श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी से
श्री स्वामी जी श्री पंचम पादशाही जी का मिलाप
सन्
1942 में आप (श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी) श्री
परमहंस अद्वैत मत की विराट् रूप-रेखा तैयार करने में निमग्न थे। इसी वर्ष
वैशाखी के शुभ पर्व पर श्री महात्मा दयानन्द जी (जो गंधोवाल ज़िला शेखूपुरा
के सत्संग आश्रम में रहते थे) के साथ श्री स्वामी जी श्री पंचम पदशाही जी
महाराज प्रथम बार श्री आनन्दपुर में श्री दर्शन के लिए आए। श्री सद्गुरुदेव
महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने आपको निहारते ही पहचान लिया तथा अपने
ध्येय की पूर्ति होते देख अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। मानो आज आपकी विराट्
रूपरेखा का अति महत्वपूर्ण भाग पूर्ण हो गया। आपने अपने ही तदरूप
सर्वगुण-सम्पन्न शिष्य को अपने सम्मुख बिठाकर भजनाभ्यास की समस्त युक्तियां
अर्थात सहज-समाधि, अजपा-जाप, अनाहत-शब्द (सुरत-शब्द-योग) की युक्तियां
बताईं एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।
जिस प्रकार नदियां समुद्र से मिलकर विश्राम पाती हैं, इसी प्रकार श्री
पंचम पादशाही जी महाराज ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही
जी) को प्राप्त कर अपूर्व आनन्द अनुभव किया।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के पावन श्री दर्शनों की चाह आपको हर समय
उन्मत्त बनाये रखती। आप समय-समय पर श्री आनन्दपुर आकर श्री दर्शन और पावन
सेवा का लाभ उठाते। आपके हार्दिक प्रेम-भक्ति, दृढ़निष्ठा और सेवा को देखकर
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही जी) अत्यन्त प्रसन्न
होते। आपकी जीवन झलकियां आगे आपके जीवन-चरित में दी गई हैं।
सन् 1942 में व्यासपूजा पर्व पर पंजाब, सिन्ध तथा सीमाप्रान्त की काफ़ी
संगत श्री दर्शन के लिए श्री आनन्दपुर आई। श्री दर्शनों पर आई हुई संगत ने
श्री चरणों में विनय की-" भगवन! वहां की शेष संगत जो किसी कारणवश यहां नहीं
आ सकती- जैसे पानी के बिना खेती सूख जाती है, ऐसे ही वहां की संगत आपके
श्री दर्शन व श्री अमृत वचनों के बिना सूखती व कुम्हलाती जा रही है।" इसपर
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने मुसकुराते हुए फ़रमाया कि जो संगत यहां आई
है, वह यहां से हरी-भरी (प्रसन्न) होकर जा रही है। जो संगतें यहां नहीं आ
सकतीं, उनकी सुरति हमारी ओर लगी हुई है और अपनी रूहानी ख़ुराक यहां से ले
रही है। वे रूहें कुम्हलाती नहीं हैं, अपितु हरी-भरी हो रही हैं अर्थात
उन्हें अधिक लाभ पहुँच रहा है, क्योंकि उनका ध्यान हमारी ओर लगा हुआ है।
जिसकी सुरति का लगाव जिस ओर अधिक हो, उसे वह वस्तु अवश्य ही प्राप्त हो
जाती है। इस प्रकार वे अपनी सुरति की तार को सद्गुरु के श्री ध्यान में
विलीन कर ख़ुराक प्राप्त करते हैं। इस प्रकार दोनों को रूहानी भोजन मिल रहा
है। अर्थात श्री सद्गुरुदेव महाराज जी गुप्त रहस्य से दर्शा रहे थे कि
सद्गुरु के भी दो रूप होते हैं। एक स्थूल दूसरा सूक्ष्म। स्थूल रूप तो
नर-देह को धारण कर वे हमारे सम्मुख प्रकट होते हैं और सूक्ष्म रूप से जहां
भी उन्हें स्मरण किया जाए वे सदा साथ रहते हैं, अंग-संग हैं। एक क्षण भी
विलग नहीं हो सकते। इस प्रकार से वे अपने प्रेमियों की प्यास गुप्त तथा
प्रकट दोनों रूपों से बुझाते हैं। वह संगत प्रवचन श्रवण कर कृत्यकृत्य हो
गई। इस पर्व के कुछ दिन पश्चात समस्त संगत श्री आज्ञानुसार अपने-अपने
स्थानों पर लौट गई।
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