इसके
पश्चात 14 मई सन् 1939 को श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने हकल ज़िला जम्मू
में कृपा की। वहां पर कुछ दिन अमृत-प्रवचनों से संस्कारी आत्माओं को
लाभान्वित कर आपने श्रीनगर की ओर प्रस्थान किया। उस समय एक बस महात्मा जनों
की साथ थी तथा आप कार में विराजमान होकर यात्रा कर रहे थे। जम्मू से लगभग
15-20 मील की दूरी पर जाकर अचानक ही कार का अक्ष (Axle) टूट गया। आप कार से
उतरकर बस में विराजमान हो गये। कार ठीक होने के लिए जम्मू भेज दी गई। कार
का अक्ष ठीक करवाने में दो-तीन दिन लग गये। आप दो-तीन दिन तक कटड़ा में
विराजमान रहे। वहां सत्संग उपदेश से सबको कृतार्थ करते रहे। यहां पर आपके
पावन वचनामृत का पान करके तथा देदीप्यमान छवि को निहारकर सब मंत्र मुग्ध हो
गए। सत्संग श्रवण कर वे अपने भाग्यों की सराहना करने लगे और कहने लगे कि
सन्त महापुरुष वास्तव में ही जीवों को सन्मार्ग पर लगाने के लिए इस धराधाम
पर अवतरित होते हैं। कई प्रेमियों ने आपसे नाम की दीक्षा भी ली।
तीन दिन पश्चात जम्मू से कार ठीक होकर आ गई और कार पर विराजमान होकर आपने
वहां से प्रस्थान किया। कटड़ा से चलकर बटोत और कुद में एक-एक रात ठहरकर
वैरीनाग सरोवर पहुँचे। इस झील से जेहलम दरिया निकलता है। इस स्थान के रमणीक
दृश्य सब महात्माजनों को दिखलाते हुए आप अनन्त नाग पहुँचे। काश्मीरी भाषा
में 'नाग' चश्मे (छोटी झील) को कहा जाता है, इसलिए यहां पर कई शहरों के साथ
'नाग' शब्द आता है। अनन्त नाग में दो-तीन दिन सत्संग प्रवाह चलता रहा। इसी
मध्य एक बार दिन के समय पहलगाम में भी कृपा की। पुनःरात्रि समय अनन्तनाग
लौट आये। अनन्त नाग में कुछ एक सज्जन भक्त बन गए तथा आपको वहीं कुछ दिन
ठहरने के लिए विनय करने लगे। आप भी उनकी विनय स्वीकार कर एक दो दिन वहां
ठहरे और पुनः आपने श्री नगर में कृपा की।
श्री नगर में कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की बादामी बाग में कोठियां व
बंगले बने हुए थे। महात्मा सत विचारानन्द जी तथा महात्मा योग प्रकाशानन्द
जी महाराज के महल में गए, परन्तु वे कहीं अन्यत्र गए हुए थे। वहां
महात्माजनों की भेंट उनके सचिव महोदय से हुई। वे अत्यंत श्रद्धालु और
साधु-सेवी थे। अतः वे महात्मा जनों के साथ श्री दर्शन के लिए आए और श्री
दर्शन कर कृत्य कृत्य हो गए। सचिव महोदय ने एक बंगला आवास के लिए दे दिया
जिसमें उसने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के लिए ऊपरी भाग (चौबारा) तथा नीचे
के भाग में महात्माजनों के निवास के लिए व्यवस्था कर दी। इसके साथ ही
काश्मीर राज्य की ओर से भेजनादि का सारा प्रबन्ध करवा कर तीन-चार ब्राह्मण
भी भोजन बनाने की सेवा में नियुक्त कर दिये।
रात्रि समय नित्यप्रति सत्संगादि का कार्यक्रम होता। सैक्रेटरी साहिब अपने
साथ बड़े बड़े उच्च पदाधिकारियों को साथ लाते, सभी श्री दर्शन तथा सत्संग
का लाभ प्राप्त करते और श्री दर्शन कर कृत्यकृत्य हो जाते तथा मुक्त कण्ठ
से आपके गुणानुवादों को गाते। उनमें से कइयों ने नामोपदेश भी लिया। वहां पर
कई ब्राह्मण आपको अपना गृह पवित्र करने के लिए विनय करते, परन्तु आप
उन्हें फ़रमाते कि वे यहां आकर अपनी श्रद्धा-भावना पूर्ण कर लिया करें।
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