 वि. आषाढ़ सुदी चौदस शुक्रवार के शुभ दिन इस सम्प्रदाय के तृतीय महाराजाधिराज के रूप में पारमार्थिक राज्यसिंहासन पर विराजमान हुए। विधिवत् केसर का तिलक लगाया गया, तदुपरन्त श्री आरती उतारी गई। उसी दिन ही श्री दूसरी पादशाही जी की पुण्य समृति में भंडारा किया गया तथा अगले दिन 21 आषाढ़ संवत् 1993 वि. अर्थात 4 जुलाई सन् 1936 ई. आषाढ़ सुदी पूर्णमासी शनिवार को व्यासपूजा का शुभ पर्व मनाया गया।
      आप (श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) के परमार्थ पथ पर सिंहासनारूढ़ होते ही आकुल हृदयों ने शान्ति की सांस ली। दो महीने चौबीस दिन प्रेमी गुरुमुख शोक-सागर में डूबे रहे। प्रेमियों के हृदय एक तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी की याद में व्याकुल थे, दूसरा उन्हें कोई आगे आश्रय न दिखाई देने से वे मझदार में हिचकोले खा रहे थे। अब आश्रय पाकर उनके हृदय में आशा की एक नई किरण ने धैर्य भर दिया। श्री सद्गुरुदेव जी महाराज श्री तीसरी पादशाही जी ने भी यह अवधि श्री नंगली साहिब में ही बिताई। आप स्वयं श्री सद्गुरु-प्रेम में सदा आकुल रहते जिससे कोई भी इस रहस्य को न समझ सका।
      सन् 1936 में परमार्थ के सिंहासन पर विराजमान होकर आपने सत्संग-उपदेश को विशाल रूप दिया। आप प्रथम दो वर्ष पंजाब तथा सिन्ध को कृतार्थ करते रहे। श्री चकौड़ी सन्त आश्रम में श्री व्यासपूजा का पर्व मनाया जाता, पुनः सिन्ध तथा पंजाब को कृतार्थ करते। इसी बीच श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने पंजाब के प्रत्येक आश्रम को पावन चरणारविन्दों से अनुगृहीत किया। कितना सौभाग्य है इन स्थानों का जहां पर स्वयं कुल मालिक सन्त स्वरूप में इन्हें पवित्र करने आए। कितना विचित्र ढंग अपनाया इन महान् विभूतियों ने कि श्री परमहंस दयाल जी श्री पहली पदशाही जी ने बिहार की पुण्य भूमि पर अवतार लेकर सीमाप्रान्त में स्थित टेरी स्थान को अपने अमृत-प्रवचनों एवं सत्संग उपदेश का उचित क्षेत्र बनाया। यही टेरी क्षेत्र श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी का जन्म स्थान बना। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी ) ने टेरी में अवतार लेकर सत्संग-उपदेश का प्रमुख केन्द्र लक्की मरवत् को बनाया। इसी लक्की मरवत् में इस सम्प्रदाय की दो महान् विभूतियां श्री स्वामी जी श्री तीसरी पादशाही जी महाराज व श्री स्वामी जी श्री चौथी पादशाही जी महाराज अवतरित हुईं। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने पंजाब को सत्संग-उपदेश का केन्द्र बनाया तथा श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी कुछ समय यहां विराजमान रहे तो इसी पंजाब की पुण्य भूमि में इस सम्प्रदाय के श्री पंचम पादशाही जी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी प्रकट हुए।

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