आपने
श्री आनन्दपुर के शरणागतों के हृदय में निष्काम-कर्म की भावना कूट-कूट कर
भर दी। कई जिज्ञासू श्री दर्शन के लिए आते तो यहां के शरणागतों के कर्मण्य
जीवन को देखकर दंग रह जाते। सभी प्रेमी शरणागत श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
की श्री आज्ञा उनकी प्रसन्नता का पात्र बनने के निमित्त निष्काम-भाव से
सेवा करते। ऐसा ही चकित कर देनेवाला कार्य राजस्व मन्त्री ने भी देखा जिसका
वृतान्त यों है-
1941
में ग्वालियर राज्य की ओर से एक राजस्व मन्त्री (Revenue Minister) चक
श्री आनन्दपुर, चक शान्तपुर तथा चक दयालपुर के निरीक्षण के लिए आये। श्री
सद्गुरुदेव जी ने जहां तक रास्ता साफ़ था, कार पर जाने का प्रबन्ध कराया।
जहां रास्ता ऊबड़-खाबड़ था, वहां पर बैलगाड़ी द्वारा जाने का प्रबन्ध किया।
जब राजस्व मन्त्री आये तो महात्मा पूर्ण श्रद्धानन्द जी कार में मन्त्री
महोदय को बैठाकर वहां तक ले गये, जहां तक कार जा सकती थी। खराब रास्ते तक
पहुँचकर कार को रोक दिया गया। वहां बैलगाड़ी खड़ी थी। मन्त्री महोदय कार से
उतर कर बैलगाड़ी में बैठ गये। महात्मा पूर्ण श्रद्धानन्द जी बैलगाड़ी
चलाने लगे। जब मन्त्री महोदय ने देखा कि वही कार चालक बैलगाड़ी चलाने लग
गया है तो उनके आश्चर्य की कोई सीमा न रही। वह चुपचाप चकों का निरीक्षण
करते रहे।
चकों का निरीक्षण करने के बाद मन्त्री महोदय ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
के श्री दर्शन की इच्छा प्रकट की। सेवकों ने आपके श्री चरणों में विनय की।
विनय स्वीकार हुई। मन्त्री महोदय जब हुज़ूरी में उपस्थित हुए तो उन्होंने
अपनी हैरानी को प्रकट किया कि आज मुझे एक ऐसी नई बात देखने में आई है जो
मैने अपने जीवन में नहीं देखी। हम प्रायः यह देखते हैं कि अफ़सरों के जो
कार ड्राइवर होते हैं, वे कार चलाने के अतिरिक्त कार की सफ़ाई तक हाथ से
नहीं करते। कार को झाड़ने-पोंछने के लिए उन्हे अलग से एक नौकर देना पड़ता
है और आपका ड्राइवर पहले कार चला रहा था और फिर वही आदमी बैलगाड़ी चलाने
लगा। इतनी ऊँची शिक्षा विश्व भर में कहीं देखने या सुनने में नहीं आई है।
कार का चालक हो और उसके दिल में तनिक भी अभिमान न हो, यह मेरे लिए बहुत
हैरानी की बात है।
श्री
आनन्दपुर से विदा होने के बाद वही मन्त्री साहिब ग्वालियर राज्य में
पहुँचे तो ग्वालियर राज्य के सब मन्त्रियों की मीटिंग में उन्होंने यह बात
सबको बताई कि श्री आनन्दपुर वालों के दिल में सब प्रकार के कार्यों के लिए
समभाव है। यही निष्काम-भावना हमारे देश के सब लोगों में आ जाये तो देश की
काया ही पलट जाये। हमारे नौकर तो बिना कहने के किसी काम को करते ही नहीं,
फिर कार का ड्राइवर दूसरे काम को कब करने लगा है। और श्री आनन्दपुर में तो
कार के ड्राइवर के लिए कार चलाना और बैलगाड़ी चलाना एक बराबर है। इस बात की
ग्वालियर राज्य में काफ़ी दिनों तक चर्चा होती रही।
राजस्व मन्त्री के प्रस्थान करने के बाद श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सब
सेवकों को इस विषय में श्री प्रवचन फ़रमाये- "गुरुदरबार में सेवक को समभाव
से सेवा करनी चाहिए। ऊँचे पद का कोई काम हो, चाहे बर्तन साफ़ करने या झाड़ू
लगाने की सेवा हो, मन में किसी प्रकार का ख़्याल नहीं आना चाहिये। तब सेवा
करने का लाभ है। अपने मन पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है और दूसरे पर भी
अच्छा प्रभाव पड़ता है। राज्सव मन्त्री का प्रमाण देते हुए श्री सद्गुरुदेव
महाराज जी ने फ़रमाया कि मन्त्री साहिब कितने अच्छे ख़्याल यहां से लेकर
गए है। सेवक की सब कामों में समानता होनी चाहिये। किसी प्रकार की भी सेवा
करने से मन में अहंकार नहीं आता। गुरु दरबार में सब सेवा बराबर हुआ करती
हैं। किसी सेवा को अच्छा समझना, किसी सेवा को छोटा समझना- यब सब मन का धोखा
है। इस मन के धोखे से ही तुमको बचना है। इसमें तुम्हारा भी लाभ है और
देखेने-सुनने वालों का भी। जिस सेवा को करने के लिए श्री सद्गुरुदेव महाराज
जी की आज्ञा हो, उसे करने के लिए सहर्ष और निःसंकोच तत्पर रहना चाहिए।"
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