Friday, July 8, 2016

07.07.2016

एक बार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी पीर पंचाल पर्वत पर भ्रमण करने के लिए गए। गर्मी की ऋतु थी, फिर भी कई पहाड़ बर्फ़ से ढके हुए थे जिनसे पानी पिघल-पिघल कर पहाड़ों से नीचे छोटी-छोटी धाराओं में बहकर तलहटी की ओर जा रहा था। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने पीर पंचाल पहाड़ के समीप विराजमान होकर भक्तों एवं महात्माजनों को प्रवचन फ़रमाए- "देखो! पहाड़ों पर पानी का क्या रूप है? नदियों में कैसा होगा? और यह पानी कहां से आता है पुनः कहां जाता है? यह पानी का रूप ही बर्फ है। जब यह बर्फ़ पिघलकर छोटी-छोटी धाराओं में बहती है तो यहां इनका पानी कितना स्वच्छ है। फिर ये छोटी धाराएँ ही पर्वत से नीचे उतरते समय इकट्ठी होकर नदी का रूप धारण करती हैं, जब यह मैदानी भागों में जाती है तो इसमें मिट्टी आदि मिलकर पानी को गंदला कर देते हैं। इस प्रकार नदी सैकड़ो मील चट्टानों, पत्थरों, टीलों को पार करती हुई समुद्र में जा मिलती है। अथाह समुद्र के जल में मिलकर ही जल विश्राम पाता है और फिर वही स्वच्छ रूप में दिखाई देता है। परन्तु जिस नदी का रुख़ सीधा समुद्र की ओर नहीं होता उसका पानी रास्ते में किसी गड्ढे-खाई व नीची जगहों में रुक जाता है, तो वह समुद्र में नहीं मिल सकता। इसी प्रकार जीवात्मा भी उस परमात्मा का अंश है, परन्तु जब यह आत्मा किसी मानव रूप को धारण कर जन्म लेती है तो इसपर माया अपने आवरण डालती है। जो मनुष्य तो सद्गुरु की पावन संगति प्राप्तकर सीधा परमात्मा से मिलने की अभिलाषा से इस मार्ग में आने वाली मायावी कठिनाइयों को पार कर लेता है, वह परमात्मा से मिलकर शान्ति प्राप्त कर लेता है। परन्तु जिस मनुष्य का रुझान माया की ओर होता है, वह जन्म-जन्मान्तरों तक दुःखी तथा अशान्त रहता है। इसीलिए प्रत्येक गुरुमुख का कर्तव्य है कि अपना रुख़, अपने विचारों का झुकाव सद्गुरु की आज्ञानुसार अपने लक्ष्य पर रखता हुआ अपनी मंज़िल पर पहुँचने का प्रयत्न करे।" इस प्रकार श्री प्रवचन फ़रमा कर कुछ देर उस क्षेत्र में घुमकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी वहां से लौट आये।

No comments:

Post a Comment