Monday, July 4, 2016

03.07.2016

आप ( श्री तीसरी पादशाही जी) ने दिन-रात एक करके श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री वचनों को साकार रूप दिया। 1936 से लेकर 1939 तक आपने पंजाब, सिन्ध, सीमाप्रान्त, उत्तरप्रदेश के प्रान्तों में जहां कहीं अपने सत्संग आश्रम थे, सत्संगी महात्माओं व भक्तों की विनती करने पर सब स्थानों को अपनी पवित्र चरण-रज से पुनीत किया। टेरी, डेराइस्माइलखां (सीमाप्रान्त), लक्खी, गरेला, गोघारा, नसीराबाद (सिन्ध) चकौड़ी सन्त आश्रम, भाबड़ा, पिपलभुट्टा, पगाला, भूरेकी, गन्धोवाल, डेला-चट्ठा, हरनौली, मुलतान, वहोआ, कोटली मुहम्मदसदीक, गोंदल आदि (पश्चिमी पंजाब) इन स्थानों पर अपना अमूल्य समय देकर सबकी भावनाओं को पूरा किया। अब ये सभी स्थान पाकिस्तान में हैं।
      एक बार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी नसीराबाद में विराजमान थे। कुछ दिन पश्चात् आपने महात्मा परम विवेकानन्द जी को श्री आज्ञा दी कि तुम झंपियर ज़िला कराची सिन्ध में जाकर रहो। श्री आज्ञा पाकर वे झंपीयर चले गए। इसके कुछ समय बाद एक बार आप कराची से आ रहे थे, तो महात्मा परम विवेकानन्द जी की विनय पर दो दिन के लिए आपने झंपीयर भी कृपा की। वहां रात को सत्संग हुआ। काफ़ी संगत आई हुई थी। वहां की संगत को सम्बोधित करते हुए आपने फ़रमाया-
      गुरुमुखो! पानी का अपना कोई रंग-रूप नहीं होता। जैसा रंग इसमें डालो, वैसा ही उसका रंग हो जाता है। उदाहरणतया उसमें पीला रंग डालने से पानी का रंग भी पीला हो जायेगा और लाल रंग डालने से पानी भी लाल हो जायेगा। वैसे ही मन का भी कोई रंग रूप नहीं होता। उसको भी जैसा संग मिले वैसा ही रंग उस पर चढ़ जाता है। कुसंग से मन मैला हो जाता है और सत्संग से मन निर्मल हो जाता है। निर्मल मन में ही ईश्वर का प्रेम निवास करता है। ईश्वर का प्रेम मन में होने से लोक-परलोक के कार्य सहज में ही सिद्ध हो जाते हैं। चूंकि प्रत्येक मनुष्य सब कार्यों की सिद्धि चाहता है, इसलिए प्रत्येक मनुष्य को सत्संग में जाकर अपने मन को शुद्ध करने का यत्न करना चाहिए। मन ईश्वर के नाम से शुद्ध होता है और ईश्वर का नाम सत्संग से प्राप्त होता है। सत्संग की महिमा गुरुवाणी में इस प्रकार की गई है-
सतसंगति कैसी जाणिऐ । जिथै एको नामु वखाणीऐ।।
एको नामु हुकमु है नानक सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ।।

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