श्री आनन्दपुर में
श्री
आनन्दपुर की भूमि ने आप ( श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही
जी) के आगमन के लिए करुण पुकार की। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी उस करुण
पुकार को सुनकर इस भूमि को कृपा-वृष्टि से सिंचित करने के लिए आये। श्री
चकौड़ी सन्त आश्रम में रूहानी अभिषेक के लगभग तीन वर्ष पश्चात एकाएक आपकी
मौज श्री आनन्दपुर में स्थायी निवास करने की उठी। इधर श्री आनन्दपुर प्रेम
की प्यास को आकुलता से व्यक्त कर रहा था, उधर सिन्ध अपने प्रेम-पाश में
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को जकड़े हुए था। सन् 1939 में आपने दीपावलि का
पर्व सिन्ध में मनाया। यह सिन्ध में आपकी अन्तिम दीपावलि थी। आपने श्री
आनन्दपुर में कृपा-पत्र भेजा कि हम दीपावलि के पश्चात् श्री आनन्दपुर
आएंगे। श्री आनन्दपुर निवासी गुरुमुखजन व श्री आनन्दपुर का कण-कण प्रसन्नता
से झूम उठा। जब और जिस समय सन्त महापुरुष जहां भी चरण रखें, वह समय पर्व
से भी बढ़कर होता है, क्योंकि-
।।दोहा।।
सन्त दीवाली नित करें, सत्य लोक के माहिं ।
और मते हैं काल के, ऐवें धूल उड़ाहिं ।।
इसी
श्री आनन्दपुर में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) के
सुनहरी वचनर संजोये हुए थे। उन वचनों को साकार रूप देने के लिए श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी प्रेम-त्याग-सेवा का पाठ
पढ़ाने के लिए नवम्बर 1939 में श्री आनन्दपुर पधारे। आपके आगमन से
प्रेमियों के हृदय प्रफुल्लित हो उठे। वृक्षों, पत्तों व चट्टानों ने भी
अभिनन्दन के गीत गाये। युगों से सुनसान, घने जंगल में प्रेम-प्यासी धरती की
सोई हुई किस्मत जाग उठी।
सन्
1940 में श्री गुरु-पूजा का प्रथम पर्व यहां मनाया गया। सीमाप्रान्त,
पंजाब, सिन्ध, उत्तरप्रदेश आदि स्थानों संगतें आईं। आपने त्यौहार के शुभ
दिन ये अमृत वचन फ़रमाये-
बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ।
गुरुवाणी
तुम्हारे
अनेकों जन्म संसार में काल-माया की भेंट हुए हैं। जहां इतने जन्म व्यर्थ
गंवा दिये, वहां यह एक जन्म ही सन्त महापुरुषों की सेवा व संगति में लगा कर
देखो तो सही।
।।दोहा।।
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुरु मिलें, तौ भी सस्ता जान ।।
परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
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