Monday, July 25, 2016

24.07.2016

जिस प्रकार ऊँची नीची घाटियों, कंटीली झाड़ियों से युक्त असम भूमि पर चलकर मंज़िल को पाना समतल भूमि पर चलकर प्राप्त करने की अपेक्षा कठिन है, इसी प्रकार गुरु-सेवा बिना मन को शुद्ध करना कठिन है। गुरु-सेवा एक समतल पगडंडी है जिसपर चलकर जीव अपने लक्ष्य को सरलता से प्राप्त कर सकता है। इस सेवा के साथ-साथ दोनों समय प्रातः व सायं 'नाम' का अभ्यास करवाना आपका नियम था। कितनी करुणा होती है सन्त-महापुरुषों के दिल में हम जीवों के प्रति। परोपकारिता के स्वरूप होते हैं महापुरुष। इसका अनुमान लगाना जीव की बुद्धि से परे की बात है। नाम है गुरु-सेवा, कल्याण है हमारा। श्री आनन्दपुर की रचना क्या केवल उन्होंने अपने लिए की? नहीं, इस आलीशान उच्च दरबार की रचना उन्होंने हम जैसे अधम जीवों को सन्मार्ग पर लगाने के लिए की ताकि युग-युगों तक माया में भटके प्राणी यहां से रोशनी प्राप्त कर अपने ध्येय को प्राप्त कर सकें। उन्होंने अनेकों कष्ट सहे तो केवल इसीलिए कि प्राणिमात्र का कल्याण हो सकें। अनामी लोक को छोड़कर आए तो केवल इसीलिए कि वे अपनी रूहों को कुपथ पर जाते हुए नहीं देख सकते थे। उन्होंने जीवों की करुण और आतुर पुकारों को सुनने के लिए यह रचना रचाई। देखो! कैसी धरती के भाग्य जगाए जहां पानी भी सुलभ नहीं था। यदि वर्षा होती तो झोंपड़ों को बहाकर ले जाती। यदि गर्मी की ऋतु आती तो पीने के लिए पानी मिलना भी दूभर हो जाता।
      मई सन् 1941 में एक बार महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी, महात्मा योग आत्मानन्द जी, महात्मा अखण्ड प्रकाशानन्द जी, महात्मा योग प्रकाशानन्द जी, महात्मा रोशनानन्द जी व कुछ अन्य भक्तजन कुएँ पर स्नान के लिए गए। कुएँ से पानी निकालने लगे तो कुएँ को बिल्कुल सूखा हुआ पाया। कन्धे पर कपड़े रख कर घर की राह ली। पीछे से आप (श्री सद्गुरु दीन दयाल जी) की कार आ गई। आपने कार रुकवा कर पूछा- क्यों किधर से आ रहे हो? महात्माओं ने विनय की- करुणेश! स्नान के लिए गए थे, पानी न होने से लौट आये हैं। श्री वचन हुए- "घबराने की ज़रूरत नहीं, यहां तो एक दिन ऐसा आएगा जब घर घर में नल व टोंटियां होगी। सरकारी नल तो समयानुसार पानी देते हैं, यहां चौबीस घण्टे पानी नलों में आएगा। यहां पानी इतना होगा कि गर्मी की ऋतु में भी कुएँ और तालाब भरे हुए दिखाई देंगे।" यह सब कुछ उस समय स्वपन की तरह लगता था। इस मनोहर वचनों में खोए-खोए प्रेमी उस समय की बाट जोहते कि कब ये श्री वचन अपना रंग लाएँगे। आज वे वचन साकार रूप में सबके सम्मुख प्रकट हैं। यह सब कुछ हम जीवों के कल्याण के लिए नहीं हुआ तो और किसलिए किया गया?

No comments:

Post a Comment