Saturday, July 2, 2016

01.07.2016

श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी जनवरी सन् 1936 में दिल्ली में विराजमान थे। श्री परम पवित्र मौज के अनुसार आप ( श्री तीसरी पादशाही जी) को सिन्ध से बुलवाया। आपके आने पर एक-दो दिन लगातार एकान्त स्थान में प्रवचन होते रहे। दो दिन पश्चात महात्मा सत् विचारानन्द जी को (जो वहीं पर थे) अपने उत्तराधिकारी के सम्बन्ध में हुकुमनामा लिखवाया और यह फ़रमाया - "हमारे रूहानी जानशीन ( श्री स्वामी वैराग्य आनन्द जी की ओर संकेत कर) ये होंगे। यह गुप्त भेद समय पर इनके परामर्श से दरबार के सब महात्मा, बाइयां, भक्त, भक्तानियां एवं सम्पूर्ण गुरुमुख संगत पर प्रकट कर देना। हर तरह से इनकी आज्ञा मानना। वैसे तो हमने चकौड़ी सन्त आश्रम पर सब महात्मों की मण्डली में इनके सम्बन्ध में काफ़ी कुछ कह दिया है, परन्तु प्रकट रूप से आपने सब पर प्रकट करना है। हमारी ओर से सबको दुआ-आशीर्वाद।" 
      महात्मा सत विचारानन्द जी ने साष्टांग दण्डवत् वन्दना की और क्षमा मांगी कि स्वामिन्। हम नादान जीवों के अपराधों को क्षमा कर दो। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने क्षमा करते हुए फ़रमाया- "हम आपकी सच्ची श्रद्धा-भावना और प्रेम-भक्ति से बहुत प्रसन्न हैं। इसी प्रकार हित-चित्त से गुरु-दरबार की सेवा करते हुए जीवन सफल करना।"
      अपने परम प्रिय शिष्य को सर्व प्रकार से परिपूर्ण, गुणसम्पन्न, तत्त्वनिष्ठ जानकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने सम्पूर्ण रूहानी ताकत अर्थात आध्यात्मिक शक्ति उन्हें समर्पित कर दी और स्वयं निश्चिन्त हो गए। इसके पश्चात् श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) 9 अप्रैल सन् 1936 ईस्वी तदनुसार 28 चैत्र संवत् 1993 विक्रमी वीरवार को नंगली साहिब में निज स्वरूप में लीन हुए।

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