Sunday, July 24, 2016

23.07.2016

जब वे श्री आनन्दपुर में आये तो श्री चरणों में विनय की । श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया-" जीव ने जो पिछले जन्म में कर्म किए हैं, उनका फल तो भुगतना ही है। अन्तर केवल यही है कि सन्त-महापुरुषों की चरण-शरण लेने से वे कर्म सूली का कांटा बन जाते हैं व सन्त महापुरुषों की संगति से निष्काम कर्म किये जाते हैं ताकि अगले जन्म में पुनः इन कष्टों को सहन न करना पड़े।"
श्री आनन्दपुर में महात्मा ज्ञान अमरानन्द जी की मरहम पट्टी की गई। कुछ लोगों ने उन्हें पुनः तासबावली जाने के लिए मना किया। महात्मा जी का दिल दुबिधा में पड़ गया कि क्या किया जाय। वे इसी सोच में थे कि उसी दिन रात्रि के समय निज मौज के अनुसार आपने प्रवचन फ़रमाये-
" प्रत्येक काम नेकनीयत, सच्चाई और खैरख्वाही के साथ किया जाये। सेवक सेवा करता जाये और परिणाम को न देखे। कोई कष्ट, दुःख अथवा हानि हो तो घबराना नहीं। सुख और दुःख दोनों हालातों में समान रहे। यानि इन्सान को दुःख और सुख दोनों का मुकाबला करना पड़ता है। सुख के समय उसमें फँसने की अपेक्षा आगे बढ़ता जाए और दुःख में घबराहट से दूर रहे।
      पूर्ण विश्वास से सेवा करता चले। दुःख और सुख दोनों परीक्षाएँ हैं। जितने दर्जे की भक्ति होगी उतनी सख़्त परीक्षा होगी यानी उतना अधिक कष्टों का सामना करना पड़ेगा। सेवक को हर्ष-शोक, निन्दा-स्तुति, दुःख-सुख सबमें बराबर रहना चाहिए।
      पुनः फ़रमाया कि सद्गुरु तो सबको दात बख़्शते हैं, आगे अपने पात्र पर निर्भर है। जितना जिसका पात्र होगा उतना वह प्राप्त करेगा। जैसे तेल की एक बूँद जल में डालने से वह फैल कर कई प्रकार के रंग पैदा करती है, इसी प्रकार ऐसा पात्र यानी बुद्धि जितनी भी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के वचनों पर आचरण कर वचनों को ग्रहण करेगी उतना अधिक लाभ प्राप्त कर सकने में समर्थ होगी। इसलिए नेकनीयत-सच्चाई के साथ कर्म करो। दुःख-सुख, निन्दा-स्तुति में सम रहना सेवक का धर्म है।
आपने ये प्रवचन अपनी मौज में फ़रमाए। प्रेमियों गुरुमुखों के हृदय इन वचनों को श्रवण कर शीतल शान्त हो गए। महात्मा ज्ञान अमरानन्द जी श्री चरणों में वन्दना कर तासबावली की सेवा के लिए आज्ञानुसार चल दिये। नए उत्साह से सेवा में जुट गए।
इसका अर्थ यह नहीं कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने केवल श्री आनन्दपुर की बंजर भूमि को आबाद करना, घने वनों को साफ़ कर उद्यान बनाना, भव्य भवनों का निर्माण करना ही गुरु-भक्ति का लक्ष्य बताया, अपितु उन्होंने एक अनोखे ढंग की गुरु-भक्ति की धारा प्रवाहित की। उन्होंने तो निष्काम-कर्मयोग का पाठ पढ़ाया। जैसे प्यासे को पानी, अत्यन्त भूखे को भोजन, अत्यन्त थके हुए शरीर को पत्थरों पर निद्रा करने का आनन्द आता है, उसी प्रकार जन्म-जन्मांतरों से माया के पंजे में आए हुए मन को गुरु सेवा से शुद्ध कर 'शब्द' रूपी आनन्द प्रदान किया। सेवा से मन शुद्ध होकर जब उसे भजन पर बिठाया तो मन अपने आप ही उस आनन्द में डूब गया, जिसका अनुभव केवल वही प्रेमीजन ही कर सकते हैं जिन्होंने इस मार्ग को अपनाया।

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